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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (16)

प्रार्थना विषय

ऊर्ध्वो नः पाह्यंहसो नि केतुना विश्वं समत्रिणं द‌ह |
कृधी न ऊर्ध्वाञ्चरथाय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः ||16||
ऋ. 1|3|10|14||

व्याख्यान -

हे सर्वोपरि विराजमान पर ब्रह्म आप‌ (ऊर्ध्वः) सबसे उत्कृष्ट गुणवाले हो, हमको कृपा से उत्कृष्ट गुणवाले करो तथा ऊर्ध्वदेश में हमारी रक्षा करो | हे सर्वपापप्रणाशकेश्वर ! हम को "केतुना" विज्ञान अर्थात विविध विद्यादान दे के "अहसः" अविद्यादि महापाप से "नि पाहि" (नितरां पाहि) सदैव अलग रक्खो | तथा "विश्वम्" इस सकल संसार का भी नित्य पालन करो, हे सत्यमित्र न्यायकारिन् ! जो कोई प्राणी "अत्रिणम्" हम से शत्रुता करता है उसको और काम क्रोधादि शत्रुओं को आप "सन्दह‌" सम्यक् भस्मीभूत करो (अच्छे प्रकार जलाओ) "कृधि न ऊर्ध्वान‌" हे कृपानिधे ! हमको विद्या, शौर्य, धैर्य, बल, पराक्रम, चातुर्य, विविध धन, ऐश्वर्य, विनय, साम्राज्य, सम्मति, सम्प्रीति, स्वदेशसुखसंपादनादि गुणों में सब नरदेहधारिर्यों से अधिक उत्तम करो तथा "चरथाय, जीवसे" सबसे अधिक आनन्द, भोग, सब देशों में अव्हातगमन (इच्छानुकूल जाना आना), आरोग्य, देह, शुद्ध मानसबल और विज्ञान इत्यादि के लिए हमको उत्तमता और अपनी पालनायुक्त करो "विदा" विद्यादि उत्तमोत्तम धन "देवेषु" विद्वानों के बीच में प्राप्त करो अर्थात विद्वानों के मध्य में भी प्रतिष्ठायुक्त सदैव हमको रक्खो ||16||