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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) तृतीय खण्डः से (4)

पूर्व अंक से आगे -

इन्द्र कौन है ?

इन्द्रियमिन्द्रलिङ्गमिन्द्रदृष्टमिन्द्रजुष्टमिन्द्र दत्तमित्ति वा
(अष्टाध्यायी)

पाणिनी के इस सूत्र से इन्द्रिय शब्द सिद्ध हुआ और 'इन्द्रस्य लिंगमिन्द्रियम्' के अनुसार इन्द्र वह है, जिसके कर्त्तव्य के साधन इन्द्रिय हैं | स्पष्ट है कि इन्द्र जीवात्मा को कहते हैं | यद्यपि इन्द्रिय शब्द ब्रह्म, जीव, राजा विद्युत आदि अनेक अर्थों में वैदिक साहित्य में प्रयुक्त होता है | परन्तु यहाँ यक्ष (ब्रह्म) का ज्ञाता इन्द्र है, इसलिये यहां उचित रीति से इन्द्र शब्द का अर्थ जीवात्मा ही किया जा सकता है |

उमा कौन है ?

विद्या उमारूपिणी प्रादुर्भूत् स्त्रीरूपा
('शांकर भाष्य; केन, मन्त्र 25)

श्रीमान् शंकराचार्य जी ने उमा को उपर्युक्त वाक्य में स्त्री रूपा विद्या कहा है | श्री रामानुजाचार्य ने भी शंकर ही का अनुकरण करते हुए इसी उपनिषद् की टीका में लिखा है : -

स्त्रियमतिरूपिणीं विद्यामाजगाम ||

अर्थात स्त्री रूपा विद्या आई | इन दोनों महानुभावों ने 'उमा' को जहाँ विद्या कहा है, वहाँ शंकर की पत्नी पार्वती अर्थ भी इस श्ब्द का किया है | परन्तु श्रीधर शास्त्री पाठक संस्कृताध्यापक डक्कन कालेज ने अपनी इस उपनिषद् की विस्तृत समालोचना में लिखा है कि, भगवान् आद्य शंकराचार्य पौराणिकों का मत स्वीकार करने के पक्षपाती नहीं थे, इसलिये उनके भाष्य में हेमवती का अर्थ, हिमालय पर्वत की पुत्री पार्वती, ऐसा जो इस समय मिलता है, वह वास्तविक उनका नहीं है, किसी लेखक के दोष से प्रक्षिप्त हो गया है | (देखो संस्कृत समालोचना का पृष्ठ 7,8)| इसलिये शंकर और रामानुज महानुभावों का तात्पर्य उमा शब्द से विद्या या ब्रह्म-विद्या ही स्वीकार किये जाने के योग्य है | और उचित रीति से, जीवात्मा के लिये ब्रह्म की प्राप्ति का साधन, ब्रह्म-विद्या को कहा भी जा सकता है | परन्तु इस पक्ष के स्वीकार करने में एक आपत्ति हो सकती है और वह यह है कि ब्रह्म विद्या एक विस्तृत विद्या है | इसमें प्रस्थानत्रयी (उपनिषद्, वेदान्त दर्शन और गीता) के सिवाय अन्य भी अनेक योग और सांख्यादि विद्याओं का समावेश है | इसलिये स्वाभाविक है कि ब्रह्मविद्या में ब्रह्म प्राप्ति के अनेक दूर और समीप वाले सभी साधनों का संयोग हो, परन्तु आख्यायिका में कहा है कि उमा ने बतलाया और उमा के बतलाने से इन्द्र नें जान लिया कि वह यक्ष ब्रह्म है | इसलिये आख्यायिका का विवरण चाहता है कि उमा कोई ऐसी चीज होनी चाहिये जो ब्रह्मप्राप्ति का दूरस्य नहीं किन्तु समीपस्थ साधन हो | इसलिए इस समीपस्थ साधन की खोज करनी चाहिए | खोज करते हुए जब हम महामुनि पतञ्जलि की सेवा में पहुँ‍चते हैं तो वहाँ उत्तर मिलता है कि -

श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वकमितरेषाम् ||
(योग दर्शन 1|20)

अर्थात - अन्यों (विदेहों और प्रकृतिलयों से भिन्नों) की श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक (उपाय प्र्त्यय नामक असंप्रज्ञात योग की सिद्धि) होती है | भाव इसका यह है कि जब योगी उपाय-प्रत्यय नामक असंप्रज्ञातयोग सिद्ध करना चाहता है, तब उसको प्रथम श्रद्धा-(सत्य पर अटल विश्वास) सम्पन्न होना चाहिए | यह श्रद्धा माता के समान योगी की रक्षा करती है, जिससे योगीवीर्य (इस योग को सिद्ध करनेवाला बल) सम्पन्न होता है | तब वीर्यवान् योगी को स्मृति उपस्थित होती है, जिससे चित्त का स्मृति भण्डार उस पर खुल जाता है और चित्त के इस प्रकार पट खुल जाने से योगी और व्याकुलत रहित हो जाता है | यही चित्त की समाधि है, इस समाधि (समाधान) से प्रज्ञा की उपलब्धि होती है | प्रज्ञा वह बुद्धि है, जिससे योगी पर मैं क्या हूँ, जगत् क्या है, ईश्वर क्या है, इत्यादि सभी भेद खुल जाते हैं और वह तत्व ज्ञानी हो जाता है | व्यास के कथनानुसार इस प्रज्ञा का निरन्तर अभ्यास करने से इस (प्रज्ञा) से योगी को वैराग्य होकर असंप्रज्ञात योग की सिद्धी हो जाती है |

(क्रमशः)