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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (24)

प्रार्थना विषय
पराणुदस्व मघवन्नमित्रान्त्सुवेदा नो वसू कृधि |
अस्माकं बोध्यविता महाधने भवा वृधः सखीनाम् ||24||

ऋ.5|3|21|25||

व्याख्यान -

हे मघवन् परमैश्वर्यवन् इन्द्र परमात्मन् ! "अमित्रान्" हमारे सब शत्रुओं को "पराणुदस्व" परास्त कर दे | हे दातः ! "सुवेदाः नो, वसू, कृधि" | "अस्माकं बोध्यविता" हमारे लिए सब पृथिवी के धन सुलभ कर | "महाधने" युद्ध में हमारे और हमारे मित्र तथा सेनादि के "अविता" रक्षक "वृधः" वर्द्धक "भव" आप ही हो तथा "बोधि" हमको अपने ही जानो | हे भगवन् ! जब आप हमारे रक्षक योद्धा होंगे, तभी हमारा सर्वत्र विजय होगा इसमें सन्देह नहीं ||24||