Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की ईशोपनिषद् पर टीका से (19)

...उपनिषद् की शिक्षा जिस कार्यक्रम से जीवन व्यतीत करने का विधान करती है, यदि मनुष्य उसी के अनुसार चलेगा तो अवश्य इस परीक्षा में उत्तीर्ण होगा, अर्थात जीवन के दूसरे भाग में, ओउम् का स्मरण करते हुए अन्तिम श्वास खींचेगा | यदि उस शिक्षा पर न चलेगा तो कदापि ओउम् का स्मरण न कर सकेगा | यही परीक्षा की अनुतीर्णता होगी | इसलिए प्रत्येक नर-नारी का कर्त्तव्य है कि इस प्रकार से यत्नवान् हो कि जब परीक्षा का समय आये तो उत्तीर्णता प्राप्त करे |

अब गतांक से आगे -

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि
देव वयुनानि विद्वान् | युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो
भुयिष्ठान्ते नम उक्तिं विधेम ||18||

भावार्थ -
अग्ने....................हे प्रकाशस्वरूप
देव......................तेजस्वी ईश्वर
राये......................ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए
सुपथा...................अच्छे मार्ग से हमको
नय......................चलाइये | आप
अस्माऩ्.................हमारे
विश्वानि.................सम्पूर्ण
वयुनानि.................कर्मों को
विद्वाऩ्..................जानने वाले हैं |
अस्मत्..................हमको
जुहुराणम्................उलटे मार्ग पर चलने रूप
एनः.....................पाप से
युयोधि..................बचाइये | इसलिये
ते.......................आपको हम
भूयिष्ठाम्................बार-बार‌
नमः उक्तिम्.............नमस्कार
विधेम...................करते हैं |

व्याख्या

यह मन्त्र उपनिषद् का अन्तिम मन्त्र है | आर्य शैली के अनुसार सारा यत्न करने के बाद अन्त में मनुष्य को ईश्वर की दया ही का आश्रय लेना चाहिए | उसी के अनुसार इस प्रार्थना विधायक मन्त्र के साथ उपनिषद् समाप्त होती है | मन्त्र में पाप का कैसा सुन्दर लक्षण कर दिया है | पाप क्या है ? उल्टे मार्ग पर चलना | इस उलटे, पाप के मार्ग पर न चलकर सीधे और पुण्य पथ का पथिक बनने के लिए ईश्वर की ही पथ‌-निर्देशनकर्त्ता के रूप में आवश्यक्ता है | वही आदि गुरु है | वही महान शिक्षक है | उसी का आश्रय लेने से बेड़ा पार हो सकता है | इसलिए सब कुछ यत्न करके भी अन्त में उसी का आश्रय लेना चाहिए |

|| इत्योम् ||