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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) द्वितीय खण्डः से (1)

यदि मन्यसे सुवेदेति, दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् |
यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् ||1||

अर्थ -

यदि तू मानता है (गुरु शिष्य से कहता है) कि (ब्रह्म को) अच्छी तरह जानता है तो निश्चित तू ब्रह्म के रूप को बहुत थोड़ा जानता है | जो उसका रूप तुझमें है और जो उसका रूप देवों में होना ज्ञात है, उसको तेरे लिए मैं खोज करने योग्य ही मानता हूँ |

नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च |
यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ||2||

अर्थ ‍

(गुरु कहता है) मैं नहीं मानता कि (वह ब्रह्म) अच्छी तरह से जानने योग्य है, (नो) न यह मानता हूँ कि बिलकुल जानने योग्य ही नहीं है, (क्योंकि उसको) जानते भी हैं | (नः) हममें से (यः) जो कोई (तद्, वेद) उसको जानता है वह (तत्, वेद) उसको जानता है | (नो) न कि (न वेद इति) उसे नहीं जानता (वेद, च) और जानता भी है |

यस्यामतं तस्य मतं, मतं यस्य न वेद सः |
अविज्ञातं विजानतः, विज्ञातमविजानताम् ||3||

अर्थ -

जिस‌का (ब्रह्म के सम्बन्ध में) अमत है अर्थात् वह यह अभिमान नहीं रखता कि, ब्रह्म को अच्छी तरह जानता है (तस्य मनम्) वही कुछ जानता है, परन्तु जिसका मत है अर्थात जो अभिमान रखता है कि वह उसे जानता है (न वेद सः) वह कुछ नहीं जानता | ज्ञानाभिमानियों के लिये वह अज्ञात और अज्ञान स्वीकार करने वालों के लिये कुछ ज्ञात है |

व्याख्या -

ब्रह्म के जानने के सम्बन्ध में मन्तव्य क्या होना चाहिये, उसकी इन मन्त्रों में बड़ी महत्वपूर्ण शिक्षा दी गई है | गुरु ने शिष्य को सावधान किया है कि, मनुष्यों में यह विचार कदापि नहीं रहना चाहिए कि वे ब्रह्म को पूर्णतया जानते हैं | यह चेतावनी देने के बाद गुरु ने अपना (उपनिषद्) का मन्तव्य इस प्रकार प्रकट किया है कि वह न तो यह मानता है कि वह ब्रह्म को अच्छी तरह जानता है और न यह कि उसे कुछ भी नहीं जानता | इसलिए उपनिषद् के शब्दों में मन्तव्य यह हुआ कि "न वेदेति वेद च" अर्थात उसे "नहीं भी जानते और जानते भी हैं |" इसका भाव यह है कि ब्रह्म को कुछ तो जानते और कुछ नहीं जानते- ब्रह्म को जितना भी जानते हैं उससे मनुष्य को आस्तिक (ईश्वर विश्वासी) बना रहना चाहिए और जो कुछ नहीं जानते उसके जानने के लिए उस (ब्रह्म) का जिज्ञासु रहना चाहिए | इसी भाव को प्रकट करने के लिए पहले वाक्य में ब्रह्म के सम्बन्ध में "मीमांस्यमेव" (खोज करने योग्य ही) शब्द प्रयुक्त हुए हैं | क्यों ब्रह्म के सम्बन्ध में इस प्रकार की शिक्षा दी हुई है ? इसका कारण यह है कि इस प्रकार की शिक्षा देकर ऋषियों ने जन-समाज को नास्तिक्ता या अज्ञेयवाद के गढ़े में गिरने से बचा लिया | इसका विवरण इस प्रकार है कि मनुष्य यदि ईश्वर के सम्बन्ध में यह विचार रखे कि उसे अच्छी तरह जानता है, तो उसका फल यह है कि, उसमें ईश्वर के लिए उपेक्षा बुद्धि पैदा होगी |
कारण स्पष्ट है और वह यह कि जिस जीज को आदमी अच्छी तरह जान लिया करता है, फिर उसकी और ध्यान नहीं दिया करता | एक विद्यार्थी जिसने एम.ए. या आचार्य परीक्षा में उत्तीर्णता प्राप्त कर ली है, वह अब अंग्रेजी या संस्कृत की प्रारम्भिक पुस्तकों की ओर ध्यान ही नहीं देता क्योंकि उनके लिये उसका विश्वास है कि वे भली-भाँति जानी हुई पुस्तकें हैं | यदि इस प्रकार मनुष्यों में ब्रह्म के लिये उपेक्षा बुद्धि पैदा हो जावे, तो फल यह होगा कि वे (मनुष्य) न ब्रह्म की और ध्यान देंगे, न उसके गुणों का जप करेंगे और ऐसा करने से ईश्वरोपासना से जो मनुष्यों का गुणवृद्धि द्वारा कल्याण हुआ करता है, उससे वंचित रहेंगे | अब मन्तव्य के दूसरे पहलू पर विचार कीजिए | यदि मनुष्य अज्ञेयवादियों सदृश यह समझने और मानने लगे कि ब्रह्म को जान ही नहीं सकते तो फिर उसमें निराशा के भाव उत्पन्न होंगे और वह यह समझने लगेगा कि जिस वस्तु को हम प्राप्त ही नहीं कर सकते अथवा जिस वस्तु का प्राप्त होना सम्भव ही नहीं, उसके लिए यत्न करना निरर्थक और समय को व्यर्थ नष्ट करना है | इसका भी फल यह होगा कि मनुष्य निराशा से न ईश्वर का स्मरण करेंगे और न उसकी उपासना,और इस प्रकार उसके फलस्वरूप गुणोत्कर्ष से वंचित रहेंगे और अपने ही हाथों अपना भविष्य बिगाड़ेंगे | अस्तु, देख लिया गया कि उपनिषद् ने ब्रह्मज्ञान के सम्बन्ध में इस मन्तव्य की शिक्षा देकर कि उसे कुछ जानते हैं और कुछ नहीं जानते जो जानते हैं उससे आस्तिक बने रहें और जो नहीं जानते, उससे उसकी खोज करें, मनुष्य जाति का बड़ा उपकार किया है और उसे दोनो ओर के गड्ढों में गिरने से बचा लिया है | उपनिषद् के तीसरे वाक्य में उपर्युक्त सिद्धान्त ही का दूसरे प्रकार से वर्णन हुआ है | उस (वाक्य‌) में कहा गया है कि जिसका अमत है अर्थात जो ईश्वर के सम्बन्ध में, परिमित सम्मति कि वो ऐसा है, ऐसा है, नहीं रखता वह ईश्वर को कुछ जानता है परन्तु जो कोई परिमित सम्मति कि वह ईश्वर को पूर्ण रीति से जानता है, रखता है, उपनिषद् का कहना है कि वह उसे नहीं जानता | इससे स्पष्ट है कि यह दावा करने वाले कि वे उसे अच्छी तरह जानते हैं,वास्तव में उसे नहीं जानते परन्तु जो पुरुष अपनी अल्पज्ञता प्रदर्शित करते हुए उसके न जानने का, खुले तौर से, इकबाल करते हैं, वे ही उसे कुछ जानते हैं |

'जिन खोजा तिन पाइयाँ' की प्रसिद्ध कहावत के अनुसार ईश्वर की खोज करने वाले उस (ब्रह्म‌) का कुछ न कुछ अधिक ज्ञान प्राप्त करते ही रहते हैं और यही ज्ञान-वृद्धि अन्त में उनके कल्याण का कारण हुआ करती है | एक कवि ने क्या अच्छा लिखा है : -

हँस के दुनिया में मरा कोई, कोई रो के मरा |
जिन्दगी पाई मगर उसने, जो कुछ हो के मरा||

जी उठा मरने से वह, जिसकी प्रभु पर एक नजर |
जिसने दुनिया को ही पाया था, वह सब खो के मरा ||

(क्रमशः)