Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) तृतीय खण्डः से (2)

अथ वायुमब्रुवन् वायवेंतद् विजानीहि, किमेतद्यक्षमिति तथेति ||7||

तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत् कोसीति वायुर्वा अहमस्मीत्यव्रवीन्मातरिश्वा वा अहस्मीति ||8||

तस्मिंस्त्वयि: किं वीर्यमित्यपीदं सर्वमाददीय यदिदं पृथिव्यामिति ||9||

तस्मै तृणं निदिधावेतदादत्स्वेति, तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकाSSदातुं, स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ||10||

अर्थ:- तब (देवों ने) वायु को कहा कि हे वायु ! तू जान कि यह यक्ष कौन है ? उसने स्वीकार कर लिया ||7||

वह (वायु) ब्रह्मा के पास (अभ्यद्रवत्) गया, उससे (ब्रह्म ने) पूछा कि, तू कौन है ? उसने उत्तर दिया कि मैं वायु हूँ और मुझ ही को मातरिश्वा भी कहते हैं ||8||

(ब्रह्मा ने पूछा कि) तुझ में क्या शक्ति है ? (वायु ने उत्तर दिया कि) (यद इदं, पृथिव्याम इदं सर्वम्, अपि आददीय) जो कुछ इस पृथिवी पर है, उस सब को मैं उड़ा सकता हूँ ||9||

(ब्रह्म ने) उसके लिये एक तिनका (निदधौ) रक्खा कि इसको उड़ा वह वायु पूरे बल के साथ उस तिनके के पास गया (परन्तु) (तत् न शशाक आदातुम्) उसको उड़ा नहीं सका | तब वह भी पीछे लौटा (और देवों से कहा) कि मैं यह जानने में असमर्थ हूँ कि यह यक्ष कौन है ||10||

अथेन्द्र मब्रुवन् मघवन्नेतद्विजानीहि, किमेतद् यक्षमिति, तथेति | तदभ्यद्रत् तस्मात्तिरोदधे ||11||

अर्थ:- तब इन्द्र से (देवों) ने कहा कि हे मघवन् ! तू जान कि यह यक्ष कौन है ? (इन्द्र ने) स्वीकार कर लिया, वह (इन्द्र ब्रह्म के पास) गया (परन्तु वह ब्रह्म) उससे छिप गया ||11||

स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाज्रगाम बहुशोभमानामुमा हेमवतीं तां होवाच, किमेतद् यक्षमिति ||12||

इति तृतीयः खण्डः

अर्थ:- उसी आकाश में अति सुन्दर हेमवती उमा नामक स्त्री के समक्ष (स आजगाम) वह (इन्द्र) आ गया और उस स्त्री से पूछा कि यह यक्ष कौन है ?

व्याख्या -

इस तीसरे खण्ड में एक आख्यायिका के द्वारा यह प्रदर्शित करने का यत्न किया गया है कि समस्त भूत और इन्द्रियाँ ईश्वर की दी हुई शक्ति ही से काम करती हैं | आख्यायिका में जो यह कहा गया है कि अग्नि एक तृण को नहीं जला सका और न वायु उसे उड़ा सका, ऊपरी दृष्टि के साथ देखने से यह बात कुछ अत्युक्ति की सी मालूम देती है, परन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो इस कथन की सत्यता प्रकट हो जाती है | अग्नि, वायु आदि जब तक सूक्ष्म भूत के रूप में रहते हैं, तब तक अव्यक्त (अप्रकट) रहते हैं | लकड़ी में अग्नि मौजूद है परन्तु है सूक्ष्म भूत के रूप में इसीलिये अप्रकट है | जब तक अग्नि इस सूक्ष्म रूप में रहती है, एक तिनके को भी नहीं जला सकती, परन्तु जब संघर्ष के द्वारा उसको व्यक्त (प्रकट) करते हैं तब वह समस्त संसार को भी भस्म कर देने की योग्यता वाली हो जाती है | यदि कोई कहे कि लकड़ी में अग्नि मौजूद ही नहीं, तो वह बात सर्वथा मिथ्या होगी क्योंकि यदि मौजूद नहीं तो, संघर्षण से कहाँ से आ जाती है | संघर्षण से भी नहीं उत्पन्न होनी चाहिये थी | निष्कर्ष यह है कि पंचभूत जब तक सूक्ष्म और अव्यक्त रहते हैं, अपना अपना काम जो व्यक्त होने पर कर सकते थे, नहीं कर सकते, परन्तु जब उनका परिवर्तन स्थूल और व्यक्त रूप में हो जाता है, तब वे अपना अपना काम करने लगते हैं |

आख्यायिका में अग्नि-वायु उपलक्षण के तौर पर समस्त (पंच) भुतों के लिये प्रयुक्त हुए हैं | जिस प्रकार अव्यक्त अवस्था में होने से अग्नि की असमर्थता प्रकट हुई उसी प्रकार अन्य भूतों की हालत भी समझनी चाहिए | दूसरी बात जो आख्यायिका में वर्णित है, यह है कि ये पंच भूत उस यक्षरूपी ईश्वर को नहीं जान सके | यह तो स्पष्ट है कि पंचभूत जड़ हैं और जड़ होने के कारण उसको जान भी किस प्रकार सकते थे |

(क्रमशः)