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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

ध्यानी बुद्धि से कर्म्म को पवित्र करते हैं

ओउम् ! जातो जायते सुदिन‌त्वे अह्वां समर्य आ विदथे वर्धमान: |
पुनन्ति धीरा अपसो मनीषा देवया विप्र उदियर्ति वाचम् ||

ऋग्वेद 3|8|5||

शब्दार्थ -

जातः.................शरीरधारी
अह्वाम्................दिनों को
सुदिनत्वे.............सुदिन करने के निमित
जायते.................उत्पन्न होता है, वह
समर्ये.................जीवन संग्राम के निमित्त तथा
विदथे.................लक्ष्य-प्राप्ति के निमित्त
आ....................सब प्रकार से
वर्धमानः.............बढ़ता है |
धीरः..................ध्यानीजन
मनीषी................बुद्धि से
अपसः................कर्म्मों को
पुनन्ति..............पवित्र करते हैं और
विप्रः..................मेधावी ब्राह्मण
देवया.................दिव्य कामना से
वाचम्................वाणी को
उत् + इयर्ति........उच्चारण करता है |

व्याख्या -

पूर्वार्द्ध में मनुष्य-जीवन का प्रयोजन सुन्दर काव्य भाषा में वर्णित किया गया है | मनुष्य का जन्म दिनों को सुदिन बनाने, सवाँरने के लिए होता है | पशु-आदि योनि में भगवान् के आराधन-साधन न थे, अतः जन्म सफल न कर सका, दिनों को सुदिन न बना सका, वे वैसे ही चले गये | अब उत्तम मानव- तन मिला, जहाँ जीव को उन्नति के सभी साधन प्राप्त हैं |अब भी यह यत्न न करे, तब कब करेगा ?

यह जीवन ऐसा-वैसा नहीं है | यह समर्य = संग्राम है | बहुतों को इकट्ठा होकर लड़ना पड़ता है | बिना युद्ध के जीवन सुजीवन, दिन सुदिन नहीं होगें | दुर्योधन ने झूठ नहीं कहा था - सूच्यग्रं नैव दास्यामि बिना युद्धेन केशव, युद्ध के बिना सुई के अग्रभाग के समान भूमि भी न दूँगा | जो आलसी बनकर जीवन सुख लेना चाहते हैं, वे धोखे में हैं |

न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवा | - ऋग्वेद

परिश्रम के बिना दैवी शक्तियाँ भी मित्र नहीं बनतीं |

नैव श्रमो न विश्रमः - थकान नहीं, अतः विश्राम नहीं | परिश्रम नहीं, आराम नहीं |

इसी भाव को लेकर कहा - समर्य आ विदथे वर्धमान: | उत्पत्तिमात्र से कुछ नहीं होता, जब तक पुरुषार्थ, अध्यवसाय, यत्न न किया जाए, जीवन चल ही नहीं सकता, सुजीवन-सुदिन तो दूर की बात है | चेष्टा में, यत्न में जीवन है, वृद्धि है | देखिए, जो बच्चा निश्चेष्ट पड़ा रहता है, उसकी बाढ़ रुक जाती है, वह अपाहिज हो जाता है | स्वस्थ बच्चा पड़ा पड़ा भी हाथ पैर हिलाता रहता है | यही हाथ-पैर का हिलाना-चलाना उसकी वृद्धि का कारण होता है इसीलिए यहाँ विदथ = प्राप्ति से समर्य = संग्राम का ग्रहण किया |

बढ़ने का प्रयोजन है लड़ना, पुरुषार्थ करना, (Struggle) तथा प्राप्ति | यदि प्राप्ति कुछ नहीं, और केवल लड़ते ही रहे, सारा जीवन संग्राम में ही बीत गया, तो व्यर्थ गया, अतः अन्धे होकर नहीं लड़ना चाहिए | लड़ना लड़ने के लिए नहीं है | लड़ना साधन है, साध्य नहीं, अतः वेद कहता है -

पुनन्ति धीरा अपसो मनीषा - बुद्धिमान् मननशक्ति से, विचार शक्ति से कर्म्मों को पवित्र करते हैं | ज्ञान बड़ा शोधक है -

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा |- गीता 4|37 ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्म्मों को भस्म कर देता है | अर्थात कर्म्मोँ के दोषों को ज्ञान दूर करता है, अतः वेद ने कहा है -

साधन्नृतेन धियं दधामि || -

मैं ऋतयुक्त साधना करता हुआ ऋतयुक्त बुद्धि को धारण करता हूँ | ज्ञानयुक्त कर्म करने वाले विद्वान को विप्र कहते हैं, ऐसा विप्र व्यर्थ नहीं बोलता | जब वह बोलता है सारयुक्त वचन बोलता है, अतः वेद कहता है - देवया विप्र उदियर्ति वाचम् विप्र देवविषयक वाणी बोलता है |

ब्राह्मणग्रन्थों में आता है कि यज्ञ में मानुषी वाणी न बोले, वैष्णवी या दैवी वाणी बोले | इसके दो तात्पर्य हैं, एक तो यह कि यज्ञ में दैवी परमात्मा की वेदवाणी का प्रयोग करे | दूसरा यह कि वह देवीवाणी = दिव्य भावयुक्त वाणी बोले, न कि आसुरी वाणी |

मनुष्य जीवन की सफलता देव बनने में है | देव बने बिना दैवी वाणी कैसे बोल सकेगा ? देव बनने का साधन है ऋतानुसार अनुष्ठान | वह अनुष्ठान अनृत त्याग के बिना सर्वथा असम्भव है | यज्ञ करने के लिए तत्पर यजमान दीक्षा लेते हुए कहता है -

इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि |- य. 1|5

मैं अनृत का त्याग करके सत्य ग्रहण करता हूँ | ऋत का एक अर्थ यज्ञ है | यजमान प्रतिज्ञा करता है कि मैं यज्ञ-विरोधी भावों का त्याग करता हूँ ब्राह्मणग्रन्थों तथा वेदों में यह बात अनेक बार कही गई है कि देव यज्ञ करते हैं |

इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि - पर शतपथ ब्राह्मण में लिखा है कि इसका अनुष्ठान करने वाला मनुष्येभ्यो देवानुपैति = मनुष्यों से ऊपर उठकर देवत्व को प्राप्त करता है | वहीं यह भी लिखा है -

सत्यं वै देवा अनृतं मनुष्याः |

देव सत्य स्वरूप होते हैं, मनुष्य अनृत अर्थात मनुष्य अनेक बार ऋतविरोधी कर्म करता है किन्तु देवों के आचरण में अनृत = असत्य का लवलेश भी नहीं होता | उनका जीवन-व्यवहार सत्य से ओत-प्रोत रहता है | मानव जीवन का लक्ष्य देव-जीवन है | उनके लिए अनृतत्यागपूर्वक सत्यग्रहण, सत्यधारण, अनिवार्य है |उसके बिना देवत्व सम्भव नहीं है |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)