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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

भगवान का ज्ञान तारक

ओउम् | अग्निर्धिया स चेतति केतुर्यज्ञस्य‌ पूर्व्यः |
अर्थं ह्यस्य तरणि ||

ऋग्वेद 3|11|3

शब्दार्थ -

अग्निः...................सबकी उन्नति करनेवाला
सः.......................वह भगवान
धिया....................ध्यान से
चेतति...................चिताया जाता है, वह
यज्ञस्य..................संसार-यज्ञ का
पूर्व्यः....................पूर्व से विद्यमान
केतुः....................केतु है, इसकी
अर्थम्...................प्राप्ति, ज्ञान
हि.......................सचमुच
तरणि...................तारक है |

व्याख्या -

लोग पूछते हैं भगवान कैसे हैं ? हम पूछते हैं, मिठास क्या है ? समझा-समझाकर संसार हार गया, मिठास का सार न बता सका | अन्त में थककर कहा, ये लो, यह‌ मिठासवाला पदार्थ है, इसे खाओ, जो स्वाद लगे, वह मिठास है | भौतिक मिठास की भौतिक वाणी न कह सकी और न कभी कह सकेगी | तुम अभौतिक ब्रह्म की बात पूछते हो, उसे भौतिक वाणी, जो भौतिक पदार्थों के वर्णन में असमर्थ सिद्ध हो चुकी है, कैसे बखान करे ? वाणी का व्यापार बन्द करो, वह वाणी से ज्ञेय नहीं है - अग्निर्धिया स चेतति वह अगुआ भगवान् ध्यान से चिताया जाता है | ध्यान क्या है ? ध्यानं निर्विषयं मनः |- (सांख्य दर्शन 6|25) मन की वह दशा, जब उसमें आँख, नाक आदि इन्द्रियों से प्रतीत होनेवाले विषय हों ही न, वह ध्यान है | आँख, नाक, कान आदि इन्द्रिया मूँद दो, इनका व्यवहार रोक दो, मन को भी खाली कर दो, तब उस हृदयगुहा में रहनेवाले अधूम अग्नि के दर्शन होंगे |

मन का खाली करना कठिन है | इसे खाली किये बिना उसका चिताना कठिन है | संसार और भगवान् का एक-साथ ध्यान नहीं किया जा सकता | मन निर्बल है, दुर्बल है | उसमें एक-साथ दोनों को धारण करने का सामर्थ्य नहीं है | आपकी इच्छा है, उससे भगवान का ध्यान करो | आपकी इच्छा है, उससे व्यवहार-व्यापार कराओ | यह एक समय में एक ही कार्य करेगा | ज्ञानीजन उसी का ध्यान करते हैं क्योंकि उन्हें निश्चय है कि अर्थ ह्यस्य तरणि इसकी प्राप्ति तारक है | यम ने इसी भाव को लेकर कहा था -

यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् |
अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतँ,शकेमाहि ||

कठोपनिषद् 1|3|2

जो ब्रह्मयज्ञ करने वालों के लिए पुल है, जो अविनाशी ब्रह्म सबसे उत्कृष्ट है, संसार-सागर को पार करने के अभिलाषियों के लिए जो भयरहित पार करने का साधन है, उस नाचिकेत = सर्वसंशयनाशक ब्रह्मज्ञान का हम सम्पादन कर सकें |

इसी कारण औपनिषद् ऋषि उस ब्रह्म को जानने पर अधिक बल देते थे | मुण्डक ऋषि ने कह ही तो दिया -‍

तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुंचयामृतस्यैष सेतुः ||. मुण्डक. 2|2|5

उसी एक परमात्मा को जानो, अन्य सब बातें छोड़ दो, क्योंकि वही अमृत का सेतु है | आओ, उसका ध्यान लगाओ, और पार हो जाओ |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार)