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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (4)

अग्निर्होता कविक्रतुः सत्यश्चित्रश्रवस्तमः |
देवो देवेभिरागमत् ||5||
ऋग्वेद 1|1|5||

पदार्थान्वयभाषा :-

जो अविनाशी आप से आप प्रकाशमान सर्वज्ञ है, जिसने परमाणु आदि पदार्थ और उनके उत्तम उत्तम गुण रचके दिखलाये हैं, जो सब विद्यायुक्त वेद का उपदेश करता है, और जिससे परमाणु आदि पदार्थों करके सृष्टि के उत्तम पदार्थों का दर्शन होता है, वही कवि अर्थात सर्वज्ञ ईश्वर है | तथा भौतिक अग्नि भी स्थूल और सूक्ष्म पदार्थों से कलायुक्त होकर देशदेशान्तर में गमन करानेवाला दिखलाया है | जिसका अति आश्चर्यरूपी श्रवण है, वह परमेश्वर विद्वानों के साथ समागम करने से प्राप्त होता है |

तथा जो श्रेष्ठ विद्वानों का हित अर्थात उनके लिये सुखरूप उत्तम गुणों का प्रकाश करनेवाला सब जगत् को जानने और रचनेहारा परमात्मा और जो भौतिक अग्नि - सब पृथिवी आदि पदार्थों के साथ व्यापक और शिल्पविद्या का मुख्य हेतु जिसको अद्भुत अर्थात् अति आश्चर्यरूप सुनते हैं, वह दिव्य गुणों के साथ जाना जाता है ||5||

भावार्थ : -

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है - सब का आधार, सर्वज्ञ, सब का रचनेवाला, विनाशरहित, अनन्त शक्तिमान् और सब का प्रकाशक आदि गुण हेतुओं के पाये जाने से अग्नि शब्द करके परमेश्वर और आकर्षणादि गुणों से मूर्तिमान् पदार्थों का धारण करनेहारादि गुणों के होने से भौतिक अग्नि का भी ग्रहण होता है | सिवाय इसके मनुष्यों को यह भी जानना उचित है कि विद्वानों के समागम और संसारी पदार्थों को उनके गुण सहित विचारने से परमदयालु, परमेश्वर अनन्त सुखदाता और भौतिक अग्नि शिल्पविद्या का सिद्ध करनेवाला होता है |

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित् एवं उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (4)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Sarswati's RIGVED Bhashya)