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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) द्वितीय खण्डः से (2)

प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते |
आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेSमृतम् ||4||

अर्थ -

प्रतिबोध द्वारा (विदितं) प्राप्त हुए (मतम्) ज्ञान से, निश्चित है कि अमरत्व प्राप्त होता है | (आत्मना) पुरुषार्थ = कर्म से बल और ज्ञान से अमरत्व प्राप्त होता है |

व्याख्या -

मनुष्य के अधिकार में ज्ञानोपलब्धि के दो साधन इन्द्रिय और आत्मा हैं | इन्द्रियों से जो ज्ञान प्राप्त होता है उसे बोध और आत्मा के द्वारा जिस ज्ञान की उपलब्धि होती है, उसे प्रतिबोध कहते हैं | इन्द्रिय शब्द के अन्तर्गत अन्तःकरण* और बाह्यकरण दोनो शामिल हैं | बाह्यकरण दस इन्द्रियाँ हैं, और अन्तःकरण मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार का नाम है | आत्मा की दो वृति हैं -
(1) बहिर्मुखी वृति, (2) अन्तर्मुखी वृति |

आत्मा जब बाह्य जगत में काम करना चाहता है, तब उसकी बहिर्मुखी वृति काम करती है, और जब अपने भीतर ही काम करता है, तब अपनी अन्तर्मुखी वृति से काम लेता है | बहिर्मुखी वृति का काम बुद्धि, मन और इन्द्रियों के माध्यम से हुआ करता है, परन्तु अन्तर्मुखी वृति के लिए किसी माध्यम की जरूरत नहीं है | बहिर्मुखी वृति के द्वारा उपलब्ध ज्ञान का नाम ही बोध है, परन्तु जो ज्ञान अन्तर्मुखी वृति के द्वारा प्राप्त हुआ करता है उसे बोध नहीं कह सकते; उसका नाम प्रतिबोध है | उसके प्रतिबोध कहे जाने का कारण यह है कि, वह बहिर्मुखी वृति द्वारा प्राप्त ज्ञान के प्रकार की दृष्टि से विभिन्नता रखता है | आत्मा का स्वाभाविक गुण ज्ञान के सिवाय प्रयत्न भी है, इसलिए आत्मा सतत प्रयत्नशील रहता है | सतत प्रयत्नशीलता का मतलब यह है कि आत्मा की दोनों वृतियों में से एक न एक सदैव काम करती रहती है | जब एक वृति रुकती या रोकी जाती है, तो उसका फल यह होता है कि, दूसरी वृति बिना किसी प्रयत्न के स्वयमेव यान्त्रिक रूप से, काम करने लगती है | जब मनुष्य प्रयत्नशील होकर 'ध्यान' (योग का सातवाँ अंग) के अभ्यासों द्वारा मन निर्विषय कर दिया करता है, तब बहिर्मुखी वृत्ति बन्द होकर अन्तर्मुखी वृति स्वयमेव जारी हो जाया करती है | इस अन्तर्मुखी वृति का कार्यक्षेत्र आत्मा और परमात्मा होते हैं, इसलिए आत्मा को जो ज्ञान अपना या ईश्वर का प्राप्त हुआ करता है, उसी का नाम प्रतिबोध हुआ करता है | उपनिषद् के इस व्याख्यान्तर्गत वाक्य में शिक्षा यह दी गई है कि इस प्रतिबोध (आत्मानुभव) से, प्राप्त विज्ञान से, मनुष्य अमरता (मोक्ष‌) प्राप्त करता है | उसे अपने उत्कर्ष से बल (शारीरिक, मानसिक और आत्मिक तीनों प्रकार का) प्राप्त करना चाहिए | और उपलब्ध विज्ञान से अमरता लाभ करना चाहिए | परन्तु इस प्रतिबोध की प्राप्ति अहंकार के तिरोहित या नाश होने से ही हुआ करती है | अहंकार के नाश से ममता का नाश होता है और ममता के नाश से मनुष्य (आत्मा) और परमात्मा के बीच से 'दुई परदा' उठ जाता है | यही मनुष्य जीवन का अंतिम ध्येय है : -

दिया अपनी खुदी को जो हमने मिटा,
वह जो परदा सा बीच में था न रहा |

रहा परदे में अब न वह परदा नशीं,
कोई दूसरा उसके सिवाय न रहा ||

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महतो विनष्टिः |
भूतेषु भूतेषु विचिन्त्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ||5||

इति द्वितीय खण्डः ||2||

अर्थ -

यहीं यदि उस (ब्रह्म) को जान लिया तो ठीक है, (परन्तु) यदि उसे यहाँ न जाना तो सर्वानाश हुआ | धीर पुरुष प्रत्येक भूत में उसकी खोज (तत्वज्ञान प्राप्त) करके इस लोक से पृथक होकर अमर हो जाते हैं |

व्याख्या -

उपनिषद् के इस खण्ड में ब्रह्मज्ञान का साधन बतलाकर चुनौती दी है कि उसे (ब्रह्म) को प्राप्त जीवन ही में जानने का यत्न करना चाहिए, अन्यथा ऐसा न करने से हानि होगी | जगत् के एक एक पदार्थ में ब्रह्म आकाश्वत् ओत-प्रोत हो रहा है | इसलिए उसकी खोज तत्व-ज्ञान प्राप्त करते हुए ही करनी चाहिए | इस प्रकार उसकी खोज करते हुए धीर पुरुष अमरत्व प्राप्त किया करते हैं |

1. एक जगह टालस्टाय ने भी इसी प्रकार की बात कही है | उसने कहा कि - ईश्वर हममें से प्रत्येक के अन्दर विराजमान है | मनुष्य का सर्वोच्च पुरुषार्थ इसी में है कि, उस दिव्य ज्योति के प्रकाश से अपने हृदय को प्रकाशित रक्खें | उसके शब्द ये हैं ; -

The spirit of God exists in each one of us, the highest good for man is to cherish this Divine Spirit within himself. - Tolstoy

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(*) अन्तःकरण और उसकी कार्य-प्रणाली अच्छी तरह समझ ली जावे, इसके लिए यहाँ कुछ विवरण दिया जाता है : -

(क‌) मन का काम 5 ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करना बाकी पाँच कर्मेन्द्रियों से कर्म कराना है, इसलिए मन को इन्द्रियों का राजा कहा जाता है | मन का स्थान हृदयाकाश है, परन्तु सूक्ष्म ज्ञानेन्द्रियों की जगह जिनसे मन का काम लिया जाता है मस्तिष्क है | जर्मनी के एक वैज्ञानिक 'फ्लेशजक' (Paul Flechsig of Leipzig) की खोज के अनुसार मस्तिष्क के भूरे मज्जा क्षेत्र, इन्द्रियानुभव के 4 अधिष्ठान या भीतरी (सूक्ष्म‌) गोलक हैं जो इन्द्रियसंवेदना को ग्रहण करते हैं :-(1) स्पर्श ज्ञान का गोलक मस्तिश्क के खड़े लोथ‌ड़े में, (2) घ्राण का सामने के लोथ‌ड़े में,(3) दृष्टि (आँख) का पिछले लोथ‌ड़े में, और (4) श्रवण का कनपटी के लोथ‌ड़े में, (देखो 'आत्म दर्शन‌' पृष्ठ 257 पहला संसकरण‌)| इन्द्रियों से काम लेने के सिवाय मन का दूसरा काम अपने भीतर संकल्प और विकल्प करना है | जागृत और स्वप्न दोनों अवस्थाओं से इसका सम्बद्ध है | सुषुप्ति गाढ़ निद्रा में मन बेकार सा रहा करता है |

(ख‌) बुद्धि की दो तहें अथवा दो भाग हैं, (1) तार्किक बुद्धि (2) मेधावी बुद्धि | तार्किक बुद्धि का काम तर्क है, अर्थात तर्क से सत्यासत्य का विवेक करना | मेधावी बुद्धि का काम यह है कि तर्क द्वारा निश्चित सत्य पर श्रद्धा या विश्वास उत्पन्न कर देना | बुद्धि का स्थान मस्तिष्क है |

(ग) चित्त के दो भाग हैं (1) एक भाग का काम उद्वेग (Emotions) पैदा करना है | (2) दूसरा भाग स्मृति, वासना और संस्कार का स्थान है |
'स्मृति' - शिक्षा, उपदेश और अध्ययनादि के द्वारा मनुष्य जो ज्ञान प्राप्त किया करता है, वह ज्ञान चित्त के भण्डार में जमा हो जाया करता है , उसी ज्ञान को स्मृति और उस एकत्रित ज्ञान ही का नाम स्मृति भण्डार हुआ करता है |

'वासना' - कर्म करने से अभ्यास का एकांश बना करता है | उसी अंश का नाम वासना हुआ करता है | इस वासना का काम यह है कि, उसी कर्म को जिसकी वह वासना है, फिर करने की भीतर से प्रेरणा किया करती है |

'संस्कार' - मनुष्य के चित्त पर उन समस्त घटनाओं के जो उसके या अन्यों के द्वारा घटित हुआ करती हैं, प्रभाव पड़ा करते हैं, इसी को चित्त पर छाप लगाना भी कहते हैं | इसी प्रभाव या छाप (Impressions) को संस्कार कहा करते हैं |

मनुष्य के कर्तृत्व पर इन तीनों का प्रभाव पड़ा करता है |

अहंकार - अहंकार का काम समष्टित्व (कुल) में से व्यष्टित्व (जुज) का निर्माण करना है | मेरा धन, मेरी सम्पत्ति, मेरा पुत्र, मेरी स्त्री, मेरा शरीर आदि भावनाओं का प्रादुर्भाव अहंकार की सत्ता से हुआ करता है |व्यक्तित्व (Individuality) अहंकार के बिना नहीं बन सकती, और व्यक्तित्व के निर्माण के बिना जगत् न बन सकता और न स्थिर ही रह सकता है |