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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) प्रथम खण्डः से (3)

यद्वाचा..नभ्युदितं येन वागम्युद्यते |
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते ||4||
यन्मनसा न मनुते, येनाहुर्मनो मतम् |
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ||5||
यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यन्ति |
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते ||6||
यच्छ्रोत्रेण न श्रणोति, येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् |
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते ||7||
यत्प्राणेन न प्राणिति, येन प्राणः प्रणीयते |
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते ||8||

इति प्रथमः खण्डः

अर्थ -

जो वाणी द्वारा प्रकाशित नहीं होता, जिससे वाणी का प्रकाश होता है उसी को तू ब्रह्म जान, जिसका वाणी से सेवन किया जाता है, वह (ब्रह्म) नहीं है ||4||

जिसका मन से मनन नहीं किया जाता, जिससे मन मनन करता है, उसी को तू ब्रह्म जान, जिसका मन से मनन किया जाता है वह (ब्रह्म न) नहीं है ||5||

जो आँख से नहीं देखा जाता, जिससे आँख देखती है, उसी को तू ब्रह्म जान, जिसका आँख से सेवन किया जाता है वह (ब्रह्म) नहीं है ||6||

जो कान से नहीं सुना जाता, जिससे कान सुनता है, उसी को तू ब्रह्म जान, जिसका सेवन कान से किया जाता है वह (ब्रह्म) नहीं है ||7||

जो प्राण* से प्राण के व्यापार में नहीं आता, जिससे प्राण अपना व्यापार करता है, उसी को तू ब्रह्म जान, जो प्राण के व्यापार में आता है वह (ब्रह्म) नहीं है ||8||

यह विलक्षण शक्ति (ब्रह्म‌) इन्द्रियों की पहुँच से परे है | न केवल यह कि इन्द्रियाँ वहां नहीं पहुँच सकतीं बल्कि यह भी कि इन्द्रियों द्वारा उसके स्वरूप का प्रकाश भी नहीं हो सकता | उस शक्ति तक इन्द्रियों की पहुँच न होने का मतलब यह है कि उसकी प्राप्ति का साधन इन्द्रियाँ नहीं हैं और उसके स्वरूप का प्रकाश न कर सकने का तात्पर्य यह है कि उसके स्वरूप, उसके गुण कर्म का याथातथ्यतः (ठीक-ठीक‌) प्रकटीकरण, इन्द्रियों द्वारा नहीं हो सकता | इसी अन्तिम बात का वर्णन उपर्युक्त इन 5 उपनिषद् वाक्यों में किया गया है | पहले वाक्य में वाणीं की असमर्थता प्रकट की गई है | अन्यों मे‍ मन, चक्षु, श्रोत्र और प्राण के लिए कहा गया है कि वह शक्ति इनके व्यापार में भी नहीं आ सकती, अर्थात हम उसको न देख‍-सुन सकते हैं, न उसको वर्णन कर सकते हैं, न उसे मन में ला सकते हैं, न इन्द्रियों में श्रेष्ठ प्राण के द्वारा उसका प्रकाश कर सकते हैं | आखिर उसका ज्ञान किस प्रकार हो ? इसका सूक्ष्म विवरण तो आगे मिलेगा, परन्तु स्थूल रीति से उसके समझ लेने को कुछ संकेत यहाँ कर दिया गया है, और वह संकेत यह है कि तुम उस विलक्षण शक्ति के लिए समझो कि वह शक्ति वह है जिसने समस्त इन्द्रियों में अपना व्यापार करने की योग्यता प्रदान की है | उस विलक्षण शक्ति की विलक्षणता यही है कि उसने पकृति को अव्यक्त (Latent) होते हुए भी जगत् रूप में परिणित करके व्यक्त (Patent) कर दिया है, किन्तु स्वयं अव्यक्त रही | एक कवि ने क्या अच्छा कहा है -

राजे हस्ति को मुझ पर हवेदा कर दिया |
गुञ्चये दिल को नसीमे इश्क ने वा कर दिया ||

भेजकर मेखानए दुनिया में साकी ने मुझे |
खुद रहा परदे में मेरा राज अफशां कर दिया ||**

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* [प्राण को तीन प्रकार से समझना चाहिए |

(क‌) प्राण एक वायु है, जिसके दस भेद हैं और् इन्हीं से स्समस्त शरीर का व्यापार चला करता है | प्राण के 10 भेद ये हैं -

1. प्राण‌ - श्वास का बाहर निकलना |
2. अपान - श्वास का भीतर ले जाना |
3. समान - नाभिस्थ शरीर में रस पहुँचाना |
4. उदान - कण्ठस्थ, अन्न पान को भीतर पहुँचाना |
5. व्यान - समस्त शरीर में रक्त का संचार करना |
6. नाग - कै तथा मल का निकालना |
7. कूर्म्म - निमेष..उन्मेष का कारण |
8. कृकल - भोजन..पान की इच्छा से सम्बन्धित |
9. देवदत्त - जम्हाई आदि का कारण |
10. धनञ्जय - मूर्छा..बेसुध होना, खुर्राटा लेना |

अन्तिम 5 प्राणों के सम्बन्ध में यहां एक सन्दर्भ उद्धृत किया जाता है : -
नाग-कूर्म-कृकल देवदत्त धनञ्जयरूपाः पञ्च वायवः | एतेषां कर्माणि च यथाक्रमं उद्गारोन्मीलन-क्षुधाजनन-विजृम्भण-मोहरूपाणि || (संगतिदर्पण अध्याय 1, श्लोक 43, राजा सुरेन्द्र मोहन द्वारा सम्पादित संस्करण |)

(ख‌) दर्शनों में प्राण इन्द्रिय समुदाय का नाम है, परन्तु उपनिषदादि वेदान्त ग्रन्थों में प्राण एक पृथक (अन्त:) करण है, जिसको समस्त इन्द्रियों से तरजीह दी गई है |

(ग‌) सूक्ष्म प्राण एक शक्ति है, जिसके लिए अंग्रेजी भाषा के लेखकों नें Human, Electricity, magnoticism vital force, vital energy आदि अनेक शब्द प्रयोग किये हैं | इसी शक्ति से समस्त शरीर के भीतरी और बाहरी व्यापार हुआ करते हैं |

उपनिषद् में इस जगह प्राण शब्द इन्द्रिय-विशेष के लिए प्रयुक्त हुआ है | ]

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हस्ती = जीवन का भेद
हवेदा = प्रकट
गुञ्चये = कली
इश्क = प्रेम-समीर
वा = खोल देना
मयखानए = जगत् को कवि ने शराबखाना ठहराया है
अफशां = भेद खोल देना |