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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आत्मयुक्त आकाश के दोहन से अमृत पैदा होता है

ओउम् आत्मन्वन्नभो दुह्यते घृतं पय ऋतस्य नाभिरमृतं वि जायते |
समीचीनाः सुदानवः प्रीणन्ति तं नरो हितमव मेहन्ति पेरवः ||
ऋग्वेद 9|74|4||

शब्दार्थ‍ -
आत्मन्वत् + नभः.....आत्मयुक्त आकाश से
घृतम्....................दीप्तियुक्त
पयः.....................अमृत जल
दुह्यते....................दोहा जाता है, उससे
ऋतस्य..................ऋत का
नाभिः...................सम्बन्धी, मूल
अमृतम्.................अमृत
वि + जायते............विशेष रूप से उत्पन्न होता है |
समीचीनाः...............उत्तम चालचलन वाले
सुदानवः.................श्रेष्ठ दानी महानुभाव
तम्.....................उसको
प्रीणन्ति.................तृप्त करते हैं |
पेरवः....................ज्ञानी
नरः.....................मनुष्य
हितम्..................हित को
अव + मेहन्ति.........नीचे बरसाते हैं |

व्याख्या -

आत्मयुक्त आकाश से अमृत बरसने की बात को तैत्तिरीयोपनिषत् में संकेत से कहा है -

स य एषोSन्तर्हृदय आकाशः | तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः, अमृतो हिरण्यमयः | 1|6|1

यह जो हृदय में आकाश‌ है, उसमें यह मनोमय, पुरुष = आत्मा है, जो अमृत तथा ज्योतिर्मय है | हृदय के भीतर का आकाश आत्मा का निवासस्थान है, और वही है परमात्मा की उपलब्धि का मन्दिर | छान्दोग्योपनिषत् (8|1|1) में हृदयाकाश के भीतर रहनेवालों की खोज का आदेश दिया है और कहा है कि वह आकाश इतना महान् है कि इसमें समस्त संसार समाया है, और कि यह शरीर नाश के साथ नष्ट नहीं होता | यह आत्मा अपहतपाप्मा विजरो (अजर‌) विमृत्युः (अमर‌) विशोको (शोकरहित‌)विजिघत्सो (क्षुधारहित‌) अपिपासः (प्यास से शून्य‌) सत्यकामः (सत्य संकल्प) है |" हृदय के भीतरी आकाश में रहने वाले इस आत्मा = परमात्मा का निरूपण करके आत्मज्ञान का महात्म्य वर्णन किया है | प्रतिदिन प्रतीत होते हुए इस अन्तरात्मा के प्रत्यक्ष न होने का हेतु बताकर कहा - अथ य एष सम्प्रसादोSस्माच्छरिरात् समुत्याय परं ज्योतिरूपसम्पद्य स्वेन रूपेणा मिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाच एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति (8|3|4) और यह जो सम्प्रसाद = जीवात्मा इस शरीर से निकलकर परमज्योति को प्राप्त होकर अपने स्वरूप में निष्पन्न होता है, यही अमृत है, यही अभय है, यही ब्रह्म है |

इसी बात को मन्त्र में थोड़े से शब्दों में कहा है - आत्मन्वन्नभो दुह्यते घृतं पयः = आत्मायुक्त आकाश से (हृदयाकाश से) प्रकाशयुक्त अमृत दोहा जाता है | वह अमृत रस का मूल है | कहा है - ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसो अध्यजायत (ऋग्वेद 10|190|1) = ऋत और सत्य उसके प्रदीप्त उज्ज्वल तप से उत्पन्न हुए | इस अमृत से हर कोई तृप्त नहीं हो पाता, वरन् समीचीनाः सुदानवः प्रीणन्ति तम् = अच्छे चाल चलने वाले तथा उत्तम दानी उसे प्रसन्न कर पाते हैं, क्योंकि ऐसे, नरो हितमव मेहन्ति पेरवः = ज्ञानी नर हित की वृष्टि बरसाते हैं | जिन्हें इस आत्मतत्व का बोध नहीं है, ज्ञानी जन उन पर ज्ञानामृत की वृष्टि करते हैं | मन्त्र में साधक की उस अवस्था का वर्णन है, जब वह ब्रह्मामृतरस पान करने लग जाता है |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)