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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (29)

प्रार्थना विषय

नेह भद्रं रक्षस्विने नावयै नोपया उत |
गवे च भद्रं धेनवे वीराय च श्रवस्यतेS-
नेहसो व ऊतयः सु ऊतयो व ऊतयः ||29||

ऋ. 6|4|9|12||

व्याख्यान -

हे भगवन् ! "रक्षस्विने भद्रं, नेह" पापी हिंसक दुष्टात्मा को इस संसार में सुख मत देना | "नावयै" धर्म से विपरीत चलने वाले को सुख कभी मत हो | तथा "नौपया उत" अधर्मीं के समीप रहने वाले उसके सहायक को भी सुख नहीं हो | ऐसी प्रार्थना आपसे हमारी है कि दुष्ट को सुख कभी न होना चाहिए नहीं तो कोई जन धर्म में रुचि नहीं करेगा किन्तु इस संसार में धर्मात्माओं को ही सुख सदा दीजिये | तथा हमारी शमदमादियुक्त इन्द्रियाँ दुग्ध देने वाली गौ आदि, वीरपुत्र और शूरवीर भृत्य "श्रव‌स्यते" विद्या विज्ञान और अन्नाद्यैश्वर्ययुक्त हमारे देश के राजा और धनाढ्यजन तथा इनके लिये "अनेहमः" निष्पाप निरुपद्रव स्थिर दृढ़ सुख हो "ऊतयः सु ऊतयो व ऊतयः" (वः युष्माकं बहुवचनमादरार्थम्) हे सर्वरक्षकेश्वर ! आप सब रक्षण अर्थात पूर्वोक्त सब धर्मात्माओं की रक्षा करने हारे हैं | जिन पर आप रक्षक हो उनको सदैव भद्र कल्याण (परमसुख) प्राप्त होता है अन्य को नहीं ||29||