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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (20)

प्रार्थना विषय

त्वं नः सोम विश्वतो रक्षा राजन्नघायतः |
न रिश्येत् त्वावतः सखा ||20||
ऋ. 1|6|20|8||

व्याख्यान -

हे सोम राजन्नीश्वर‌ । तुम "अघायतः" जो कोई प्राणी हममें पापी और पाप करने की इच्छा करने वाले हों "विश्वतः" उन सब प्राणियों से हमारी "रक्ष‌" रक्षा करो जिसके आप सगे मित्र हो "न, रिष्येत्" वह कभी विनष्ट नहीं होता किन्तु हमको आपकी सहायता से तिलमात्र भी दुख वा भय कभी नहीं होगा जो आपका मित्र और जिसके आप मित्र हो उसको दुःख क्योंकर हो ||20||