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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आपका शुक्रिया

आप सबने मेरी लेखनी को पसंद किया,आपका धन्यवाद!पिछले कुछ समय से प्रचार तथा एक शोध कार्य मेँ लगा था अतः आपको समय नही दे पाया,खैर अब पुनः आपकी सेवा मेँ उपस्थित हूँ।मैँ आपको बता दूँ मेरा मकसद हंगामा करना या किसी भद्र पुरुष का दिल दुखाना नही है।पर भगतसिँह ने कहा था कि बहरोँ को सुनाने को धमाके की जरूरत होती है।अब बात दिल से निकलेगी तो दिल पर तो लगेगी ही।आपस मेँ एक दूसरे की गलती सुधारने का वक्त तो चला गया अब सामूहिक गलतियाँ सुधारने का समय है।इसके लिये जरूरी है एकात्मता।संगच्छध्वं संवदध्वं का पाठ तो कर लिया पर कभी अर्थ पर आचरण किया होता तो तस्वीर बदल जाती।हमारे राष्ट्र पर आने वाली मुसीबतेँ कैसे दूर होंगीँ?कौन हमारी संस्कृति तथा संतति की रक्षा करेगा?मेरे भाइयोँ कभी इस पर भी विचार किया करो।राष्ट्र भक्त का पद ईश्वर भक्त से छोटा नही होता अपितु जो राष्ट्र भक्त नही वो ईश भक्त नही हो सकता।माताःभूमिःपुत्रोहं पृथिव्याःके अनुसार मातृभूमि की रक्षा हेतु बलिदान देना हमारा कर्तव्य है।क्योंकि जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।शेष फिर कभी,नमस्ते

अति सुन्दर

अति सुन्दर एवं जुझारू विचारों के लिये बहुत धन्यवाद | आगे सुनने की प्रतीक्षा रहेगी |
आनन्द‌

नमस्ते

नमस्ते जी।
आदित्य आयँ