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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) तृतीय खण्डः से (1)

ब्रह्म ह देवोभ्यो विजिग्ये, तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त, त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोSस्माकमेवायं महिमेति ||1||

अर्थः - ब्रह्म निश्चय देवों के लिये विजयी हुआ, उस ब्रह्म की विजय से देव बढ़ने (अभिमान करने) लगे | वे समझने लगे कि हमारी ही यह विजय है और हमारी ही यह महिमा है ||1||

तद्धैषां विजज्ञौ, तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव, तन्न व्यजानन्त किमिदं यक्षमिति ||2||

अर्थः - वह (ब्रह्म) इन (देवों) का (भाव) जान गया और उनके समक्ष प्रकट हुआ | (परन्तु) वे देव न जान सके कि यह यक्ष* कौन है ? ||2||

तेSग्निमब्रुवन् जातवेद एतद्विजानीहि किमेतद्यक्ष मिति तथेति ||3||

अर्थः - उन्हीं (देवों) ने अग्नि से कहा कि हे जातवेद ! जानो कि यक्ष कौन है ? अग्नि ने यह स्वीकार कर लिया ||3||

तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत् कोSसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्य ब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ||4||

अर्थः - वह अग्नि (ब्रह्म के पास) गया | उससे ब्रह्म ने पूछा कि तू कौन है अग्नि ने उत्तर दिया कि मैं अग्नि हूँ और मुझ ही को जातवेदा भी कहते हैं ||4||

तस्मिंस्तवयि किं वीर्यमित्यपीदं सर्व दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति ||5||

अर्थः - (ब्रह्म ने पूछा कि) तुझ में क्या शक्ति है | (अग्नि ने उत्तर दिया कि) इस पृथिवी पर जो कुछ है उस सब को मैं जला सकता हूँ ||5||

तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति, तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते, नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ||6||

अर्थः - उस (अग्नि) के लिए एक तिनका रख दिया (और ब्रह्म ने कहा) कि इसको जला, (अग्नि) उस तिनके के पास पूर्ण वेग के साथ गया (परन्तु) उसे जला न सका | तब वह पीछे लौट आया (और देवों से कह दिया) जो यह यक्ष है, उसके जानने में मैं असमर्थ हूँ ||6||

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[* - आख्यायिका में आये "यक्ष" शब्द का भाव परब्रह्म परमेश्वर ही है | इसके लिये कुछ प्रमाण दिये जाते हैं :-

(1) अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पुरयोध्या |

तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः ||

तस्मिन् हिरण्यये कोशे त्र्वरे त्रिप्रतिष्ठिते |

तस्मिन् यद् यक्षमात्मन्वत् तद्वै ब्रह्मविदो विदुः ||

(अथर्व. 10|2|31, 32)

अर्थात जिसमें 8 चक्र और नव द्वार हैं, ऐसी अयोध्या देवों की नगरी है | उसमें प्रकाशमय कोश जो तेज से परिपूर्ण स्वर्ग हैं | उस प्रकाशमय कोश में जो तीन अरों से तीन केन्द्रों में केन्द्रित हैं और जिसमें आत्मवान् यक्ष है, उसे ब्रह्मवेत्ता जानते हैं |

(2) यक्षं पृथिव्यामेकवृदेकः ||
(अथर्व वेद)

अर्थात पृथिवी में एकवृत (व्यापक) यक्ष एक ही है |

(3) महद्यक्षं भुवनस्य मध्ये तस्मै बलिं राष्ट्र्भृतो भरन्ति |
(अथर्ववेद 10|8|15)

अर्थात त्रिभुवन के मध्य में जो बड़ा यक्ष है, उसके लिये राष्टृ के सेवक बलि देते अर्थात् अपने को न्यौछावर करते हैं |

इसके सिवाय और भी बहुत प्रमाण दिये जा सकते हैं परन्तु विस्तार के भय से नहीं दिये गये हैं | उपनिषद् की की इस व्याख्या के अन्त में अथर्ववेद का 'केन सूक्त' परिशिष्ट के तौर से दिया गया है | उसमें इस यक्ष का समर्थन मिलेगा |]

(क्रमशः)