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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (3)

अग्निना रयिमश्नवत् पोषमेव् दिवेदिवे |यशसं वीरवत्तमम् ||3||
ऋग्वेद 1|1|3||

पदार्थ :-

यह मनुष्य अच्छी प्रकार ईश्वर की उपासना और भौतिक अग्नि ही को कलाओं में संयुक्त करने से प्रतिदिन आत्मा और शरीर की पुष्टि करने वाला, जो उत्तम कीर्ति का बढ़ाने वाला और जिसको अच्छे अच्छे विद्वान और शूरवीर लोग चाहा करते हैं, विद्या और सुवर्णादि उत्तम उस धन को सुगमता से प्राप्त होता है ||

भावार्थ -
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार से दो अर्थों का ग्रहण है | ईश्वर की आज्ञा में रहने तथा शिल्पविद्यासम्बन्धि कार्य्यों की सिद्धि के लिये भौतिक अग्नि को सिद्ध करने वाले मनुष्यों को अक्षय अर्थात जिसका कभी नाश नहीं होता, सो धन प्राप्त होता है, तथा मनुष्य लोग जिस धन से कीर्ति की वृद्धि और जिस धन को पाके वीर पुरुषों से युक्त होकर नाना सुखों से युक्त होते हैं | साबको उचित है कि उस धन को अवश्य प्राप्त करें ||3||

अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरिसि | स इद्देवेषु गच्छति ||4||
ऋग्वेद 1|1|4||

पदार्थ: -

हे परमेश्वर ! आप सर्वत्र व्याप्त‌ होकर जिस हिंसा आदि दोषरहित विद्या आदि पदार्थों के दानरूप यज्ञ को सब प्रकार से पालन करने वाले हैं, वही यज्ञ विद्वानों के बीच में फैलकर जगत् को सुख प्राप्त कराता है |

तथा जो यह भौतिक अग्नि पृथिव्यादि पदार्थों के साथ अनेक दोषों से अलग होकर जिस विनाश आदि दोषों से रहित शिल्पविद्यामय यज्ञ को सब प्रकार से सिद्ध करता है वही यज्ञ अच्छे अच्छे पदार्थों में प्राप्त होकर सब को लाभकारी होता है |

भावार्थ : -

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है | जिस कारण व्यापक परमेश्वर अपनी सत्ता से उक्त यज्ञ की निरन्तर रक्षा करता है, इसी से वह अच्छे अच्छे गुणों के देने का हेतु होता है | इसी प्रकार ईश्वर ने दिव्यगुणयुक्त अग्नि भी रचा है कि जो उत्तम शिल्पविद्या का उत्पन्न करने वाला है | उन गुणों को केवल धार्मिक, उद्योगी और विद्वान मनुष्य ही प्राप्त होने के योग्य होता है ||4||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित् एवं उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (3)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Sarswati's RIGVED Bhashya)