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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

हिंसक को मोक्ष धन नहीं मिलता

ओउम् | न दुष्टुतिर्द्रविणोदेषु शस्यते न स्त्रेधन्तं रयिर्नशत् |
सुशक्तिरिन्मघवं तुभ्यं मावते देष्णं यत्पार्य्ये दिवि ||

सामवेद उत्तरार्चिक 4|43|2(868)

शब्दार्थ ..
दुष्टुतिः........................बुरी कीर्त्तिवाला, दुष्ट साधनोंवाला,
द्रविणोदेषु....................धनदाताओं में
न............................नहीं
शस्यते.......................गिना जाता, अच्छा माना जाता |
स्त्रेधन्तम्....................हिंसक को
रयिः.........................धन, मोक्षधन,
न............................नहीं
नशत्........................प्राप्त होता | हे
मघवऩ्.......................पूजनीय धनवन् भगवान !
मावते........................मेरे जैसे के लिए
पार्य्ये........................पार पाने योग्य
दिवि.........................प्रकाशावस्था में
देष्णम्.......................देने योग्य
यत्..........................जो धन है,
सुशक्तिः.....................उत्तम शक्तिवाला मनुष्य
इत्...........................ही
तुभ्यम्.......................तेरे निमित्त (उसको प्राप्त करता है) |

व्याख्या -

इस मन्त्र में जिस धन की चर्चा है, वह साधारण धन = धन-धान्य, पशु आदि नहीं; वरन् शान्ति-रूप धन है | वेद में कहा भी है - शं पदं मघं रयीषिणे - सामवेद 441 | धनाभिलाषी के लिए शान्ति-रूपी धन ही प्राप्त करने योग्य है | लौकिक धन-धान्य तो चोर डाकुओं के पास भी होता है | वैसे भी धन की अधिक मात्रा प्रायः अन्याय, अत्याचार , अनाचार से ही कमाई जाती है, किन्तु इस धन से बुद्धिमानों की तृप्ति नहीं होती | याज्ञवल्क्य जब घर छोड़कर संन्यासी बनने लगे, तो उन्होंने धर्मपत्नी मैत्रेयी से कहा - आ मैत्रेयी ! तेरा बटवारा कर दें | इस पर मैत्रेयी ने पूछा -

यन्नु म इयं भगो सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् | स्यान्न्वहं तेनामृता | बृहदा 4|5|3

भगवन ! धन-धान्य से पूर्ण यदि यह सम्पूर्ण पृथिवी मेरी हो जाए तो क्या मैं अमृत हो जाऊँगी ? सत्यदर्शी यथार्थवक्ता याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं -

नेति नेति.. यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्याद्, अमृत‌त्त्वस्य नाशास्ति वित्तेन | बृहदा 4|5|3

नहीं, नहीं,.... जैसे धन-धान्य सामान वालों का जीवन होता है, वैसे ही तेरा जीवन भी होगा | अमृत्तत्व की = मुक्ति की आशा = सम्भावना धन से नहीं हो सकती |
इस पर मैत्रेयी कहा -

येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्य्या यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूही | बृहदा 4|5|4

जिससे मैं मुक्त न हो सकूँ, उससे मेरा क्या प्रयोजन ? महाराज ! मोक्ष का जो भी साधन आप जानते हैं वही मुझे बताइए |

धन के प्रति कितनी ग्लानि है ! कितना गहरा निर्वेद है ! सचमुच मोक्षाभिलाषी, शान्ति की कामना वाला इस चञ्चल धन को कैसे चाहेगा, जिसके सम्बन्ध में वेद स्वयं कहता है -

ओ हि वर्त्तन्ते रथ्येव चक्राSन्यमन्यमुपतिष्ठन्तः रायः | ऋग्वेद 10|117|5

अरे धन तो सचमुच एक से दूसरे के पास जाते हुए रथ के चक्रों की भाँति अदलते-बदलते रहते हैं | ऐसे विनश्वर भौतिक धन में अविनाशी के अभिलाषी की अभिलाषा कैसी !!! इसीलिए प्रकृत मन्त्र में कहा है -

न दुष्टुतिर्द्रविणोदेषु शस्यते |

दुष्ट साधनों वाला मनुष्य धनदाताओं में नहीं गिना जाता | जब उसके पास है ही नहीं, तब देगा कहाँ से ? वेद पाने की बात न कहकर देने की कहता है, क्योंकि वेद दान की महत्ता का प्रचारक है | ऋग्वेद ने तो स्पष्ट कर दिया -

न दुष्टुती मर्त्यो विन्दते वसु | ऋग्वेद 7|32|21

मनुष्य दुष्ट उपायों से धन प्राप्त नहीं कर सकता |

दूसरे चरण में बहुत स्पष्ट कहा है -

न स्त्रेधन्तं रयिर्नशत् - हिंसक भी धन नहीं प्राप्त कर सकता |

कितना ही शास्त्रवेत्ता क्यों न हो, जब तक हिंसादि दुष्ट उपायों को नहीं छोड़ता, तब तक शान्ति-धन, आत्म-सम्पत्ति को नहीं प्राप्त कर सकता | यम ने मार्मिक शब्दों में नचिकेता को समझाया था -

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः |
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् || कठोपनिषद् 2|22

जो दुराचार से नहीं हटा, जो चञ्चल है, जो प्रमादी है, सावधान नहीं है, जिसके धन में क्षोभ है, वह बुद्धि से , ज्ञान से इस आत्मा को नहीं प्राप्त कर सकता |

आत्मज्ञान के बिना शान्ति नहीं | जब प्रमाद, अनाचार से आत्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती तब उसकी प्राप्ति के बाद प्राप्त होने वाली शान्ति-सम्पत्ति की प्राप्ति की आशा कैसे की जा सकती है ?

वेद कहता है , देने योग्य धन को कोई शक्तिशाली ही प्रभुसमर्पण की भावना से प्राप्त कर सकता है | बलहीन का संसार में ही ठिकाना नहीं, परलोक की तो बात ही क्या ? वहाँ के लिए उपयुक्त् धन कमाने को बड़ा बल चाहिए |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार)