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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

श्री पण्डित लेखराम जी आर्य मुसाफिर का संक्षिप्त जीवन वृतान्त - स्व. स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज की लेखनी से

संसार की उन्नति का इतिहास सदा ही महापुरुषों के रक्त से तैयार होता रहा है | जिन शूरवीरों ने धर्म के लिये अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया, यहां तक कि अपने प्यारे सिद्धान्तों की रक्षा के लिये, अपने प्रिय प्राणों को न्योच्छावर करने में भी संकोच नहीं किया, उनकी धर्म परायणता ने उनके विचारों के प्रसार के लिये विद्युत से भी बड़कर कार्य किया है | यह एक सर्वमान्य सिद्धान्त है कि किसी भी समुदाय के जीवन का अनुमान उसके त्याग, तप और बलिदान के आधार पर ही किया जा सकता है | प्रत्येक जीवित समाज और समुदाय अपने जीवन का प्रमाण इस प्रकार के बलिदानों के रूप में ही प्रस्तुत किया करता है | किसी भी सत्य के प्रचार को अपने विरोधियों के हाथों जितनी अधिक विपत्तियां सहन करनी पड़ती हैं, दूसरे शब्दों में, किसी भी सत्य प्रचाराक ने अपने प्रचारित सत्य के पक्ष में जितनी भी अधिक प्रबल शहादत प्रस्तुत की है, उसके सत्य का उतना ही अधिक प्रसार संसार में हुआ है | अतः, धन्य है, वह समुदाय और वह समाज जिसके प्रवर्तकों और प्रचारकों ने अपने प्रिय प्राणों को बलिदान करके, और धर्म के मार्ग में अपना खून बहा कर, अपनी और अपने सिद्धान्तों की सत्यता को प्रकट किया है |

अभी पूरे पच्चीस वर्ष भी नहीं बीते, जब कि आर्यसमाज वैदिक सत्य का प्रदीप हाथ में लेकर, मानव जाति के कल्याण और अभ्युत्थान के लिये सन्नद्ध हुआ था | स्वामी दयानन्द के गम्भीर नाद ने कुम्भकरण की नींद में सोई पड़ी हुई भारत-सन्तान को जगा दिया | आलस्य के स्थान पर पुरुषार्थ का प्रकाश फैला | सत्य-धर्म की पिपासा प्रत्येक हृदय में भड़क उठी | वैदिक ज्योति ने अन्धकार का विनाश आरम्भ कर दिया | सम्पूर्ण भारत राष्टृ में एक अपूर्व हलचल मच गई | विरोधियों की और से होने वाले भीषणतम आक्रमणों को शान्ति और आश्चर्यजनक धैर्य से सहन करते हुऐ महर्षि द्यानन्द सरस्वती ने अपने सिद्धान्तों का प्रचार किया | परन्तु ससीम मनुष्य के कार्य भी तो सीमा वाले ही होते हैं | यदि महर्षि दयानन्द अपने आत्म-बलिदान के रूप में अपने अन्तिम त्याग, तप और बलिदान का परिचय देकर अपने सिद्धान्तों की सत्यता की साक्षी न देते, तो वह प्रबल आन्दोलन, जो उनके बाद सम्पूर्ण भारत में उठा, फैला और ग्राम-ग्राम घर-घर में पहुँचा, कभी भी दिखाई न देता | एक महर्षि की मृत्यु ने हजारों क्या लाखों जीवन-ज्योतियों का काम किया | वैदिक धर्म प्रचार की अग्नि प्रचण्ड से प्रचण्डतम होती चली गई |

यद्यपि प्रत्येक उत्तम आन्दोलन को महापुरुषों के आत्म बलिदानों के परिणाम स्वरूप अपूर्व बल और प्रोत्साहन प्राप्त होता है, परन्तु हमें भूलना न चाहिये कि उस बल और प्रोत्साहन के मार्ग में कुछ छोटी-बड़ी बाधायें भी मौजूद होती हैं | जिनको दूर करने के लिये अन्य धर्मवीरों के बलिदान अपेक्षित होते हैं | आर्यसमाज के आन्दोलन के मार्ग में भी इसी प्रकार की बाधायें आ आ कर उपस्थित होती रहती हैं | और प्रभु की दिव्य-व्यवस्था एवं हमारे कर्मों के अनुसार उन बाधाओं के निवारण के लिये नये-नये बलिदानों की आवष्यक्ता भी लगी ही राह्ती है | इसी प्रकार की आवष्यक्ता को पूर्ण करने के लिये महर्षि दयानन्द के बलिदान के छः वर्ष पश्चात मुनिवर गुरुदत्त जी विद्यार्थी ने तिल-तिल करके आत्म-बलिदान प्रस्तुत किया था | छः वर्ष का समय और बीत गया | फिर कुछ नई बाधायें आ उपस्थित हुईं | फिर से बलिदान की आवश्यक्ता हुई | नई बाधाओं के निवारण के लिये धर्मवीर पण्डित लेखराम जी आर्य मुसाफिर ने छः मार्च सन् 1897 ई. की सन्ध्या वेला में फिर अपना जीवन बलिदान किया | और सचमुच ही अपने पवित्र रक्त के द्वारा वैदिक धर्म की सत्यता एवं महत्ता का एक नया तथा प्रभाव पूर्ण प्रमाण अंकित कर दिया |

यद्यपि धर्मवीर पण्डित लेखराम जी आर्य मुसाफिर की गणना उस वर्ग में नहीं हो सकती जो कि बुद्ध, शंकर, नानक और दयानन्द प्रभृति के लिये ही सुरक्षित है | और जिसमें वे अपने‍-अपने चन्द्रमा रूपी स्वरूप में संसार को प्रकाश प्रदान करते हुए आनन्द की वर्षा कर रहे हैं | फिर भी इसमें सन्देह नहीं कि श्री पण्डित लेखराम जी उन उज्वल नक्षत्रों में से एक हैं, जो कि ऐसे चन्द्रमाओं की शोभा बढ़ाने में ही अपने जीवन की सार्थक्ता समझते हैं | इसलिये यह आवश्यक प्रतीत होता है कि श्री पण्डित लेखराम जी का संक्षिप्त जीवन वृतान्त इस पुस्तक माला [कुलियात आर्य मुसाफिर] के माननीय पाठकों की सेवा में प्रस्तुत किया जावे | जिससे कि वे पुस्तक माला के प्रणेता के जीवन वृत के साथ ही साथ उसकी उस उदात्त भावना और कर्तव्य-निष्ठा का भी परिचय प्राप्त कर लें, जो कि इस पुस्तक माला की मूल प्रेरक बनी थी |

तहसील चकवाल जिला जेहलम {अब पाकिस्तान में} के एक अप्रसिद्ध ग्राम "सैयदपुर्" नाम में 8 चैत संवत 1915 वि. में शुक्रवार के दिन, एक मोहियाल ब्राह्मण परिवार में एक लड़का उत्पन्न हुआ | उस समय यह कौन कह सकता था कि उस छोटे से शिशु के अन्दर कैसी-कैसी अद्भुत शक्तियां वर्तमान हैं ? पांचवें वर्ष में वह बालक विद्या प्राप्ति के लिये फारसी भाषा के विद्यालय में बैठाया गया | माता पिता ने उसका नाम लेखराम रखा | पन्द्रह वर्ष का होने तक वह लड़का भी अन्य लड़कों जैसा ही एक सामान्य विद्यार्थी था; तथापि लेखराम पढ़ने लिखने में अधिक उत्साही था | और उसकी स्मरण-शक्ति भी दूसरों से बढ़ चढ़ कर थी | उसकी एक विशेषता भी थी | जिस पर उसके सभी अभिभावक आश्चर्य किया करते थे | वह यह कि उसके स्वभाव में बहुत दृड़ता पाई जाती थी, जो कभी कभी हठ का रूप भी धारण कर लेती थी |

एक बार, जब उसकी आयु सात या आठ वर्ष की ही थी, विद्यालय में पढ़ते समय लेखराम को प्यास लगी | इस पर उसने घर जाने की छुट्टी मांगी | अध्यापक ने कहा- ‍"विद्यालय में पानी मौजूद है | यहां ही पी लो |" परन्तु लेखराम ने पानी न पिया | प्यासा बैठा रहा | घर जाकर ही पानी पिया |

पन्द्रह वर्ष की अवस्था में लेखराम जी अपने चाचा श्री गण्डा राम जी के पास पुलिस का काम सीखने के लिये चले गये | इस समय [ सन् 1903 ई. में - अनुवादक ] श्री गण्डा राम जी पेशावर में डिप्टी इन्सपैक्टर पुलिस हैं | उन्हीं दिनों एक बूढ़े सिख भाई से, जो कि गण्डा राम जी के अधीन कार्य करता था, लेखराम का परिचय हो गया | वह बढ़े सवेरे उठकर, स्नान आदि करके गुरुमुखी अक्षरों में गीता की पोथी का पाठ किया करता था | उस सिख उपासक के सम्पर्क में रहकर, लेखराम ने समाधी लगानी शुरु कर दी | उनके चाचा जी ने बतलाया कि एक दिन लेखराम जी समाधी में ऐसे मग्न हुए कि चारपाई से नीचे गिर पड़े | फिर भी उनकी समाधी न खुली |

सन् 1876 ई. के लगभग लेखराम जी पुलिस विभाग में नौकर हुए और कुछ काल पश्चात् नक्शा-नवीस-सारजेण्ट नियुक्त किये गये | धर्म पिपासा की अनुभूतियों ने उसी समय अपनी छटा दिखानी आरम्भ कर दी थी | अस्तु सन् 1880 ई. में उन्होंने काशी से गीता पुस्तक मंगवाई | उसको पढ़ने और उसके श्लोकों पर गहरा मनन करने का कार्यक्रम बन गया | रोटी एक ही समय अपने हाथ से पकाकर खाते थे | और कृष्ण कृष्ण का जाप किया करते थे | उसी वर्ष, जब कि उनकी आयु लगभग बीस या बाइस वर्ष की थी, माता पिता ने विवाह के लिये जोर देना आरम्भ किया | सगाई तो पहले ही हो चुकी थी | परन्तु लेखराम के सिर पर तो दूसरी ही धुन सवार थी | विवाह की बात चलते ही उसने नौकरी छोड़ने, और मथुरा वृन्दावन की और जाने का निश्चय कर लिया | सम्बन्धियों ने पत्र लिख-लिख कर बहुत ऊँच-नीच की बातें समझाई | परन्तु लेखराम के उत्साह की अग्नि अधिकाधिक प्रचण्ड होती चली गई | अन्त में पण्डित लेखराम के चाचा अपने थाने के कामकाज छोड़ कर समझाने के लिये आये | इस पर पण्डित लेखराम ने अपने चाचा को एक दृष्टान्त सुनाया | जो कि योग की पुस्तकों में पाया जाता है | वह इस प्रकार है : -

"एक था राजा | उस के पास नट आये, तमाशा दिखाने के लिये | राजा बोला ! योगी की नकल उतारो | पाँच सौ रुपये इनाम मिलेगा | नट ने पूरा योगी बन कर दिखा दिया | परन्तु जिस समय नट की समाधि खुली, उसने तुरन्त ही इनाम की आशा से अपना हाथ फैला दिया |"

यह दृष्टान्त सुना कर लेखराम जी ने कहा यदि मैं गृहस्थ के बन्धनों में उलझ जाऊंगा, तो अपने लक्ष्य को प्राप्त‌ करने में सफल न हो सकूंगा | उसकी दृड़ता के सामने घर वालों ने अपनी हार मान ली | उन की मंगेतर का विवाह विवश होकर उनके छोटे भाई से किया गया | [फुट् नोट: चोबीस वर्ष की आयु में लेखराम जी ने श्रीमती लक्ष्मी देवी जी के साथ विवाह कर लिया था | इसका उल्लेख आगे 'सती का जीवन' शीर्षक में मिलेगा |]

इस घटना के कुछ काल पश्चात लेखराम जी को श्री कन्हैया लाल जी अलखधारी की पुसतकें पढ़ने का चस्का लगा | श्री इन्द्रमणि जी मुरादाबादी की पुस्तकें तो वे इससे पूर्व ही पढ़ चुके थे | और मुहम्मदी लोगों के साथ धार्मिक विषयों पर पूछताछ तथा वाद‍-विवाद का कार्य भी वे आरम्भ कर चुके थे | श्री अलखधारी जी की एक पुस्तक में स्वामी दयानन्द जी सरस्वती की प्रशंसा लेखराम जी ने पड़ी | कुछ समाचार पत्रों के लेख पढ़ने पर उस प्रशंसा की पुष्टि भी हो गई | लेखराम जी ने तुरन्त ही स्वामी दयानन्द जी सरस्वती के ग्रन्थ मंगवाये | और मनोयोग पूर्वक उनका अध्य्यन आरम्भ कर दिया | ज्यों-ज्यों धर्म के मर्म अधिकाधिक मालूम होते गये, त्यों-त्यों श्री स्वामी दयानन्द जी सरस्वती के दर्शनों के लिये उन की लालसा और व्यग्रता भी बढ़ती चली गई | दिल बेकाबू हो गया | अन्त में उन्होंने सन् 1881 ई. में पेशावर में आर्य समाज स्थापित किया | फिर एक महीने का अवकाश प्राप्त किया | और श्री स्वामी जी महाराज के दर्शनों के लिए चल दिये |

लाहोर, अमृतसर, मेरठ आदि आर्य समाजों में होते हुए लेखराम जी अजमेर पहुँचे | वहां महर्षि दयानन्द जी के दर्शन एवं उनसे वार्तालाप करके, उन्होंने अपने मन के सम्पूर्ण संशय निवृत किये | लौटने पर एक पत्र "धर्मोपदेश" वैदिक धर्म के प्रचार के लिये निकाला और तन, मन, एवं धन से आर्य समाज पेशावर की उन्नति में जुट गये | पुलिस की नौकरी के दिनों में ही अपनी स्पष्टवादिता के लिये उन्होंने भरपूर प्रसिद्धि प्राप्त कर ली | धार्मिक वार्तालापों और वादविवादों में वे सांसारिक पद‍-मर्यादा आदि के आधार पर किसी का कुछ भी लिहाज न करते थे | शराब की बुराइयों की रोकथाम करने के उद्देष्य से एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया गया | जिले के सब मुख्य अधिकारी और सेना के कमाण्डिंग अफसर भी उपस्थित थे | पण्डित लेखराम जी का ओजस्वी भाषण उस सम्मेलन में सबको चकित कर देने वाला था | सैनिकों पर उनके भाषण का प्रभाव बहुत ही उत्तम हुआ |

पण्डित लेखराम जी की प्रकृति आरम्भ से ही स्वतन्त्र थी | इसलिए पक्षपाती और विद्वेशी अधिकारियों से उनकी बनती न थी | सन् 1882 ई. के आरम्भ में उनकी बदली पेशावर से देहात में कर दी गई | फिर भी लेख भेज-भेजकर लेखराम जी ने "धर्मोपदेश" का प्रकाशन जारी रखा | अन्त में आर्य समाज पेशावर ने व्यय भार को सहन करने में असमर्थता प्रकट करते हुए "धर्मोपदेश" को बन्द करने का प्रस्ताव किया | उसके विषय में पण्डित लेखराम जी ने 12 मार्च 1883 ई. को जो पत्र अपने चाचा के नाम लिखा था, उससे ज्ञात होता है कि अपनी आय के बहुत कम होने पर भी, पण्डित जी "धर्मोपदेश" के व्यय का कुछ भाग स्वयं वहन करने के लिये भी तैयार हो गये थे | परन्तु आर्य समाज पेशावर के सहमत न होने के कारण यह पत्र उसी वर्ष बन्द हो गया था |

सन् 1884 ई. के आरम्भ में ही वैदिक-धर्म के सुप्रकाश ने लेखराम जी के हृदय मन्दिर को प्रकाशित कर दिया था | उस प्रकाश का रूप दिन प्रतिदिन अधिक प्रचण्डता धारण करता हुआ निरन्तर ही निखरता जा रहा था | अपनी पुलिस की नौकरी से भी उन्हें अरुचि हो गई थी | सम्बन्धियों, मित्रों और सरकारी अधिकारियों के समझाने पर भी लेखराम जी अपने विचारों में दृढ़ रहे | नवम्बर सन् 1884 ई. में त्याग-पत्र देकर उन्होंने मनुष्यों की दासता से छुटकारा प्राप्त कर लिया और स्वतन्त्रता का आनन्द लेने लगे |

पहले वे लाहोर पधारे और कुछ समय तक संसकृत पढ़ते रहे | फिर वे "आर्य गजट‌" के सम्पादक नियुक्त होकर फिरोजपुर चले गये | उस समय उर्दू का एकमात्र पत्र यह आर्य-गजट ही था | पण्डित लेखराम जी ने जिस उत्तमता से, तब आर्य गजट को चलाया, उसका प्रमाण आर्य गजट की फाईल को देखने से मिलता है | उनकी लेखनी तो सत्य के प्रचार में उसी समय से संलग्न हो चुकी थी, जब वे आर्य समाज के सदस्य बने थे | वे इससे पूर्व ही सन् 1883 ई. में "विधवाओं की पुकार‌" (नवीदे बेवगान) नामक पुस्तक भी लिख चुके थे |

पण्डित लेखराम जी की वह सर्व प्रथम पुस्तक जिसने उन्हें सम्पूर्ण आर्यवर्त में प्रसिद्ध कर दिया और जिसने आर्य-सन्तान के मुरझाये हुए हृदय को नव-जीवन प्रदान करके प्रफुल्लित कर दिया, वह थी "तकजीबे बुराहीने अहमदिया" इसमें पण्डित जी ने मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी की निरर्थक गर्वोक्तियों और मनतव्यों का खण्डन करते हुए वैदिक-धर्म की महत्ता को भारतवासियों के हृदय पर भली प्रकार अंकित कर दिया है | इसके बाद उन्होंने "नुस्खाये खब्ते अहमदिया, क्रिश्चियन मत-दर्पण और सबूते तनासुख‌" प्रभृति कई बड़ी बड़ी पुस्तकें लिखीं |

इनके साथ ही उन्होंने बीसियों पुस्तिकायें भी लिखीं, जिनमे ईसाई, मुहमदी और पौराणिक प्रभृति विरोधियों के आक्षेपों के दान्त-तोड़ उत्तर दिये गये थे | परन्तु इस सम्पूर्ण अवधि में क्या
पण्डित लेखराम जी किसी एक ही स्थान पर जमकर बैठे रहे थे ? क्या उन्होंने किसी पुस्कालय की सहायता से अपने ग्रन्थ रचे थे ? नहीं, वे तो चिरकाल से मुसाफिर बने आर्यावर्त के विभिन्न नगरों में, ग्रामों में, वनों और पहाड़ों में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के जीवन चरित्र के लिये सामग्री का संचयन करते हुए दौड़ते फिर रहे थे | इसीलिये उन्होंने अपना नाम ही "आर्य मुसाफिर" रख लिया था | आवश्यक सामग्री एवं साधनों के बिना, पुस्तकालयों की सहायता के पूर्ण अभाव में और निरन्तर कष्ट-साध्य यात्रा प्रसंगों में रहकर, सैकड़ों व्याख्यान देते हुए और शास्त्रार्थ करते हुए भी पण्डित लेखराम जी ने वह काम करके दिखा दिया जो बड़े-बड़े साधन सम्पन्न विद्वानों से भी न हो सका |

धार्मिक विषयों में अनुसन्धान करने की प्रबल रुचि लेखराम जी में लड़कपन से ही मौजूद थी | यही कारण है कि जब महर्षि दयानन्द के जीवन चरित्र के लिए घटनाओं और आवश्यक‌ सामग्री का संचय करने की आवश्यक्ता हुई, तब‌ पण्डित लेखराम जी के अतिरिक्त और कोई भी व्यक्ति उस काम के लिये उपयुक्त न समझा गया | उस समय से विभिन्न प्रदेशों में वैदिक धर्म का प्रचार करते हुए आर्य मुसाफिर ने जो प्रसिद्धि प्राप्त की, वह शायद ही किसी उपदेशक को प्राप्त हुई होगी | वैदिक ध्रर्म की महत्ता को स्वीकार करने के बाद, पण्डित लेखराम जी का जीवन एक सार्वजनिक जीवन बन गया था | इसलिए उनके सार्व‌जनिक जीवन का विवरण इस छोटे से लेख में प्रस्तुत करना हमारे लिये सम्भव नहीं है | यहां तो हम केवल यही दिखाना चाहते हैं कि पण्डित लेखराम जी का जीवन इस प्रकार का था कि प्रत्येक मत वा पक्ष के अनुयाई को न केवल यह कि उनका सम्मान करना चाहिये, अपितु सत्य प्रेमी जनों को उनके जीवन से शिक्षा भी ग्रहण करनी चाहिये |

मुहम्मदी-मत की पड़ताल आर्य मुसाफिर ने विशेष रूप से की थी | इसलिये उनकी अधिकांश‌ रचनायें उस के विषय में ही हैं |पण्डित लेखराम जी की लेखनशैली की यह विशेषता है कि वे पहल नहीं करते | अर्थात अपनी और से किसी के ऊपर आक्रमण नहीं करते | उन्होंने अपनी खण्डनात्मक सभी पुस्तकें विरोधियों के सर्वथा अनुचित और तीव्र आक्षेपों व आक्रमणों के उत्तर में ही लिखी हैं | इसलिये कोई भी न्याय-प्रिय व्यक्ति उनके विरुद्ध कटुता वा कठोरता का आक्षेप नहीं कर सकता | परन्तु कुछ मुहम्मदी प्रचारकों ने, विशेष रूप से मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी ने पण्डित जी के लेखों तथा ग्रन्थों से घबराकर, कठोरता के दोष लगाने और मुहम्मदी तलवार से उन्हें धमकाना आरम्भ कर रखा था | पण्डित जी की प्रभावपूर्ण युक्तियों से घबरा कर मुल्लां-मौलानाओं ने अपने भोले भाले मतवालों को बहकाना और उकसाना भी आरम्भ कर रखा था | पण्डित लेखराम जी की लेखनी की गति को रोकने के लिये कई उपाय किये गये थे | अदालत का आश्रय लेने से भी विरोधी जन चूके नहीं थे | अन्त में जब उनके सभी उपाय व्यर्थ हो गये, तब उन्हें एक दुष्ट, धोकेबाज मुसलमान के खंजर का शिकार बना दिया गया | इस प्रकार जड़ता और मूर्खता ने प्रगति और बुद्धिवाद पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न किया | पण्डित लेखराम जी का भौतिक शरीर लुप्त हो गया | वे हाथ, जिन्होंने लेखनी उठाकर पक्षपातियों और सम्प्रदायवादियों के मूढ़ विश्वासों को चकनाचूर कर दिया था, अब फिर कभी अपनी लेखनी को न उठा सकेंगे | किन्तु फिर भी सत्य की सीधी काट को रोकने का सामर्थ्य किस में है |

श्री पण्डित लेखराम जी एक महान कर्मयोगी थे | इसका प्रमाण इससे बढ़कर क्या हो सकता है कि लगभग बारह वर्ष के समय में लगातार प्रचार करते हुए उन्होंने महर्षि दयानन्द जी के जीवन चरित्र के लिये लगभग तीन हजार पृष्ठ की सामग्री एकत्रित की | इसके साथ ही बहुत सी श्रेष्ठ पुस्तकें भी लिखीं | वे और भी कई सौ पृष्ठ की लेख-सामग्री तैयार करके छोड़ गये थे | अपने कर्त्तव्य पालन की धुन में वे दिन रात एक कर देते थे | उनकी स्वतन्त्रवृति का संकेत हम पहले ही कर चुके हैं | धार्मिक बातों में बहुत दृढ़ होने पर भी उनका हृदय बहुत कोमल था | किसी को कष्ट में देखकर वे द्रवित हुए बिना न रहते थे | अधिक लेख विस्तार का तो यहाँ स्थान नहीं है, फिर भी उनकी दुर्बलता को भी हमें जान लेना चाहिये | उनके साहस, इन्द्रिय दमन, सत्यविश्वास और ऊँचे आध्यात्म-ज्ञान नें उन्हें वैदिक धर्म का ऐसा दृढ़ अनुयाई बना दिया था कि लोग उन्हें पक्षपाती समझने लगे थे | जब उनका यह मनोभाव जागता था, तब दूसरों की दुर्बलताओं को क्षमा करना उनके वश में न रहता था | अवैदिक सिद्धान्तों की प्रशंसा सुनकर वे चुप नहीं रह सकते थे | वे कभी कभी प्रतिपक्षियों की सामाजिक पद-मर्यादा का कुछ भी विचार न करके , उन पर निर्भय हो कर झपट पड़‌ते थे | इसी लिये लाला कांशी राम जी ने, जो कि ब्राह्मसमाजी और पण्डित लेखराम जी के मित्र थे, पण्डित जी को आर्य समाज के अली की पदवी प्रदान कर रखी थी | [ फुट् नोट - ‌हजरत अली इसलाम के चौथे खलीफा, सदाचारी विद्वान और उत्साही धर्म प्रचारक थे - अनुवादक‌ ] परन्तु पण्डित जी की यह दुर्बलता उनके व्याख्यानों में ही प्रकट होती थी | उनकी पुस्तकों में तो इस दुर्बलता की गन्ध भी नहीं है |

वेद, वैदिक समाज, वैदिक सिद्धान्त, और वेदाचार्य महर्षि दयानन्द के प्रति उनके हृदय में इतना अधिक सम्मान भाव था कि लोग उसे पागलपन की सीमा तक पहुँचा हुआ कहा करते थे | परन्तु धर्म के लिये कार्य करने वाले और मर मिटने वाले तो पागल होते ही हैं | यदि पागलपन न हो तो वे भी अन्य दुनियादारों की तरह रहें | पण्डित जी का पागलपन एक शुभ और पावन-पागलपन था |

6 मार्च को सन् 1897 को सायंकाल के समय एक पथभ्रष्ट मुसलमान ने, जोकि शुद्धि का बहाना करके आया था, धोका देकर पण्डित जी के पेट में छुरा घोंप दिया | हत्यारा भाग गया | पण्डित जी को बचाने के सभी सम्भव उपचार किये गये; परन्तु सब व्यर्थ | रात को दो बजे गायत्री-मन्त्र का जाप करते हुए, धर्मवीर पण्डित लेखराम जी ने इस नाशवान संसार को छोड़ा, और वो अपने सच्चे देश को चले गये | चलते समय उन्हीं ने वहां उपस्थित आर्य पुरुषों को अपना यह अन्तिम आदेश दिया था कि : -

तहरीर का काम बन्द न होने पाये :

आर्य पुरुषो ! विरोधियों के आक्षेपों और आक्रमणों के समुचित उत्तर देने का भार अब हम सब पर है | परम पिता परमात्मा से प्रार्थना है कि वे हमें बल और उच्साह प्रदान करें | जिससे कि हम धर्म मर्यादानुसार अपने कर्त्तव्य का पालन कर सकें |