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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) तृतीय खण्डः से (3)

पूर्व अंक से आगे -

इस आख्यायिका में अग्नि वायु जहाँ एक और पंचभूतों के प्रतिनिधि रूप में प्रयुक्त हैं वहाँ दूसरी और उनसे इन्द्रियों की सत्ता भी अभिप्रेत है | अग्नि से चक्षु और वायु से त्वचा का अभिप्राय लिया जाता है | जिस प्रकार पंचभूत न ईश्वर की दी हुई शक्ति के बिना काम करते हैं न उसके जानने का सक्षात साधन ही हो सकते हैं, इसी प्रकार इन्द्रियाँ भी बिना ईश्वर प्रदत्त सामर्थ्य के काम नहीं कर सकती हैं, और न उस‌की प्राप्ति का साधन ही हो सकती हैं | इन्द्रियों की शक्ति और इन्द्रियों के गोलक अलग अलग स्थानों पर हैं | इन्द्रियों की शक्ति जिन्हें सूक्ष्म इन्द्रियाँ कहना चाहिये , सूक्ष्म शरीर के अवयव हैं शक्ति ही हैं और मस्तिष्क स्थानी हैं, परन्तु इन्द्रियों के गोलक स्थूल शरीर के बाह्य अवयव हैं | जब तक इनमें प्राकृतिक नियमों द्वारा मेल (Harmony) न हो , इन्द्रियां काम नहीं दे सकतीं | कल्पना करो कि आँख के गोलक ठीक हैं, परन्तु दृक्-शक्ति के साथ उनका मेल नहीं तो आँख देखने का काम नहीं कर सकती | इसी प्रकार यदि दृक्-शक्ति ठीक है और उसका चक्षु के गोलकों से मेल भी है परन्तु गोलकों में त्रुटि है तब भी आँखें काम नहीं दे सकती | इन्द्रियों के गोलक आमतौर से बहिर्मुखी हैं, इसलिए 'तस्मात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्' (कठोपनिषद् 4|1) के आदेशानुसार ये बाहर के विषयों (शब्द, स्पर्श्, रूप, रस, गन्ध) ही को ग्रहण कर सकते हैं और इसलिये ये आत्मा की बहिर्मुखी वृति के स्टेशन समझे जाते हैं | परन्तु ईश्वर की प्राप्ति बाहर नहीं, किन्तु भीतर की और चलने से हुआ करती है | जैसे कि कहा गया है : -

वेनस्तत्पश्यन् निहितं गुहासत् | (यजुर्वेद 32|8)

अर्थात योगी ईश्वर का हृदयाकाश में साक्षात्कार करता है |

आत्मनात्मानमभि सं विवेश | (यजुर्वेद 32|11)

अर्थात जीवात्मा के द्वारा परमात्मा को प्राप्त करो |

मनसैवेदमाप्तमव्यम् || (कठोपनिषद् 4|11)

अर्थात ईश्वर मन (अन्तःसामर्थ्य) ही से पाने योग्य है |

तमात्मस्थं येSनुपश्यन्ति धीरास्तेषाँ सुखं शाश्वतनेतरेषाम् ||

अर्थात जो धीर पुरुष आत्मा में प्रवेष करके ईश्वर का साक्षात्कार करते हैं उन्हीं को चिरस्थायी सुख प्राप्त होता है, अन्यों को नहीं | इसलिये स्पष्ट है कि इन्द्रियों से कोई ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता |

अख्यायिका में आगे कहा गया है कि जब पंचभूतों अथवा इन्द्रियों से वह यक्षरूप ब्रह्म जाना नहीं जा सका, तब देवों ने इन्द्र को कहा कि वह उसे जाने परन्तु उससे ब्रह्म तिरोहित हो गया | तब उस (इन्द्र) ने 'उमा' के आदेश से ब्रह्म को जाना | 'इन्द्र' और 'उमा' क्या है यह जानने ही से आख्यायिका का भाव स्पष्ट होगा |

(क्रमशः)