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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

ईश्वरानुग्रह से आत्मदर्शन

ओउम् | न वि जानामि यदिवेदमस्मि निण्यः सन्नद्धो मनसा चरामि |
यदा मागन प्रथमजा ऋतस्यादिद्वाचो अश्नुवे भागमस्याः ||
ऋग्वेद 1|164|37

शब्दार्थ‌ ‍

यत् इव.................जो कुछ, जैसा
इदम्....................यह
अस्मि...................मैं हूँ, यह मैं
न + विजानामि.........विशेषरूप से नहीं जानता हूँ,
निण्यः...................मूढ़-सा, भोला (पंजाबी में न्याणा) मैं
मनसा + संनद्धः........मन से बँधा हुआ, जकड़ा हुआ
चरामि...................विचर रहा हूँ |
यदा......................जब
मा.......................मुझको
ऋतस्य..................ऋत का, सत्य ज्ञान का
प्रथमजाः.................प्रथ‌मोत्पादक प्रभु
आगऩ्....................प्राप्त होता है
आत् + इत्..............तब ही
अस्याः...................इस
वाचः.....................वाणी के
भागम्...................भजनीय, वाच्य को
अश्नुवे....................प्राप्त करता हूँ |

व्याख्या -

कठोपनिषद् (2|3|12) में कहा है -
नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं श्क्यो न चक्षुषा |
अस्तीति ब्रुवतोSन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ||

आत्मा न वाणी के द्वारा प्राप्त होता है, न मन से और न आँख से (अर्थात ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ आत्मा का ज्ञान कराने में असमर्थ हैं ; मन तो इनके बताये ज्ञान का धनी है, वह कैसे आत्मा का ज्ञान कराए) जिसको यह ज्ञान हो गया कि आत्मा है, उसे और कैसे बताया जाए ?

उपनिषत् कह रही है ‍- आत्मा न मनसा प्राप्तुं श्क्यः मन के द्वारा नहीं मिल सक‌ता, और मैं निण्यः =न्याणा हूँ| मनसा सन्नद्धः = मन के चक्कर में फँस गया हूँ, मन के बन्धन में बँधकर जहाँ मन ले जाता है, वहाँ जाता हूँ, मैं न्याणा कैसे कहूँ 'मैं क्या हूँ, कौन हूँ, कैसा = किंस्वरूप हूँ ?' इस सबको न विजानामि मैं नहीं जानता हूँ |

अनुमान के द्वारा यदि कुछ जानूँगा, तो वह सामान्यज्ञान होगा | धुँआ देखकर अग्नि का ज्ञान होता है, किन्तु किसका अग्नि ‍- तिनकों का, गोमय का या लकड़ी का, यह ज्ञान तो नहीं होता; यह तो प्रत्यक्ष से होता है | इसी प्रकार मृत शरीर और अमृत शरीर को देखकर किसी चेष्टावाले का, चेष्टा की इच्छावाले का ज्ञान करूँ तब भी यदिवेमस्मि जो कुछ मैं हूँ उसको नहीं जानता | यदि मैं अहंकार करूँ - सुवेदेति मैं भली-भाँति जानता हूँ, तो साक्षात्कारी ऋषि कहते हैं -

दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ | - केनोपनिषद् 2|9

सचमुच तू बहुत ही थोड़ा जानता है |

अतः मैं कहता हूँ - न विजानामि = मैं विशेष नहीं जानता हूँ | हाँ, यदि मुझ पर ईश्वर कृपा हो जाए, ईश्वर के दर्शन हो जाएँ, तो मैं इस मैं-मैं करने वाले को भी जान जाऊँ | वेद कह ही तो रहा है - यदा..........भागमस्याः | ऋषि इसी का अनुवाद कर रहे हैं -

तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः | - कठोपनिषद् 1|2|20

विधाता की कृपा से ही निष्काम-कर्म्मा, अतएव शोक से रहित, रागद्वेष से शून्य महात्मा ही आत्मा को देख पाता है |

ईश्वर कृपा कैसे मिले ? ईश्वर की अनन्य भक्ति से, सब और से चित्त हटाकर उस परम गुरु के अर्पण करने से | योगीराज पतञ्जलि जी ने कहा है -
ईश्वरप्रणिधानाद्धा - योगदर्शन 1|23

ईश्वर की अनन्य भक्ति से चित्त की वृतियों का निरोध होता है |

बाह्य विषयों से सर्वथा हट जाने का नाम निरोध है | जब वृत्तिनिरोध हो जाता है तब आत्मा के अन्दर बसने वाले अन्तरात्मा परमात्मा के दर्शन और अनुग्रह होते हैं | उनका फल है -
ततः प्रत्यक्चेनाधिगमोSप्यन्तरायाभावश्च | - योगदर्शन 1|29
ईश्वर प्रणिधान से अपने चेतनस्वरूप का ज्ञान तथा विघ्नों का विनाश होता है |

अपना आपा जानना है तो ईश्वरप्रणिधान करो | उपनिषत् ने और योगदर्शन ने जो बात इशारों-इशारों में बतलाई, वेद ने उनसे करोड़ों वर्ष पहले बहुत स्पष्ट खोलकर रख दी है | पिता अपने पुत्रों को कैसे खोलकर न समझाए, वह क्योंकर छिपाए ? छिपाने से उसके पुत्रों का कल्याण नहीं हो सकता | किन्तु हम मन के फन्दे में फँसे उसे जानने की चेष्टा नहीं करते | मन प्रकृति का पुत्र है, उसने जीव को बाँध रखा है | समझे ?

ईश्वरानुग्रह-प्राप्ति का उपाय‌ -

भगवान स्वभाव से कृपालु हैं | यह सृष्टि उसकी कृपा का सबसे बड़ा प्रमाण है | अपना कोई प्रयोजन न होते हुए परमेश्वर ने संसार रचा केवल जीवों के उद्धार के लिए | स्वाभाविक कृपालु की कृपा प्राप्त करना कुछ बहुत कठिन नहीं है | उसकी कृपा प्राप्त करने के लिए अपनी आत्मा और अन्तःकरण को उसकी और प्रवृत करो | परमात्मा माता-पिता के समान कृपालु है | जब वह अपने वत्स जीव को अपनी और प्रवृत देखता है तो वह कृपालु अपने अनन्त शक्तिरूप हाथों से मानो उस प्रेमी को उठाकर अपनी गोद में बिठा लेता है |

अनन्य मन से परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करना तथा उसके आदेश में रहकर तदनुसार अपना आचरण बनाना, प्राणपन से तन, मन, धन लगाकर लोकोपकार में अपने-आपको समर्पित कर देना, स्वार्थ त्यागकर परार्थ-साधन में तत्पर रहना, सदा सत्कर्मों को करना, अकर्मण्य न रहना, परमेश्वर के न्याय, दया, उपकार आदि गुणों को अपने में धारण करना, विषय-वासना से ऊपर उठकर चञ्चल-चपल चित्त को अचल, अविचल करने का पुरुषार्थ करना आदि परमेश्वर की और प्रवृत होने के साधन हैं | जो इन साधनों को अपनाता है, परमेश्वर भी उसे अपनाता है अर्थात उसे अपने अनुग्रह का पात्र बनाता है | जैसे बालक जब माता की ओर चलता है तब माता आगे आकर बालक को गोद में ले लेती है कि कहीँ बालक को चोट न लग जाए ! इसी भाँति जब कोई साधक सर्वात्मा जगदम्बा की ओर चलता है तो जगन्माता भी उसका स्वागत करती है, अत्यन्त प्रीति से अपनाती है, सब प्रकार के पाप, सन्ताप, पातकों से बचाती है |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार)