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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

निमंत्रण आर्य समाज का (3) - स्व. पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय‌ जी

.... शेष सात नियम मनुष्यों के साधारण सदाचार तथा व्यवहार से सम्बन्ध रखते हैं | सबसे पहली बात यह है कि आर्यसमाज किसी देश विशेष, नगर विशेष या प्रान्त‌ विशेष के लिए नहीं है | संसार का उपकार करना इसका परम धर्म है | संसार में सब कुछ आ जाता है | जहां तक हमारी, हमारे ज्ञान की या हमारी शक्ति की पहुंच हो | आर्यसमाज न केवल हिन्दुओं के सुधार के लिए है, न केवल मुसलमानों, न केवल ईसाइयों के, आर्यसमाज की सहानुभूति सबके साथ है | वह सबसे प्रेम करता है और जो कोई आर्यसमाज के प्रेम का उत्तर प्रेम से देना चाहता है उसकी सहायता के लिए बिना भेद-भाव के उद्यत है | और सदा उद्यत रहना चाहिए | आर्यसमाज के लिए सब मनुष्य कहलाते हैं | वे सब बिना जाति, रंग, जन्म या लिंग भेद आर्यसमाज में प्रविष्ट हो सकते हैं, यदि उनको समझ में आ जाए कि आर्यसमाज के सिद्धान्त और मन्तव्य अच्छे और मनुष्य के जीवन के लिए आवष्यक हैं |

(अब गतांक से आगे)

आर्यसमाज के प्रवर्त्त‌क ने पहले तो इस बात पर बल दिया कि जन्म, रंग या देश के अनुसार मनुष्य जाति में जो भेद‌-भाव और द्वेश फैला हुआ है वह वेदों की शिक्षा के सर्वथा विपरीत है | यह ठीक है कि सब मनुष्य एक से नहीं हैं | कोई मूर्ख है, कोई विद्वान है, कोई सदाचारी है, कोई दुराचारी है, कोई क्रूर है, कोई सह्रदय | परन्तु यह भेद गुण,कर्म और स्वभाव के अनुसार है न कि किसी जन्म विशेष या निवासस्थान विशेष के कारण | हर देश में बुरे और भले दोनों रह सकते हैं | हर घर में अच्छे और बुरे उत्पन्न हो सकते हैं | सभी गोरे सह्रदय नहीं होते, सभी काले निर्दयी नहीं होते | सभी अफ्रीकी चोर नहीं हो सकते | सभी काशीवासी सत्यनिष्ठ नहीं हो सकते हैं | सभी स्त्रियां कुलटा नहीं हो सकतीं और सभी पुरुष सदाचारी नहीं हो सकते | इसलिए आर्यसमाज इस सिद्धान्त को नहीं मानता कि ब्राह्मण का लड़का ब्राह्मण ही होगा या शूद्र का लड़का शूद्र ही होगा| ऋषि दयानन्द की इस शिक्षा ने हिन्दुओं के ऊपर तो तुरन्त ही प्रभाव डाला | क्योंकि आर्यसमाज भारतवर्ष‌ में हिन्दुओं के मध्य उत्पन्न हुआ | हिन्दुओं में जन्मपरक भेद-भाव‌ की बिमारी बुरी तरह लगी हुई थी | स्वयं हिन्दुओं के भीतर सैकड़ों उप‌‍-जातियां ब्राह्मणों की, सैकड़ों शूद्रों की, और सैकड़ों वैश्यों की, विद्यमान थी | सैकड़ों जातियां नीच और अछूत समझी जाती थीं जिनको ऊंच जाति वाले न छूते थे, न पढ़ाते थे और उभरने देते थे | हर जाति या उपजाति दूसरी जाति को पराया तथा नीच समझती थी | कुछ ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मणों को नीच समझते थे | उनके साथ रोटी बेटी का व्यवहार न था | आर्यसमाज ने इस भेदभाव को मिटाने का प्र्यत्न किया है और अधिकांश में सफलता मिली है | जो अन्य क्षेत्रीय लोग हैं उनके साथ भी आर्यसमाज समान व्यवहार का पक्षपाती है | किसी भी देश और किसी भी रंग के नर-नारी आर्यसमाज में प्रविष्ट हो सकते हैं और इस कार्यक्रम को अपनाकर, अपना और मानव जाति का कल्याण कर सकते हैं |

अन्य मत मतान्तरों की भान्ति आर्यसमाज यह नहीं मानता कि धर्म विशेष से सम्बन्ध रखने मात्र से कोई मनुष्य अच्छा या बुरा, दुष्ट या श्रेष्ठ, सम्मानित या अपमानित हो सकता है | एक सदाचारी मुसलमान, दुराचारी आर्यसमाजी की अपेक्षा अधिक माननीय है | ईश्वर व्यवस्था में सब एक से हैं | इस प्रकार आर्य समाज विश्व बन्धुत्व का पक्षपाती है | प्राचीन वैदिक काल में यह भेद भाव नहीं था | आर्यसमाज में यह भेद भाव नहीं होना चाहिए | ऐसी परस्थिति उत्पन्न कर देना आर्य समाज का प‌रम उद्देश्य है |

आर्यसमाज का कार्य केवल मनुष्यों तक ही सीमित नहीं है | पशु-पक्षियों में भी हमारे जैसा ही आत्मा है | अतः वह भी हमारी दया के अधिकारी हैं | आर्यसमाज अपने भोजन के लिए किसी पशु को मारना पाप समझता है | जिस प्रकार किसी मनुष्य का धन अपहरण करना पाप है इसी प्रकार अपने खाने के लिए, भेड़, बकरी, मुर्गी, गाय आदि को मारना भी पाप है | और अपने या अपने किसी सम्बन्धों के परलोक को सुधारने के लिए किसी पशु की यज्ञ में हत्या करना भी पाप है | आर्यसमाज यत्न करता है कि संसार के सभ्य मनुष्य हर प्रकार की पशु हत्या को छोड़ देवें, क्योंकि जैसे चोरी चोर की आत्मा को कलुषित कर देती है इसी प्रकार पशु वध हो या पक्षी वध इससे मारने वाले का आत्मा कलुषित हो जाता है | और यदि वर्ग विशेष इस प्रकार के पशु वध को अपना व्यवसाय बना लेता है तो मानवता को छोड़कर उसमें दानवता के अवगुण आ जाते हैं, मनुष्य मनुष्य नहीं रहता, पशु बन जाता है |

आर्य समाज अपने सिद्धान्तों के प्रचार के लिए किसी क्रूर उपाय को करने के विरुद्ध है | अविद्या का नाश और विद्या का प्रकाश फैलेगा तो भ्रान्तियां स्वयं दूर हो जाएंगी और लोग अपने धर्म को समझकर उस पर आरूढ़ हो जाएंगे | इसलिए आर्यसमाज अपने सिद्धान्तों को फैलाने में किसी लालच, धमकी या पाशविक बल का प्रयोग करना उचित नहीं समझता |

आर्यसमाज दम्भ, पंथाईपन या गुरुडम का भी विरोधी है | सत्य को ग्रहण करने और असत्य को त्यागने के लिए सर्वदा उद्यत रहना चाहिए यह आर्यसमाज का एक नियम है | किसी की बुद्धि पर ताला डालना आर्यसमाज के मनतव्यों के विरुद्ध है | मनुष्य की बुद्धि ही मनुष्य का सबसे मूल्यवान गुण है | "निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्" अतः मनुष्य को अपनी बुद्धि की खिड़कियां सदा खुली रखनी चाहिए और हर एक काम धर्म और अधर्म, उचित और अनुचित को विचार के करना चाहिए |

आर्यसमाज व्यक्तिगत् विचार स्वतन्त्र्य की रक्षा करते हुए मनुष्य समाज के निर्माण के लिए समाज-संघटन का आदर करता है | मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है | इसका विकास अलग-अलग रहकर नहीं हो सकता | एक दूसरे की सहायता करनी चाहिए | इसका अर्थ यह है कि हम दूसरों की मान्यताओं को भी आदर की दृष्टि से देखें और जहां आवश्यक हो समाज के कल्याण के लिए अपने कल्याण की उपेक्षा करें | आर्यसमाज निर्बुद्धि भेड़ों का समूह नहीं है जो अपनी बुद्धि को काम में न लाकर किसी गडरिये के पीछे लग जाती है | परन्तु आर्यसमाज ऐसे उच्छृङ्खल व्यक्तियों का समूह भी नहीं है जिसमें दम्भ या अहम्मन्यता हो और जो किसी अन्य की भावनाओं को सहिष्णुता की दृष्टि से न देख सके |

ये हैं संक्षेप और संकेत से आर्यसमाज के उद्देश्य | आप सोचिए, विचारिये, जांचिए और परखिए और यदि आपको भले प्रतीत हों तो आर्यसमाज में प्रविष्ट होकर अपना सहयोग दीजिए |

नमस्ते

नमस्ते आनन्द जी,
बहुत अच्छा लिखा है |
एसी सामग्री छपवा कर सभी जनता मे बटनी चाहिये
आदित्य‌

नमस्ते

नमस्ते अहूजा जी
सुप्रसिद्ध विद्वान् स्व. प. गंगाप्रसाद उपाध्याय् द्वारा लिखित यह् प्रचार‌ पुस्तिका 'सरस्वती साहित्य संस्थान', दिल्ली 92, दूरभाश् 22152435 से आर्यसमाज , नायडा द्वारा 2004 में उपल्ब्ध करायी गई थी | ध‌न्यवाद सहित
आनन्द‌