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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) प्रथम खण्डः से (2)

न तत्र चक्षुर्गच्छति, न वाग्गच्छति, नो मनो न विद्मो न विजानीमो
यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि |
इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद् व्याचचक्षिरे ||3||

अर्थ -

न वहाँ आँख पहुँचती है, न वाणी पहुँचती है और न मन (इसलिये उसको) न जानते हैं , न जान सकते हैं, जिससे उसका उपदेश किया जा सके | वह ज्ञात वस्तुओं से पृथक है और अज्ञात से भी भिन्न है | ऐसा पूर्व आचार्यों से सुनते हैं जो हमको इसका उपदेश करते आए हैं |

व्याख्या -

क्यों मनुष्यों को इन्द्रियों (के कार्यों) से निरपेक्ष रहना चाहिए ? इसका कारण उपनिषद् के इस वाक्य में दिया गया है और वह कारण यह है कि उस विलक्षण शक्ति तक इन इन्द्रियों की पहुँच नही है | इसलिये इनके माध्यम से कोई उस शक्ति तक नहीं पहुँच सकता | क्यों इन्द्रियों की वहाँ पहुँच नहीं है ? इसका कारण मालुम होना चाहिये | उपनिषद् वाक्य में दो बातें कही गई हैं, पहली बात तो यही (इन्द्रियों की वहाँ पहुँच न होने से सम्बद्ध) है, दूसरी बात यह है कि (अपूर्व) शक्ति को न जानते हैं, न जान सकते हैं क्योंकि वह विदित और अविदित दोनों से पृथक है | यदि दूसरी बात ठीक है तो इन्द्रियों पर क्या निर्भर है, वह प्रत्येक हि की पहुँच के बाहर है क्योंकि अज्ञेय है | इसलिये पहले इसी दूसरी बात पर विचार करना चाहिये कि क्या वह (विलक्षण) शक्ति अज्ञेय है ?

कतिपय विचारकों ने, जिनमें पूर्व और पश्चिम दोनों के विद्वान सम्मिलित हैं, उपनिषद् को अज्ञेयवाद प्रतिपादिका समझा है | पश्चिम के विद्वानों में हर्बर्ट स्पेन्सर और जर्मनी के विद्वान रेमौंड (Duti Bois Raymond) मुख्य रीति से इस वाद (अज्ञेयवाद‌) (Agnoticism) के पोषक थे | स्पेन्सर ने धर्म के अन्तिम ध्येय ब्रह्म‌ के साथ विज्ञान के अन्तिम ध्येय दिशा(Space), काल(Time),प्रकृति (Matter), गति (Motion), शक्ति (Force) और मस्तिष्क (Mind) को भी अज्ञेय ठहराया था, परन्तु उसका यह वाद सीमित था | उसने कहा था कि ब्रह्मा अथवा विज्ञान के मूल वस्तु अज्ञेय हैं, हम उन्हें नहीं जानते | परन्तु जर्मनी के विचारक ने इस पर संतोष नहीं किया | उसने एक पग और आगे बढ़ाया | स्पेन्सर ने जहां कहा था कि "हम उसे नहीं जानते (Ignoramous - We do not know)" वहाँ रेमौण्ड ने कहा कि "हम उसे जानेंगे भी नहीं |(Ignorabemous = We shall never know)" इन पश्चिम के विद्वानों और इनका अनुकरण करने वाले कतिपय भारतीय विद्वानों ने भी एक ओर उस शक्ति को अज्ञेय कहा, दूसरी और कुछेक ऐसे ही विद्वानों ने अज्ञेयवाद सम्बन्धी अपने कथन का आधार उपनिषद् के इसी वाक्य को ठहराया | परन्तु ऐसा कहने में वे भ्रम में थे और हैं | उन्होंने उपनिषद् के इस वाक्य का ठीक भाव नहीं समझा | उपनिषद् के इस वाक्य में जहाँ 'न विद्मो न विजानीमः' अर्थात न उसे जानते और न विशेष यत्न करने से जान सकते हैं, "विदितादथो अविदितादधि " अर्थात वह ज्ञात और अज्ञात दोनों की हद से बाहर है, दो शब्द जो परिणाम रूप में प्रयुक्त हुए हैं, वहाँ इससे पहले इसका कारण दे दिया गया है और वह कारण यह है कि ईश्वर तक इन्द्रियों की पहुँच नहीं है, इसलिए अनिवार्य परिणाम यही निकल सक‌ता है कि इन्द्रियों के द्वारा न उसको जानते और न जान सकते हैं | और यह भी कि इन्द्रियों के द्वारा ही जो ज्ञात और अज्ञात है, उससे भी वह बाहर है, कल्पना करो कि इन्द्रियों द्वारा 100 बातें जानी जा सकती हैं और एक व्यक्ति ने अपनी इस समय तक की आयु में उनमें से 50 बातों को जान लिया है | परन्तु बाकि 50 को अभी तक नहीं जान सका है | परन्तु उन्हें यत्न करने से जान सकता है | तो उसके लिए पहली 50 बातें ज्ञात (विदित‌) और दूसरी 50 बातें अज्ञात (अविदित‌) हैं | उपनिषद् की शिक्षा यह है कि वह (विलक्षण‌) शक्ति इस ज्ञात और अज्ञात दोनों से बाहर है | उपनिषद् के इस वाक्य का अब भाव स्पष्ट हो गया कि चूंकि उस शक्ति तक इन्द्रियाँ नहीं पहुँच सकती, इसलिए कोई भी इन्द्रियों के द्वारा उस शक्ति को नहीं जान सकता** | वह किस प्रकार जाना जा सकता है, इसका वर्णन स्वयं उपनिषत्कार ने इसी उपनिषद् में आगे कर दिया है जिसे आगे के पृष्ठ प्रकट करेंगे |

(क्रमशः)

[** एक दूसरा स्थल भी उपनिषदों में है जिसका ठीक भाव न समझकर उससे भी ईश्वर के अज्ञेय होने का स्वप्न अनेक विद्वान देखा करते हैं | बृहदारण्यकोपनिषद् में एक जगह वर्णित है कि ब्रह्म (प्रकृति अर्थात पंचभूतों के समुदाय‌) के दो रूप हैं ‍- एक मूर्त (स्थूल दृश्य‌) दूसरा अमूर्त (सूक्ष्म दृश्य‌) | इनमें से अग्नि जल और पृथ्वी मूर्त हैं | शेष आकाश और वायु अमूर्त हैं | इसी शिक्षा को उपर्युक्त कथन के बाद अध्यात्म रूप में वर्णन करते हुए प्रक‌ट किया गया है कि शरीर में जितना अंश अग्नि, जल और‌ पृथ्वी का है वह मूर्त (स्थूल दृश्य) है और इसके अतिरिक्त प्राण (रूप में वायु) और शरीर के भीतर का आकाश जो पंचभूतों के अवशिष्ट अंग हैं अमूर्त (सूक्ष्म और अदृश्य) हैं | यहाँ तक वर्णन के बाद उपनिषद् में ब्रह्म के लिए आदेश "नेति नेति" कथन किया गया है | अर्थात ब्रह्म इन इन पंचभूतों के अवयव रूप मूर्त और अमूर्त में से (नेति नेति =न इति न इति) न ऐसा (मूर्त‌) और न ऐसा (अमूर्त) है |{बृहदारण्य कोपनिषद् अध्याय 2, ब्राह्मण 3}

उपनिषद् का वाक्य स्पष्ट है | उसमें साफ तौर से सब वर्णन कर दिया गया है कि ब्रह्म अप्राकृतिक है | वह न प्रकृति का उपादान कारण है, न प्रकृति उसका उपादान कारण (Material cause) है, और न वह स्वयं प्रकृति का स्थूल (मूर्त‌) या सूक्ष्म (अमूर्त‌) रूप ही है | अर्थात उसकी सत्ता प्रकृति से सर्वथा स्वतन्त्र है | परन्तु कई विद्वान संक्षिप्त से इस सारे ब्राह्मण को प्रारम्भ से अन्त तक न पढ़कर प्रारम्भ की 5 काण्डिकाओं को छोड़कर केवल काण्डिका 6 में वर्णित आदर्श "नेति नेति" को लेकर ब्रह्म के अज्ञेय होने का व्यर्थ ढिंढोरा पीटते हैं |]