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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

उपदेशकों का गुरु

ओउम् | शतधारमुत्समक्षीयमाणं विपश्चितं पितरं वक्त्वानाम् |
मेळिं मदन्तं पित्रोरूपस्थे तं रोदसी पिपृतं सत्यवाचम् ||

ऋग्वेद 3|26|9

शब्दार्थ -

शतधारम्................सैकड़ों धाराओं वाले
अक्षीयमाणम्............कभी क्षीण न होनेवाले
उत्सम्...................स्त्रोत के समान
विपश्चितम्...............महाज्ञानी
वक्त्वानाम्..............वक्ताओं के, उपदेशकों के भी
पितरम्..................पिता, पालक, गुरु
मेळिम्..................सबको मिलानेवाले
पित्रोः....................माँ-बाप अथवा द्यौ-पृथिवी की
उपस्थे...................गोद में
मदन्तम्................आनन्द देने वाले
तम्......................उस
सत्यवाचम्...............सत्य, निर्भ्रान्त वेद वाणीवाले को
रोदसी....................द्यौ और पृथिवी
पिपृतम्..................भर रहे हैं, धारण कर रहे हैं |

व्याख्या -

भगवान सैकड़ों प्रकार से जीव को बोध कराते हैं | यह सारी सृष्टि उसी का बोध कराती है | उसका ज्ञान कभी भी ज्ञीण नहीं होता | सभी ज्ञानी उसी से ज्ञान लेते हैं, किन्तु उसका स्त्रोत अक्षीयमाण है | ऋषि कह गये हैं - पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते = उस पूर्ण का ज्ञान लेकर भी उसके बाद पूर्ण ही शेष रह जाता है | हुआ जो वह अक्षीयमाण उत्स और साथ ही शतधार = सैकड़ों धाराओं वाला, किन्तु उसे जड़ जल न समझना, वह है विपश्चित् = महाज्ञानी | छोटा ज्ञानी भी नहीं, वरन् वह - पितरं वक्त्वानाम् = उपदेशकों का भी गुरु है | पतञ्जलिजी ने भी इस गुरु के स्वर-में-स्वर मिलाकर कहा है - स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् (योगदर्शन 1|26) = वह परमात्मा पूर्वों का, सृष्टि के आरम्भ के गुरुओं का भी गुरु है, सभी गुरु कराल काल की गाल में विला जाते हैं, किन्तु यह कालातीत है, काल का भी काल है, और वह है सत्योपदेशक | मनुष्य अल्पज्ञ है, उसे भ्रम हो सकता है, विप्रलिप्सा = ठगी की भावना भी हो सकती है, अतः स्वयं बहका होने के कारण दूसरों को बहका सकता है, किन्तु भगवान् हैं सत्यवाक् | उनकी वाणी में असत्य का लवलेश भी नहीं है ; हुए जो वे सर्वज्ञ, अतः सत्य-सत्य ज्ञान का उपदेश करते हैं |

संसार में जितना आनन्द है वह उन्हीं का है | इस संसार में रखकर जीवों को वही आनन्द देते हैं | उन्हें खोजने के लिए कहीं जाने की आवश्यक्ता नहीं, पत्ता-पत्ता उनकी सत्ता तथा महत्ता का पता दे रहा है | देखो, आँखें खोलो | नहीं दीखता तो उस कृपालु के वेदवचन को सुनो - तं रोदसी पिपृतम् = उसे द्यावापृथिवी = सारा संसार धार रहा है अर्थात पाने के लिए कहीं दूसरे स्थान जाने की आवश्यक्ता नहीं है, वह सर्वत्र विद्यमान है, सारे संसार में व्यापक है, भर रहा है | जो सब स्थानों में है, उसे सभी स्थानों में पा सकते हैं | कैसा विचित्र है, सभी स्थानों में है और दीखता नहीं है, क्योंकि न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् - श्वेताश्वतरोपनिषद् 4|20 इसे दिखाने के लिए कोई रूप नहीं है, और न ही कोई उसे आँख से देख सकता है | उसे तो हृदय और मन से देखना चाहिए क्योंकि सब जगह रहनेवाला हृदय में रह रहा है - हृदा हृदिस्थं मनसा य एनमेव विदुरमृतास्ते भवन्ति - श्वेताश्वतरोपनिषद् 4|20 | उस हृदय में रहने वाले को हृदय तथा मन से जानो और मुक्ति प्राप्त करो |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार)

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