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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर टीका से (18)

...जब उपासक इन तीन साधनों से सम्पन्न हो जाता है, तभी उसे कह सकते हैं कि मुक्त जीव या सच्चित से सच्चिदानन्द हो गया ; परन्तु इस प्रकार हुआ सच्चिदानन्द, यह जीव सादि सच्चिदानन्द ही होगा | असली सच्चिदानन्द तो अनादि सच्चिदानन्द ही है | मन्त्र में यही शिक्षा दी गयी है | मनुष्य के कर्त्तव्य विधान और चुनौती देने के बाद, उपनिषद् ने एक बार फिर उसे याद दिला दिया कि उसका अन्तिम उद्देष्य यही (ईश्वर दर्शन) होना चाहिये जिससे उसके कर्त्तव्य का रुख दूसरी और न फिर सके |

अब गतांक से आगे _

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मातँ शरीरम् |
ओउम् क्रतो स्मर क्लिबे स्मर कृतँ स्मर ||17||

भाषार्थ -

वायुः.....................शरीरों में आने जाने वाला
अनिलम्.................जीव
अमृतम्.................अमर है परन्तु
इदम्....................यह
शरीरम्..................शरीर
भस्मान्तम्..............केवल भस्म पर्यन्त है इसलिये अन्त समय में
क्रतो.....................हे जीव
ओउम् स्मर.............ओउम् का स्मरण कर
क्लिबे स्मर.............निर्बलता दूर करने के लिये स्मरण कर और
कृतम् स्मर.............अपने किये हुए का स्मरण कर |

व्याख्या -

यह उपनिषद् का चौथा और अन्तिम भाग है |

वेद की इस महत्त्वपूर्ण शिक्षा का भाव यह है कि मनुष्य को अपना जीवन इस प्रकार व्यतीत करना चाहिए कि जब अमर आत्मा और नश्वर शरीर के वियोग का समय आवे, तब वह ओउम् का उच्चारण कर सके | छान्दोग्योपनिषद् में एक आख्यायिका आई है कि एक समय देवकी-पुत्र कृष्ण के लिए उनके गुरु आंगिरस घोर ऋषि ने उपदेश दिया कि जब मनुष्य का अन्त समय हो, तब उसे इन तीन वाक्यों का उच्चारण करना चाहिये |

(1) त्वं अक्षितमसि | (हे ईश्वर ! आप अक्षित हैं)

(2) त्वं अच्युत‌मसि | (हे ईश्वर ! आप अविनश्वर हैं)

(3) त्वं प्राणमंशितमसि | (हे ईश्वर ! आप सर्व जीवनप्रद सूक्ष्मतम हैं)

उपनिषद् का कथन है कि कृष्ण इस उपदेश को सुनकर अपिपास (अन्य किसी उपदेश के लिए तृष्णा रहित) हो गये (छान्दोग्योपनिषद् 3|17|68) | विचारणीय बात यह है कि जब घोर ऋषि ने कृष्ण महाराज को अन्त समय की एक शिक्षा दी थी, तो फिर कृष्ण ने क्यों यह समझ लिया कि अब उन्हें और किसी शिक्षा की जरूरत नहीं रही | इस प्रश्न को लक्ष्य में रखते हुए जब हम उपर्युक्त मन्त्र पर दृष्टि डालते हैं तो प्रतीत होता है कि मन्त्र के दूसरे भाग में दो बातों के स्मरण करने का विधान है, एक 'ओउम्' और दूसरे 'अपने किये हुए कर्मों का |' वेद के समस्त मन्त्र और ऋचाएं दो भागों में विभक्त हैं - एक भाग उपदेश रूप में है, जिसमें मनुष्यों को उपदेश रूप में अनेक शिक्षाएं दी गई हैं, जिनके आचरण में लाने से वे अपने को उच्च कोटि का मनुष्य बना सकते हैं | परन्तु ईश्वर ने मनुष्य को कर्म करने में स्वतन्त्र भी बनाया है | इसलिए जो शिक्षायें उपदेश रूप से दी गई हैं , मनुष्य का अधिकार है कि उन्हें ग्रहण करे या न करे, क्योंकि वह कर्म करने में स्वतन्त्र है | मन्त्रों के दूसरे भाग में जो कुछ है, वह नियम रूप में वर्णित हुआ है | जो शिक्षा नियमरूप में हैं, उन्हें किसी की शक्ति नहीं कि उल्लंघन कर सके | ये ही नियम हैं, जिन्हें प्राकृतिक नियम (Laws of Nature) कहते हैं जो अटल हैं | मन्त्र में जो उपदेश हैं , उनमें से एक यह है कि "ओउम् क्रतो स्मर्" (हे जीव ! ओउम् का स्मरण कर‌) यह उपदेश रूप में है, परन्तु दूसरा उपदेश "क्रतं स्मर्" (हे जीव ! अपने किये हुए का स्मरण कर‌) नियम रूप है , और अटल है | इस शिक्षा को लक्ष्य में रखते हुए जब हम मनुष्य जीवन पर दृष्टि डालते हैं, तब वह भी हमें दो भागों में विभक्त दिखलाई देता है | मनुष्य जीवन का पहला भाग उस समय तक रहता है जब तक वह मृत्यु-शय्या पर नहीं आता | दूसरा भाग वह है, जिसमें मनुष्य मृत्यु-शय्या पर आकर अन्तिम श्वास लेने की तैयारी करता और लेता है | मनुष्य जीवन का पहला भाग वह है, जिसमें मनुष्य को कर्म करने की स्वतन्त्रता होती है | उसमें मनुष्य उलटा-सीधा जिस प्रकार का भी चाहे कर्म कर सकता है, परन्तु जीवन के दूसरे भाग में वह स्वतन्त्रता बाकी नहीं रहती |मनुष्य पहले भाग में जिस प्रकार की भी परिस्थितियों और प्रभाव में रहता है, दूसरे भाग में जो चित्र रूप होता है, उन्हीं परिस्थितियों और प्रभावों का चित्र खींचा हुआ दिखाई देता है | यदि एक व्यक्ति ने वित्तैष्णा - धन के प्राप्त करने की इच्छा और उद्योग ही - में अपना जीवन व्यतीत किया है, तो जीवन के अन्तिम भाग में इसी का चित्र खिंचेगा, अर्थात वह धन ही का स्मरण करता हुआ इस दुनिया से कूच करेगा | गजनी के प्रसिद्ध लुटेरे राजा महमूद का जीवन इस विषय में उदाह‌रण रूप है | यदि उसने अपना सारा जीवन धन के लिए लूट्-मार करने में लगाया था तो अन्त में उसी धन के लिए रोता हुआ वह संसार से गया | यही अवस्था उनकी होती है, जिन्होंने पुत्रैषणा अथवा लोकैषणा में अपना जीवन व्यतीत किया है | निष्कर्ष यह है कि मनुष्य, जीवन के पहले भाग को, जिस प्रकार के भी कार्य में लगाता है, अन्त में जीवन के दूसरे भाग में उसे उसी का स्मरण करते हुए इस दुनिया से जाना पड़ता है |

इतनी व्याख्या के बाद अब उस प्रश्न का सुगमता से समाधान हो जाता है कि क्यों कृष्ण आचार्य घोर के उपदेश को सुनकर अपिपास हुए | कृष्ण ने समझ लिया कि अन्त में "त्वम् अक्षितमसि" इत्यादि वाक्य तब मुँह से निकल सकते हैं, जब जीवन के पहले भाग में इनका स्मरण और जप किया हो | इस प्रकार घोर ऋषि का उपदेश केवल अन्त समय का ही एक कर्त्तव्य‌ नहीं था, किन्तु सारे जीवन का यह कार्यक्रम था | जब सारे जीवन का कार्यक्रम आचार्य ने बतला दिया तब फिर कृष्ण को क्या जरूरत बाकी रही थी कि वे और भी किसी शिक्षा की आकांक्षा करते | उपनिषद् ने जो शिक्षा मनुष्य के कर्त्तव्य के सम्बन्ध में ऊपर दी है, यदि मनुष्य उसका ठीक रीति से पालन करे, तो अवश्य उसकी वही अवस्था होगी कि अन्त में वह ओउम् का स्मरण करते हुए संसार से रुखसत होगा | यह मन्त्र एक प्रकार की परीक्षा का विधान है | उपनिषद् की शिक्षा जिस कार्यक्रम से जीवन व्यतीत करने का विधान करती है, यदि मनुष्य उसी के अनुसार चलेगा तो अवश्य इस परीक्षा में उत्तीर्ण होगा, अर्थात जीवन के दूसरे भाग में, ओउम् का स्मरण करते हुए अन्तिम श्वास खींचेगा | यदि उस शिक्षा पर न चलेगा तो कदापि ओउम् का स्मरण न कर सकेगा | यही परीक्षा की अनुतीर्णता होगी | इसलिए प्रत्येक नर-नारी का कर्त्तव्य है कि इस प्रकार से यत्नवान् हो कि जब परीक्षा का समय आये तो उत्तीर्णता प्राप्त करे |

(अगले अ‍ंक में समाप्त‌)