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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर टीका से (17)

... कर्त्तव्य विधान के बाद उसकी पूर्ति के लिये ईश्वर से प्रार्थना की गई है ‍-

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह |
तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते प‌श्यामि योSसावसौ
पुरुषः सोSहमस्मि ||16||

भाषार्थ -
पूषऩ्.................हे सर्वपोषक
एकर्षे.................अद्वितीय
यम...................न्यायकारी
सूर्य...................प्रकाश्-स्वरूप
प्राजापत्य............प्रजापति
रश्मीऩ्...............ताप (दुःखप्रद किरणों को)
व्यूह..................दूर कर
तेज...................और सुखप्रद तेज को
समूह.................प्राप्त करा,
यत्...................जो
ते.....................आपका
कल्याणतमम्.........अत्यन्त मंगलमय
रूपम्................रूप है
तत्...................आपके उस रूप को
पश्यामि..............मैं देखता हूं, इसलिये
यः.....................जो
असौ पुरुषः............वह पुरुष (ईश्वर) है
सः.....................वह
अहम् अस्मि...........मैं हूं |

व्याख्या -
मन्त्र में सच्चिदानन्द स्वरूप ईश्वर से, सच्चित् जीव को सच्चिदानन्द बना देने की याचना की गयी है और वे साधन भी, जिनसे सच्चित् जीव सच्चिदानन्द बन सकता है, बताये गये हैं | वे ये हैं :-

(अ‍ब गतांक से आगे)

पहला साधन - ईश्वर के उन गुणों को जिनका विवरण मन्त्र में है, जीव को अपने में धारण करना चाहिये | वे गुण ये हैं :-

1. पूषण - मनुष्य को सबका पोषक होना चाहिये | उसका हृदय इतना लचकीला और प्रेममय हो जाना चाहिये कि किसी को भी दुखी न देख सके |

2. एकर्षि - उसे उपासक श्रेणी में अपने गुण और कर्म की दृष्टि से, अद्वितीय होने के लिये यत्नवान होना चाहिये |

3. यम - उसे न्यायपथ का अचूक पथिक होना चाहिये | कभी अन्याय और अत्याचार का विचार भी उसके हृदय में नहीं आना चाहिये |

4. सूर्य्य - उसे अपने अन्तःकरण को अज्ञान के अन्धकार से जो तमस् और रजस् के रूप में होकर हृदय को अन्धकारमय गुफा बनाये रखते हैं, स्वच्छ रखना चाहिये और सत्य के प्रकाश से उत्तरोत्तर हृदय को प्रकाशमय बनाने का यत्न करते रहना चाहिये |

5. प्रजापति - जिस प्रकार प्रजापति, अपनी प्रजा की रक्षा किया करता है, उसी प्रकार का रक्षक बनने का उसे उद्योग करना चाहिये जिससे उसको कभी भयभीत न होना पड़े |

दूसरा साधन - मनुष्य को दुख से रहित और सुख से भरपूर हृदय वाला बनना चाहिये | यम और नियम के अभ्यास से उसे साधन-सम्पन्नता प्राप्त होगी |

तीसरा साधन - जगदीश्वर के भक्त और प्रेमी का हृदय प्रेम से इतना भरपूर होना चाहिये कि प्रेम के आवेश में होते हुए उसे अपनी सुध-बुध न रहे और केवल ध्येय ही उसके लक्ष्य में रह जाये | भक्ति और प्रेम की इस उच्चतम अवस्था में वह अपने प्रेम-पात्र प्रभु का दर्शन कर सकता है |

जब उपासक इन तीन साधनों से सम्पन्न हो जाता है, तभी उसे कह सकते हैं कि मुक्त जीव या सच्चित से सच्चिदानन्द हो गया ; परन्तु इस प्रकार हुआ सच्चिदानन्द, यह जीव सादि सच्चिदानन्द ही होगा | असली सच्चिदानन्द तो अनादि सच्चिदानन्द ही है | मन्त्र में यही शिक्षा दी गयी है | मनुष्य के कर्त्तव्य विधान और चुनौती देने के बाद, उपनिषद् ने एक बार फिर उसे याद दिला दिया कि उसका अन्तिम उद्देष्य यही (ईश्वर दर्शन) होना चाहिये जिससे उसके कर्त्तव्य का रुख दूसरी और न फिर सके |

(क्रमशः)