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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अभीष्ट फलप्रदाता

ओउम् | अधा हिन्वान इन्द्रियं ज्यायो महित्वमानशे |
अभिष्टिकृद्धिचर्षणिः ||

ऋग्वेद 9|48|5

शब्दार्थ -

अधा....................और
इन्द्रियम्...............इन्द्रिय को, जीव शक्ति को
हिन्वानः................प्रेरित करता हुआ
ज्यायः..................बहुत बड़ा
महित्त्वम्...............महत्त्व
आनशे..................प्राप्त करता है, वह
अभिष्टिकृत्.............अभीष्ट पदार्थों का कर्त्ता है, क्योंकि वह
विचर्षणिः...............सर्वज्ञ तथा विशेष द्रष्टा है |

व्याख्या -

भगवान की यह बहुत बड़ी महिमा है कि वह जीव को इन्द्रियाँ देता है | इन्द्रियों के सामर्थ्य पर ध्यान दो | जीव तो वेद के शब्दों में अव्यसः = अव्यापक, बालादेकमणीयस्कम् - बाल से भी अत्यन्त सूक्ष्म है, किन्तु उसकी शक्तियाँ देखो, करोड़ों मील दूर के पदार्थ को उसका नेत्र देखता है | यहाँ बैठा अमरीका के गाने सुनता है | कितनी अद्भुत शक्ति है ! क्या सब-कुछ जीव का है ? वेद कहता है - न, यह भगवान का है | वही इन्द्रियों को बल दे रहा है | इन्द्र और इन्द्रिय का मेल वह न कराए, तो इन्द्र (जीवात्मा) कुछ भी न कर पाए | इन्द्र के इन्द्रपन का ज्ञान तो इन्द्रियों के द्वारा होता है | इन्द्रियाँ न हों, तो इन्द्र की सत्ता का ही विश्वास किसी को न हो | इन्द्र की सत्ता का विश्वास कराने वाले, इन्द्रियों के निर्माता का कितना बड़ा महत्व हुआ ? बहुत बड़ा ! तभी वेद ने कहा -

अधा हिन्वान इन्द्रियं ज्यायो महित्वमानशे |

इन्द्रियाँ क्यों देता है ? वह अभिष्टिकृत् है - अभीष्ट पदार्थों का कर्त्ता है, निर्माता है | भगवान से जीव प्रार्थना करता है या उसे मित्र मानकर मनौती करता हुआ कहता है -

तथा तदस्तु सोमपाः सखे वज्रिन् तथा कृणु | यथा त उश्मसीष्टये || ऋग्वेद 1|30|12

हे सोमपाः = सोम पालने वाले, शान्ति देनेहारे, जगद्रक्षक भगवन् ! जैसा हम इष्टि के लिए, अपनी-अपनी अभीष्टसिद्धि के लिए तुझसे चाहते हैं, वह, वैसा ही हो | हे विघ्नवारक मित्र ! उसे वैसा कीजिए |

स्पष्ट है कि अभीच्टों का निर्माता वही जगद्विधाता है | उसमें यह सामर्थ्य कैसे है ? वेद इसका उत्तर देता है कि वह विचर्षणिः विशेष द्रष्टा है | सामान्य ज्ञान तो जीव को भी है, किन्तु वास्तविक ज्ञान तो विशेष ज्ञान है | पदार्थों के तत्व, पदार्थों के गुण-धर्म, पदार्थों का भेदादि-विषयक ज्ञान ही विशेष ज्ञान है } भग्वान् सर्वव्यापक है और साथ ही चेतन है, अतः वह सर्वज्ञ भी है | विशेषज्ञ, सर्वज्ञ ही जानता है कि किसको क्या चाहिए | हमारी चाहना हमारी क्रिया से द्योतित होती है | कर्मों से फल सिद्ध होता है | जिस प्रकार के कर्म्म‌ कर रहे हैं, उसी प्रकार की चाह है |

भक्त ! दिल खोलकर माँग ! भगवान तेरे सखा हैं | और् -

सखा सख्युर्न प्र मिनाति संगिरम् - ऋग्वेद 9|86|16 ||

सखा सखा के वचन को नहीं तोड़ता | वह साधारण सखा नहीं है, वह वज्री है | सभी विघ्नों को मार भगाता है | ऐसे, विघ्नविघातक मित्र के होते हुए हम अभीष्ट को न प्राप्त करें, तो इससे बढ़कर अभाग्य क्या होगा ?

स्वामि वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार)