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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

पुरोहित की घोषणा

ओउम् ! संशितं म इदं संशितं वीर्यं बलम् |
संशितं क्षत्रमजरमस्तु जिष्णुर्येषामस्मि पुरोहितः ||

ओउम् ! समहमेषां राष्ट्रं स्यामि समोजो वीर्यं बलम् |
वृश्चामि शत्रूणां बाहूननेन हविषाहम् ||

अथर्ववेद 3|19|1,2||

शब्दार्थ

मे......................मेरा
इदम्...................यह
ब्रह्म....................ज्ञान-बल
संशितम्................भली प्रकार तीक्ष्ण किया हुआ है |
वीर्य्यम्.................वारक शक्ति तथा
बलम्...................सम्बल भी
संशितम्................भली प्रकार तीक्ष्ण है| उनका
संशितम्................भली प्रकार से तीक्ष्ण किया हुआ
क्षत्रम्...................क्षात्रबल
अजरम्..................जीर्ण न होने वाला
अस्तु...................है,
येषाम्..................जिनका मैं
जिष्णुः..................जयशील
पुरोहितः.................पुरोहित
अस्मि..................हूँ ||

अहम्..................मैं
एषाम्..................इनके
राष्ट्रं....................राष्ट्र को
सं+स्यामि.............एक सूत्र में बाँधता हूँ, और इनके
ओजः..................ओज, तेज
वीर्य्यम्................वारक शक्ति तथा
बलम्..................रक्षा के सामर्थ्य को
सम्....................एक सूत्र में बाँधता हूँ |
अहम्..................मैं
अनेन..................इस
हविषा..................सामग्री द्वारा
शत्रूणाम्................शत्रुओं की
बाहूऩ्..................भुजाओं को
वृश्चामि.................काटता हूँ |

व्याख्या -

राष्ट्र के पुरोहित=नायक में किन भावों का समावेश हो, यह संक्षेप से इन मन्त्रों में अंकित है | पुरोहित में सब प्रकार का बल होना चाहिए क्या ब्राह्मबल और क्या क्षात्रबल | वैदिक पुरोहित की गम्भीर घोषणा सचमुच सबके मनन करने योग्य है संशितं म इदं ब्रह्म = मेरा यह ब्राह्मबल सुतीक्ष्ण है; केवल ब्राह्मबल ही नहीं,प्रत्युत संशितं वीर्यं बलम् = वारक सामर्थ्य और रक्षण शक्ति भी तेज है | दूसरों से आक्रान्त होने पर दूसरों पर आक्रमण करके उनको भगा देने का नाम वीर्य्य और दूसरों से आक्रान्त होने पर अपनी रक्षा कर सकने को बल कहते हैं | क्षात्रबल के ये दो प्रधान अंग हैं | पूरी शान्ति वहीं होती है - यत्र ब्रह्मं च क्षत्रं च सम्यञ्चौ चरतः सह (य. 20|25) = जहाँ ब्राह्मबल और क्षात्रसामर्थ्य समान गतिवाले होकर एक साथ विचरते हैं | क्षत्रिय में केवल क्षात्रबल है किन्तु ब्राह्मण में ब्राह्मण तथा क्षात्रबल दोनों हैं | यही ब्राह्मण का उत्कर्ष है | क्षात्रबलविहीन ब्राह्मण सचमुच हीन है, वह पूर्ण ब्राह्मण नहीं है | जिस राष्ट्र का नेता वेदानुकूल होगा, सचमुच उसका क्षात्रतेज अजर=अक्षीण=अहीन ही रहेगा |

राष्त्र को संगठित रखना, तथा राष्ट्र के ओज वीर्य्य आदि की रक्षा करना पुरोहित का काम है -

समहमेषां राष्ट्रं स्यामि समोजो वीर्यं बलम् मैं इनके राष्ट्र को तथा ओज, बल, वीर्य्य को एक सूत्र में पिरो के रखता हूँ | नेता को चाहिए कि समूचे राष्ट्र के सामने एक महान उद्देष्य रखे | इससे राष्ट्र में एकता बनी रहती है | इस एकता के रहने से ही पुरोहित कह सकेगा एषां राष्ट्रं सुवीरं वर्धयामि (अ. 3|18|5) मैं इनके राष्ट्र को सुवीर बनाकर बढ़ाता हूँ |

जिस प्रकार के शिक्षक होंगे, वैसे ही शिष्य होंगे | यदि शिक्षक हीनवीर्य्य, हतोत्साह होंगे तो राष्ट्र में उत्साह-बलादि का अभाव रहेगा | वैदिक पुरोहित तो कहता है ‍

तीक्ष्णीयांसः परशोरग्नेस्तीक्ष्णतरा उत |
इन्द्रस्य वज्रात् तीक्ष्णीयांसो येषामस्मि पुरोहितः ||
अ.3|19|4

उनके हथियार कुठार से तीक्ष्णतर और आग से भी अधिक तीक्ष्ण हैं, इन्द्र के वज्र=बिजली से भी तेज हैं जिनका मैं पुरोहित हूँ | उग्र पुरोहित के शिष्य सभी प्रकार से उग्र होंगे, अतः राष्ट्र की उन्नति चाहने वालों को उग्र पुरोहित उत्पन्न करने चाहिए |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार)