Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सभा

ओउम् ! विद्म ते सभे नाम नरिष्टा नाम वा असि |

ये ते के च सभासदस्ते मे सन्तु सवाचसः ||

अथर्ववेद 7|12|2

शब्दार्थ -

हे सभे..................हे सभा !
ते.......................तेरा
नाम....................नाम
विद्म....................हम जानते हैं |
वै.......................सचमुच तू
नरिष्टा..................मानव हितकारिणी
नाम....................प्रसिद्ध
असि....................हैं |
ये.......................जो
के+च..................कोई
ते.......................तेरे
सभासदः...............सभासद् हों
ते.......................वे
मे.......................मेरे लिए
सवाचसः...............वाणियुक्त, बोलनेवाले
सन्तु...................हों |

व्याख्या -

सभा, समाज, संगठन बनाकर कार्य्य साधना नया आयोजन नहीं है | यह अत्यन्त पुराना है, उतना पुराना, जबसे कि इस संसार की रंगस्थली पर मनुष्य आया | उसे यह बोध भगवान ने कराया | जिस संघ या व्यक्ति ने अपने प्रतिनिधि चुनकर सभा में भेजे हैं, वह मानो कह रहा है - विद्म ते सभे नाम = हे सभे ! हम तेरा नाम (यश) जानते हैं | सभा में बैठने योग्य को 'सभ्य' कहते हैं, 'सभ्य' के चालचलन को 'सभ्यता' कहते हैं | तनिक ध्यान दीजिए, तो स्पष्ट भान हो जाएगा कि सभ्यता संगठन के बिना नहीं हो सकती | सभा का एक अर्थ है प्रकाशयुक्त, अर्थात सभा एक ऐसे जनसमुदाय को कहते हैं जिसमें सब मिलकर ज्ञानपूर्वक और ज्ञानरक्षक कार्य करते हैं छिपकर अन्धकार में कार्य्य नहीं करते | इसीलिए आगे कहा है - नरिष्टा नाम वा असि = तू सचमुच नरहितकारिणी है |

इस छोटे से मन्त्रखण्ड में सभा का उद्देष्य बता दिया गया है | यदि सभा से जनहित न हो, तो वह सभा नहीं है, उसे तोड़ देना चाहिए | उत्तरार्ध में सभासदों के कर्त्तव्य बताये गये है - ये ते के च सभासदस्यते मे सन्तु सवाचसः = जो कोई तेरे सभासद् हों, वे मेरे लिए बोलनेवाले हों | यदि कोई सभासद् सभा में जाकर चुप रहता है, बोलता नहीं, वह वेदविरुद्ध आचरण करता है | मनुजी ने कहा है - सभां वा न प्रवेष्टव्यं वक्तव्यं वा समंजसम् (8|13)= सभा में प्रवेश नहीं करना चाहिए; प्रवेश करने पर युक्त = उचित बोलना चाहिए | अन्यथा - अब्रुवन् विब्रुवन् वापि नरो भवति कल्बिषी (8|13) = न बोलता हुआ अथवा उलटा बोलता हुआ मनुष्य पापी होता है |

जो ढोंगी सभा में बैठकर - Neutral पक्षरहित होने का दम्भ भरते हैं, वे अवश्य पापी हैं, क्योंकि उन्होंने अपना अथवा निर्वाचकों का पक्ष न बताकर अन्याय और विश्वासघात किया है | उन्हें चाहिए कि - सभां न प्रवेष्टव्यं वे सभा में जाएँ ही नहीं | जो इस प्रकार के पक्षहीन दम्भी हैं, मनु जी उनके सम्बन्ध में कहते हैं - यत्र धर्म्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च | हन्यते प्रेक्षमाणांनां हतास्तत्र सभासदः (8|14) = जिस सभा में सभासदों के देखते देखते अधर्म्म से धर्म्म और झूठ से सच मारा जाता है, उस सभा के सभासद् मरे हुए हैं, अतः वेदभक्त सभासद् कहता है - चारु वदानि पितरः संगतेषु (अ. 7|12|1) = हे पूज्यो, पितरो City fathers ! संगतों = सभाओं में मैं सुन्दर बोलूँ |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)