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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) से (1)

केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः |
केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षु श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ||1||

अर्थ -
किसकी प्रेरणा से मन इच्छित विषय पर गिरता है | किससे नियुक्त हुआ (प्रथमः) फैला हुआ प्राण चलता है | (केन इषिताम्) किससे प्रेरित हुई (इमां वाचम् वदन्ति) यह वाणी बोलती है | (कः उ देवः चक्षुः श्रोत्रं युनक्ति) कौन देव आंखों और कानों को चलाता है ?

श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः |
चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ||2||

अर्थ -
वह कान का कान और मन का मन है | जो निश्चय से वाणी का वाणी है वही प्राण का प्राण और आँख की आँख है | (अति मुच्य) (इन इन्द्रियों से) छूटकर धीर पुरुष इस लोक से (प्रेत्य) पृथक होकर अमर होते हैं ||

व्याख्या -

मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ ? जगत् क्या है ? किसने रचा है ? ये प्रश्न हैं, जो स्वाभाविक, शांति के साथ बैठे हुए मनुष्यों के हृदयों में उत्पन्न हुआ करते हैं | इन्हीं प्रश्नों के समाधान की इच्छा ने फिलौसफी (दर्शन शास्त्र) को जन्म दिया | इसलिए नियम बनाया गया है कि फिलौसफी का अधिकतर विस्तार उन्हीं देशों में हुआ करता है जहाँ शान्ति का साम्राज्य स्थापित हुआ करता है | भारतवर्ष में क्यों इतना अधिक फैलाव दर्शन शास्त्र का हुआ, जिसका उदाहरण पृथ्वी के किसी अन्य भाग में नहीं पाया जाता ? उसका कारण यही है कि भारतवर्ष राम (शान्तिमय) राज्य के लिए प्रसिद्ध है | योरुप में फिलौसफी का थोड़ा बहुत फैलाव जो हुआ उसका होना उसी समय सम्भव हुआ जब योरुप से पोपडम की चढ़ी हुई कमान उतरी और योरुप निवासियों को विचारों को प्रकट करने की स्वतन्त्रता मिली | दर्शन के मूल प्रश्न मनुष्य की नैसर्गिक इच्छा के उत्कृष्ट‌ रूप हुआ करते हैं, अतः उन्हीं नैसर्गिक इच्छा की तह से उठे हुए प्रश्नों के साथ इस उपनिषद् का प्रारम्भ होता है | एक जिज्ञासु के शांत हृदय में प्रश्न उठता है कि मन किस प्रकार संकल्प-विकल्प करता है | कहाँ से उसमें इतना वेग आ जाता है कि जिससे वह कल्पनातीत काल में असंख्य मील दूर पहुँच जाया करता है ? किस प्रकार प्राण अपना विलक्षण काम करके प्राणियों के जीवन का आधार बना हुआ है ? चक्षु श्रोत्रादि इन्द्रियों में जड़ प्रकृति का कार्य होते हुए भी किस प्रकार देखने-सुनने आदि की विचित्र क्रियायें हुआ करती हैं ? उपनिषद् के ऋषि ने उत्तर दिया कि एक शक्ति है और हाँ, वह एक विलक्षण शक्ति है, जो मन, श्रोत्र आदि इन्द्रियों में अपना-अपना व्यापार करने की योग्यता प्रदान करती है और उसी की प्रदान की हुई योग्यता से मन आदि मिट्टी के ढेले के सदृश होते हुए भी, वह-वह विलक्षण काम करते है कि जिनकी कार्यप्रणाली समझने में विज्ञान के टिमटिमाते हुए दीपक धुँधले पड़ रहे हैं और तर्क के बीच आलोचक शास्त्र भी कुंठित हो रहे हैं*| उत्तर के अन्तिम भाग में यह भी संकेत कर दिया गया है कि यदि तुम उस शक्ति का सामीप्य प्राप्त करके अमरता का जीवन प्राप्त करना चाहते हो तो तुम्हें इन्द्रियों के कार्यों (विषयों) में लिप्त नहीं होना चाहिये | उनसे काम लो, उनको अपना-अपना व्यापार करने की स्वतन्त्रता दो, परन्तु तुम उनके कार्यों से निरपेक्ष रहो, उनमें फंसो नहीं, उन पर अधिकार रक्खो |

[* जोजेफ मेकब ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि सम्प्रति मस्तिष्क एक ऐसी तमःपूर्ण गुफा है कि उसमें व्यवच्छेदकों और शरीर विद्या के पण्डितों के दीपक मस्तिष्क की गुप्त समस्याओं को सुलझाने की जगह और उलझन बढ़ा रहे हैं - Evolution of mind by Mecobe P 15 and 16]

(क्रमशः)