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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

भगवान के सख्य का फल‌

ओ३म
शास इत्था महाँ अस्यमित्रखादो अदभुत:|
न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन||
ऋग्वेद‌ 10.152.1

शब्दार्थ:
शास:=अनुशासन करने वाला
महान+ असि=तूं महान है
अमित्रखाद:=वैर विरोध विनाशक
अद् भुत:=अदभुत= विचित्र
सखा=सखा
न=नहीं
हन्यते= मारा जाता
कदाचन= कभी
जीयते= हानी उठाता है
प्रभो तूं अनुशासन करने वाला है और इसी कारण तूं महान है| वैर विरोध विनाशक और अदभुत= विचित्र है|( तूं ऐसा है कि) जिसका सखा नहीं मारा जाता और न ही कभी हानी उठाता है, या पराजित होता है|

(स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती)

[O God! You are a disciplinarian and that's why you are great, remover of enimity and are awesome. You are such that your friend never gets killed or loose or get defeated.]

व्याख्या:
भगवान सचमुच बड़ा शासक और अनुशासक है| वेद में कहा है

इन्द्र ईशन ओजसा (ऋ 8.13.9)

भगवान अपने स्वाभविक बल के कारण ईशान= शासक है|
उतो पतिर्य उच्चयते कृष्टीनामेक इद्वशी( ऋ 8.13.9)

जो अकेला ही सम्पूर्ण प्रजाओं का स्वामी तथा वशी= नियन्त्रण में रखने वाला कहा जाता है|सृष्टि के आरम्भ में मनुष्य के कल्याण के लिए भगवान वेद प्रदान करता है| इसी कारण योगीजन उसे
स एष पूर्वेषामपि गुरु कालेनानवच्छेदात् (यो0 द0 1.26)

आदिम ऋषियों का गुरु मानते हैं| सचमुच वह गुरुओं का गुरु है| राजा का,शासक का, शासन शरीर पर होता है, किन्तु गुरु का शासन ह्रृदय, बुद्धि सभी पर होता है| भगवान की मह्त्ता के कारणों में एक यह भी कारण है कि भगवान अनुशासक है, गुरु है
शास इत्था महाँ असि=
तूं अनुशासक है अत: महान है| अनुशासक का अर्थ अनुकूल उपदेशक है| भगवान् जीव के कल्याण के लिए केवल सृष्टि के आरम्भ में वेद ग्यान देकर शान्त नहीं हो जाता, वरन् सदा हित का उपदेश करता रहता है| मनुष्य जब बुरा कार्य करने का विचार करता है, भगवान उसको वारण देते हैं| यह और बात है कि बहुधा जीव उसको अनसुना कर देता है; किन्तु भगवान उसे अवष्य सावधान करते हैं|

भगवान के कृपा पात्र के शत्रु स्व्यं नष्ट हो जाते हैं मानो उनको भगवान ने खदेड़ दिया हो, अत: भगवान अमित्रखाद= शत्रुओं को खदेड़ने वाला है| चूँकि भगवान भक्त के शत्रुओं के साथ आकर युद्ध करता नहीं दीखता, किन्तु भक्त के शत्रुओं में प्रतिदिन न्यून्ता आ रही होती है, इसलिए भगवान अदभुत अमित्रखाद सिद्ध होता है| भगवान की महिमा का एक प्रबल कारण और बताया है
न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन=
उसका सखा न कभी मारा जाता है न कभी पराजित होता है| भगवान वैसे तो सबका सखा है किन्तु
भवन्ति भव्येषु ही पक्षपाता:|
( भव्यों के प्रति प्रेम हो ही जाता है) के अनुसार भगवान भक्तों का विशेष सखा है | जैसे कि वेद में कहा है
इन्द्रो मुनीनां सखा =
परमेश्वर मुनियों = भगवद् भक्तों का सखा है| मित्र की स्थूल पहचान यह है कि वह मित्र को संकट से बचाता है| वेद में कहा गया है

सखा सखायमतरद्विषूचो: (ऋ 7.18.6)

मित्र मित्र को विपत्ति से बचाता है| मृत्यु और पराजय ( बल की हानी, धन की हानी, जन की हानी, तन की हानी, मन ‌की हानी सभी पराजय के अन्तर्गत हैं, क्योंकि संसार संग्राम में इनकी न्यूनता से पराजय हुआ करती है) ये दोनो भारी आपत्तियाँ हैं|भगवान का मित्र इनके पाश में नहीं फंसता
न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन =
आत्मा अमर है उसकी मृ‌त्यु नहीं होती|शरीर से आत्मा के वियोग का नाम मृ‌त्यु है| अग्यान के कारण आत्मा शरीर को अपना आपा मान बैठा है, शरीर के विनाश को आत्मा का नाश समझ बैठा है, अत: शरीर में किसी प्रकार के उपद्रव को देखकर वह आत्मनाश को सन्निहित देखता है| प्रभु का सखा बनने से उसे अपने अविनाषी स्वरूप का ग्यान होता है और वह अपने को अमर मानकर म्रृत्यु से निर्भय होता है| इसलिए कहा
न यस्य हन्यते सखा
इसी शरीर और आत्मा के भेद का ग्यान होने पर , आत्मा के अविनाशी ग्यात होने पर, शरीर नाश से, शरीर के विकृ‌त होने से वह आत्मा का नाश और विकार नहीं मानता| अत: कहा
न जीयते कदाचन|
यह स्मरण रखना चाहिए कि भगवान् स्वाभाविक मित्र है| हमने उसकी उपेक्षा कर रखी है, वह हमारी उपेक्षा कभी नहीं करता| एक बार उसकी और बढ़ने की चेष्टा करें तो फिर ग्यात हो कि वह हमारा स्वागत कैसे करता है| सांसारिक मित्र तो रूठता भी है और कभी कभी तो सदा के लिए संग त्याग देता है, किन्तु भगवान न कभी रूठता है, न कभी संग त्यागता है| इस भेद को जानकर मनुष्य को सच्चे मित्र से मित्रता गाठँनी चाहिए|

(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)

Namestey ji, This is very

Namestey ji,
This is very good. Requesting to add Ved Mantr everyday if possible.
Dhanyavad.

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