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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (1)

अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् | होतारं रत्नधातमम् ||1||
ऋग्वेद 1|1|1||

उपकार के लिये हम लोग विद्यादि दान और शिल्पक्रियाओं से उत्पन्न करने योग्य पदार्थों के देनेहारे तथा उन पदार्थों के उत्पन्न करने के समय से पूर्व भी छेदन धारण और आकर्षण आदि गुणों के धारण करने वाले शिल्प विद्या साधनों के हेतु अच्छे अच्छे, सुवर्ण आदि रत्नों के धारण कराने तथा युद्धादिकों में कलायुक्त शस्त्रों से विजय करानेहारे भौतिक अग्नि की बारंबार इच्छा करते हैं |
...परमार्थ और व्यवहार विद्या की सिद्धी के लिये अग्नि शब्द करके परमेश्वर और भौतिक ये दोनों अर्थ लिये जाते हैं | जो पहले समय में आर्य लोगों ने अश्वविद्या के नाम से शीघ्रगमन का हेतु शिल्पविद्या उत्पन्न की थी वह अग्निविद्या की ही उन्नति थी | आप ही आप प्रकाशमान सब का प्रकाश और अनन्त बलवान् आदि हेतुओं से अग्निशब्द करके परमेश्वर, तथा रूप दाह प्रकाश वेग छेदन आदि गुण और शिल्पविद्या के मुख्य साधक आदि हेतुओं से प्रथम मन्त्र में भौतिक अर्थ का ग्रहण किया है ||1||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित् एवं उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (1)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Sarswati's RIGVED Bhashya)