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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

निमंत्रण आर्य समाज का (1) - स्व. पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय‌ जी

आर्यसमाज एक संस्था है जिसे स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 1875 ई. (अर्थात विक्रमी की चैत्र शुक्ल‌ प्रतिपदा) को बम्बई (मुम्बई) में खोला था | इसके उपरान्त हजारों आर्यसमाज भारतवर्ष तथा अन्य देशों के ग्रामों तथा नगरो में खुल गए | इन सबके नियम और उद्देष्य एक ही हैं, और ये कई वैधानिक प्रणालियों द्वारा परस्पर संगठित तथा सहयुक्त हैं |

आर्यसमाज का मुख्य उद्देष्य यह था कि जगत् में ईश्वर के अस्तित्व, उसकी पूजा, जीव और ईश्वर के सम्बन्ध में और मनुष्य के आचार व्यवहार के विषय में जो अनेक भ्रांतियां फैली हुई हैं, उनको दूर किया जाए | स्वामी दयानन्द ने अपनी तपस्या, स्वाध्याय तथा मनन से यह बात मालूम की कि मनुष्य की सबसे प्राचीन और सर्वोत्तम धर्म पुस्तक 'वेद' है | उसकी सहायता से अनेकानेक भ्रम दूर हो सकते हैं और उसी के अनुकूल चलने से देशों, जातियों और सम्प्रदायों के पारस्परिक झगड़े मिट सकते हैं | इसलिए स्वामी दयानन्द ने वेदों का प्रचार आरम्भ किया | आर्यसमाज वैदिक धर्म का संसार में प्रचार करना अपना मुख्य कर्त्तव्य समझता है | आर्य समाज के दस नियम देखें |

पहले दो नियम परमेश्वर के विषय में हैं | यों तो संसार में अधिकतर लोग ईश्वर, भगवान्, अल्लाह आदि अनेक नामों द्वारा ईश्वर को मानते हैं, परन्तु ईश्वर के विषय में उनकी भावनाएं भिन्न भिन्न हैं | कोई समझता है कि ईश्वर मनुष्य के समान मुंह, नाक, कान, हाथ, पैर युक्त शरीर वाला कोई ऐसा व्यक्ति है जो स्वर्ग में रहता और वहीं बैठा-बैठा संसार के प्राणियों पर हकूमत करता है | हम सब ईश्वर के हाथ के खिलौने हैं |

वह जिस तरह चाहता है कठपुतली के समान हमको नचाता रहता है, किसी को राजा बनाता है किसी को दरिद्र | किसी को निरोग और किसी को निरोगी | किसी को अन्धा और किसी को आंख वाला |

कुछ लोग मानते हैं कि भूमि के ऊपर आकाश में किसी स्थान पर बहुत दूर स्वर्ग बहिश्त या जन्नत है | वहां ईश्वर रहता है उसके दरबार में बड़े बड़े देवता या फरिश्ते रहते हैं | वह जैसा हुक्म देता है वे उसी प्रकार संसार के लोगों के साथ‌ व्यवहार करते हैं |

कुछ लोगों का विचार है कि ईश्वर का वास्तविक घर तो स्वर्ग ही है | परन्तु ईश्वर जब चाहता है तो शरीर धारण करके मर्त्यलोक में उतर आता है | इसी को अवतार कहते हैं | अवतार लेकर ईश्वर नरलीला करता है अर्थात जैसा मनुष्य आचरण करते हैं, खाते हैं, पीते हैं, रोते हैं, हंसते हैं, लड़ते हैं. इसी प्रकार की लीलाएं ईश्वर भी किया करता है |

इस प्रकार ईश्वर को मानने वालों के इतने भेद प्रभेद हैं कि उनके विचार आपस में नहीं मिलते | और एक ईश्वरवादी समुदाय दूसरे ईश्वरवादियों से निरन्तर लड़ता रहता है | इससे संसार की शान्ति भंग रहती है | ईसाई मुसलमानों से, मुसलमान यहूदियों से, हिन्दू मुसलमानों से, मुसलमान हिन्दुओं से, सदा लड़ते रहते हैं | सुन्नी मुसलमान शिया मुसलमान से लड़ता है, कैथोलिक ईसाई प्रोटैस्टैन्ट ईसाई से लड़ता है | शैव हिन्दू शाक्त हिन्दु से लड़ता है | सभी एक दूसरे के रक्त के प्यासे रहते हैं |

कुछ बुद्धिमान लोगों ने ईश्वरवादियों को परस्पर लड़ते देखकर ऐसा मत बना डाला कि ईश्वर कोई वास्तविक वस्तु नहीं है | मूर्खों ने इसकी कल्पना मात्र कर ली है और उसी कल्पना के आधार पर लड़ते रहते हैं | न कोई ईश्वर है और न मनुष्य को किसी ईश्वर के पूजने की आवश्यक्ता है | सब धर्मों को छोड़ दो और सभी मनुष्य एक दूसरे के साथ मिलकर संसार की उन्नति करें |

परन्तु ईश्वर विश्वास को छोड़ देने से परिस्थिति सुधरी नहीं | बौद्धों ने ईश्वर अस्तित्व का निषेध किया | परन्तु बौद्ध लोग महात्मा बुद्ध की मूर्तियां बनाकर पूजने लगे और उन मूर्तियों के आकार, प्रकार पर लड़ाईयां होती रहीं | जैनियों ने भी ईश्वर के मानने से इनकार कर दिया | किन्तु उन्होंने भी सन्त महात्माओं की मूर्तियां बनाईं तथा शैव और शाक्त लोगों के समान मूर्तियों को पूजने लगे | बीमारी ज्यों की त्यों रही | केवल ऊपरी रूप बदल गया | कुछ नास्तिकों ने सब प्रकार के पूजा पाठ को छोड़ दिया | कहने लगे कि लोगों ने भ्रान्तिवश अपनी कल्पना से ईश्वर कहना आरम्भ कर दिया है | वस्तुतः ईश्वर जैसी कोई सत्ता नहीं है | प्राकृतिक सुखों के सम्पादन का प्रयत्न‌ करना चाहिए | जैसा कम्युनिस्ट लोग करते हैं |

परन्तु अब तो संसार इस परीक्षण को भी कर चुका है | मनुष्य का जी नहीं चाहता ईश्वर की सत्ता को सर्वथा इन्कार दे | यदि ईश्वर जैसी कोई चीज नहीं है तो यह जड़ जगत् सुव्यवस्थित कैसे रहता है ? थोड़ा सा विचार करने से ही पता चलता है कि संसार में कोई ऐसी शक्ति काम कर रही है जो मनुष्य की बुद्धि से भी परे है | जगत् के सभी प्राणियों से भी बुद्धिमान मनुष्य है | परन्तु बुद्धिमान मनुष्य की बुद्धि भी यह समझने में असमर्थ है कि स्वयं उसी का शरीर किस प्रकार कार्य‌ कर रहा है ? हमारी आंख कैसे बनी ? कैसे उसमें देखने की शक्ति उत्पन्न हुई और कैसे वह काम करती है | मनुष्य आंख को स्वयं नहीं बनाता | और यह चश्मा भी आंख का नमूना सामने रखकर ही बनाते हैं | और यह चश्मा बनाने के लिए बुद्धि की आवश्यक्ता है तो आंख बनाने के लिए कोई बड़ी बुद्धि वाली शक्ति चाहिए | चींटी के आंख में देखने की शक्ति होती है | चींटा या चींटी के मां बाप तो आंख नहीं बना सकते | मनुष्य के मां बाप भी अपने पुत्र की आंख की बनावट को न समझ सकते हैं न आंख बना सकते हैं | इससे बुद्धिमान लोग इस् सरलतम उपाय से सन्तुष्ट् नहीं हो सकते कि ईश्वर का विश्वास ही छोड़ दो |

ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज के पहले दो नियमों में यह दिखाया है कि केवल ईश्वर न मानने मात्र से काम नहीं चलेगा | ईश्वर का यथार्थ रूप समझने और ईश्वर पूजा की ठीक विधि का अवलम्बन करने से ही आपत्ति दूर होगी | अनुचित भोजन खाने से ही रोग होता है परन्तु इसका यह इलाज नहीं है कि बिलकुल खाना बन्द कर दो | क्योंकि शरीर को ठीक रखने के लिए भोजन अत्यन्त आवश्यक है | त्याज्य है अनुचित भोजन | शुद्ध भोजन त्याज्य नहीं है, इसलिए यदि अनुचित भोजन से तंग आकर अनशन करना आरम्भ कर दिया जाए तो शरीर कैसे चलेगा ? मनुष्य की आन्तरिक भावना है कि मनुष्य से भी बड़ी किसी सत्ता पर विश्वास करके उसका आश्रय ले और उसकी पूजा करें, यदि उसको ठीक ठीक यह न‌ बताया जाए कि वह सत्ता है क्या, तो वह भूतों और चुड़ैलों को पूजने लगेगा | जिसे खाने के लिए रोटी नहीं मिलती वह वृक्षों की खाल तक खा जाता है | और अत्यन्त आपत्तिजनक अवस्थाओं में धूल तक फांकने लगता है | यही हाल आध्यात्मिक भोजन का है | अच्छा और उचित भोजन न दोगे तो अनुचित भोजन खाने पर लोग बाधित होंगे | यही कारण है कि जब उचित ईश्वरवाद से मुंह मोड़कर लोग नास्तिक बन गए तो नास्तिकों में भी भूत-प्रेत या कल्पित वस्तुओं और कब्रों की पूजा आरम्भ हो गई | इसलिए ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज के पहले दो नियमों में ईश्वर के ठीक ठीक स्वरूप का वर्णन किया |

(क्रमशः)