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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

घर की गौ की महिमा

ओउम् | स्व आ दमे सुदुधा यस्य धेनुः स्वधां पीपाय सुभ्व‌न्नमत्ति |
सो अपां नपादूर्जय‌न्नप्स्व 1न्तर्वसुदेयाय विधते वि भाति ||

ऋग्वेद 2|35|7||

शब्दार्थ -

यस्य.......................जिसके
स्वे.........................अपने
आ..........................ही
दमे.........................घर में
सुदुधा......................उत्तम दुध देने वाली, आसानी से दोही जाने वाली
धेनुः........................दुधारु गौ है वह
स्वधाम्....................अपनी शक्ति को
पीपाय......................बढ़ाता है और
सुभु.........................उत्तम रीति से सिद्ध होने वाले
अन्नम्.....................अन्न को
अत्ति.........................खाता है |
सः..........................वह
अपाम् + नपात्.............जीवनी शक्ति को पतित न होने देने वाला
अप्सु +अन्तः, अपां + नपात्...जलों के भीतर रहने वाली बिजली के समान
उर्जयऩ्....................बल सम्पन्न होता हुआ
वसुदेयाय..................धन देने योग्य
विधते.....................मेधावी के लिए
विभाति....................विशेषतः चमकता है |

व्याख्या -

वेद की उपदेश करने की शैली निराली है | वेद कहीं आदेश करता है, कहीं निषेध करता है, कहीं प्रार्थना द्वारा कर्त्तव्याकर्त्तव्य का बोध कराता है, कहीं वास्तविक स्थिति आगे रख कर समझाता है |

इस मन्त्र में जो बात कही है, वह पहले भी ठीक थी, आज भी सत्य है और कल को भी यथार्थ होगी |वेद के उपदेश सामयिक नहीं, वरन् सदातन = सदा रहने वाले, त्रिकालाबाधित हैं | अथर्ववेद 5|28|3 में कहा है -

त्रयः पोषास्त्रिवृति श्रयन्तामनक्तु पूषा पयसा घृतेन |
अन्नस्य भूमा पुरुषस्य भूमा भूमा पशूनां त इह श्रयन्ताम ||

इस त्रिगुणात्मक जगत् में तीन पुष्टियाँ बनी र‌र्हें - (1) अन्न की बहुतायत (2) पुरुषों की बहुलता तथा (3) पशुओं की बहुतायत | ये इस संसार में बनी रहें, पशुपति दूध-घी से भरपूर रहें | दूध-घी कहाँ से आये ? पशुओं से | पशुओं मे‍ गौ का घी-दूध सबकी अपेक्षा उत्कृष्ट माना गया है | अतएव वेद में गौ की महिमा बहुत है | यथा - गावो भगो गाव इन्द्रो मे | (अथर्ववेद 4|21|5) = गौएँ ही भाग्य और गौएँ ही मेरा ऐश्वर्य हैं |

यूयं गावो मेदयथा कृशं चिदश्रीरं चित्कृणुथा सुप्रतीकम|
भद्रं ग्रृहं कृणुथ भद्रवाचो बृहद्वो वय उच्यते सभासु ||
अथर्ववेद 4|21|6

गोएँ दुबले को भी मोटा कर देती हैं और शोभाहीन को भी सुन्दर बना देती हैं | मधुर बोली वाली गौएँ घर को कल्याणमय बना देती हैं | सभाओं में गौओं की बहुत कीर्ति कही जाती है |

गौओं को पालने की रीति का भी थोड़ा संकेत है -
प्रजावती सूयवसे रुशन्तीः शुद्धा अपः सुप्रपाणे पिबन्तीः |
अथर्ववेद 4|21|7

सन्तान सहित गौएँ उत्तम चारे के कारण पुष्ट हों, उत्तम जलपान के स्थान में शुद्ध जल का पान करें |

आज गोभक्त आर्य इस उपदेश को भूल सा गया है | अब न अच्छा चारा देते हैं और न गौओं को शुद्ध जल पिलाने की व्यवस्था की जाती है | यह तभी हो सकता है जब स्व आ दमे सुदुधा यस्य धेनुः - अपने घर में ही उत्तम दूध देने वाली गौ हो |

वेद के कथनानुसार जिसके दूध के पीने से दुर्बल भी हृष्ट पुष्ट हो जाते हैं और श्रीहीन सुश्रीक = सुन्दर शोभामान् हो जाते हैं, उससे पूरा लाभ उठाने के लिए उसे घर में पालना अच्छा होता है | इसका दूध पीने से गोपति जल में विद्युत् के समान चमकता है ||

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार)