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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'ईश्वर पूजा का वैदिक स्वरूप'(1) लेखक - शास्त्रार्थ महारथी स्व.पं.रामचन्द्र देहलवी जी

ओउम् ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्याञ्जगत् |
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा ग्रृधः कस्य स्विद्धनम् ||
ओउम् कुर्वन्नेवेह कर्माणि, जिजीविषेच्छतं समाः |
एवं त्व‌यि नान्येतोSस्ति न कर्म लिप्यते नरे ||

माननीय बहिनों व भाइयों,

आज का विषय 'ईश्वर पूजा का वैदिक प्रकार, परमात्मा की उपासना का वैदिक प्रकार क्या है' यह आपकी सेवा में वर्णन करूँगा | क्योंकि इसमे कुछ भाग ऐसा है जिसमें ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है इसलिए मेरा यह निवेदन है कि चारों और से अपनी तबीयत हटाकर मेरी और केन्द्रित कर लें ताकि बात जल्दी समझ में आए |

मैंने कल बताया था कि ईश्वर, जीव और प्रकृति ये तीन अनादि पदार्थ है | और इनके अनादि होने का वैज्ञानिक तरीका वर्णन किया था जिससे कोई इनकार नहीं कर सकता | आज उसे मैं फिर दोहराता हूँ कि जो चीज सबसे छोटी है वह नाकाबिले तकसीम है, उसका विभाग नहीं हो सकता और जो सबसे बड़ी है उसका भी विभाग नहीं हो सकता | यह दो पैमाने हैं जिनसे किसी वस्तु के अनादित्व को जाना जा सकता है | इन दो पैमानों को, मैंने आपके जहन में ताजा करने के लिए दोहरा दिया है | इन दो पैमानों से दुनिया की चीजों को नाप लीजिए | दुनिया में दो प्रकार की चीजें हैं, एक जड़ और दूसरी चेतन | जो जड़ हैं वे ज्ञान शून्य हैं उनमें ज्ञान नहीं है | दूसरी चेतन हैं जिनमें ज्ञान है | इन दोनों प्रकार की चीजों को नाप लीजिए | चेतन में सबसे छोटा जीवात्मा है और सबसे बड़ा परमात्मा है | जड़ वस्तुओं में सबसे छोटा परमाणु है और सबसे बड़ा आकाश है | यह वैज्ञानिक तरीका है जिससे मैंने इन तीन चीजों को (ईश्वर, जीव और प्रकृति) अनादि साबित किया है, कदीम साबित किया है, नित्य साबित किया है | इन्हीं तीनों के बारे में आज बात आएगी जरा ध्यान से सुनिए |

हमारे दुर्भाग्य से या सौभाग्य से भारत में कई मतावलम्बी हैं | उनमें मुख्य रूप से ईसाई, मुसलमान, आर्यसमाजी व सनातनधर्मीं हैं | बाकी और जो हैं उनको इतनी मुख्यता नहीं है | मुसलमानों का , खुदा की इबादत करने का अपना एक तरीका है | ईसाइयों व मुसलमानों में कोई विशेष भेद् नहीं है, थोड़ा ही भेद है इसलिए मैं उन्हें मुसलमानों से जुदा नहीं करता हूँ | सनातन धर्म और आर्यसमाज में भी कोई फर्क नहीं है | हम चाहते हैं कि जो थोड़ा सा भेद उनमें और हममें है वह न रहे | उनको खास तौर से इस मजमून में शामिल कर लिया है | मुसलमानों से इस सम्बन्ध में पूछताछ करने पर पता चलता है कि वे खुदा की इबादत करते हैं | इबादत 'अबद' शब्द से बना है जिसके माने गुलाम के हैं, बन्दे के हैं , सेवक के हैं | इबादत का अर्थ हुआ कि हम अपने मालिक के सामने अपने गुलाम और बन्दे होने का इकरार करते हैं | हम अपनी इबादत में कहते हैं कि ऐ खुदा तू हमारा मालिक है और हम तेरे बन्दे हैं, हम तेरे सेवक हैं, हम तेरे खादिम हैं यह गोया इबादत में हम इकरार करते हैं | इस पर मैंने उनसे एक प्रश्न पूछा था | बहुत पुरानी बात है | दीनानगर की बात है | मौलवी अल्लाह दित्ता बहस कर रहे थे | उनसे मैंने पूछा,"जरा यह फर्माइए कि जब आप नमाज पड़ते वक्त खड़े होते हैं, जब आप रुकू करते है (घुटनों पर हाथ रख कर झुकते हैं ) और जब आप सिजदा करते हैं, अपनी पेशानी को जमीन पर रख देते हैं तो इस सबसे आपका क्या मतलब है ?" कहने लगे,"पण्डित जी, हम खुदा का आदाब बजा लाते हैं |" मैंने पूछा," इस आदाब बजा लाने से खुदा पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है ?" तो मौलवी साहब ने उत्तर दिया,"खुदा इस आदाब बजा लाने से खुश होता है ?" तो मैंने कहा कि आप आदाब बजा लाकर उसमें तबदीली पैदा करते हैं | पहले वह खुश नहीं था आपके आदाब बजा लाने से वह खुश हो जाता है | इस तरह उसमें हर वक्त, हर लम्हा, तब्दीली होती रहती है क्योंकि न जाने कौन कहाँ-कहाँ नमाज पढ़ रहा है, उसका आदाब बजा ला रहा है और उसमें हर वक्त कुछ न कुछ परिवर्तन हो रहा है | ऐसा खुदा प्रतिक्षण परिवर्तनशील है | ऐसा खुदा मुतगय्यर होगा, परिवर्तनशील होगा | मौलवी जरा होश में आए और कहने लगे,"पण्डित जी, खुदा पर इसका कोई असर नहीं होता, इसका असर हम पर ही होता है |" मैंने कहा, " आप सँभल गए, वर्ना आपका खुदा खुदा न रहकर कुछ और ही हो जाता, तबदील होकर न जाने क्या बन जाता |" याद रखिए पर इस आदाब बजा लाने का कोई असर नहीं है |

खुदा से आप फायदा उठाइए | यदि इस बल्ब के सामने आपको कोई पुस्तक पड़नी है तो आप इस प्रकार खड़े हो जाइए जिससे कि आप अच्छे प्रकार से पढ़ सकें | यह आपका कर्त्तव्य है बल्ब का नहीं | इस प्रकार खुदा में कोई तबदीली नहीं होती | मैंने कहा कि आपके तरीके से जो आप एक्टर होंगे और खुदा एक्टेड अपान होगा | आप फाइल होंगे और वह मफऊल होगा, आप कर्त्ता होंगे और वह कर्म हो जाएगा | इसलिए यह मानने योग्य बात नहीं है | कि खुदा पर आदाब बजा लाने का कोई प्रभाव होता है | ईसाइयों के सम्बन्ध में मैंने आपको पहले से ही कहा है कि उनका तरीका मुसलमानों से मिलता‍जुलता ही है |

आर्यसमाज कहता है कि हम भगवान् की उपासना करते हैं उपासना का अर्थ है कि हम उसके निकट‌ जाते हैं, उप अर्थात नजदीक, आसन अर्थात बैठना We sit near God (वी सिट नीयर गाड) हम परमात्मा के करीब बैठते है |To sit near (टु सिट नियर),To abide by (टु एबाइड बाई) and to reside in
(एन्ड टु रिसाइड इन) यह तीन अर्थ हैं उपासना के | आर्यों की दृष्टि से उपासना का अर्थ यह हुआ कि हम उसकी आज्ञा का पालन करते हैं, हम ईश्वर में निवास करते हैं और हम ईश्वर के गुणों को धारण करते हैं और इस प्रकार उसके निकट हो जाते हैं, करीब हो जाते हैं | करीब होने का यही अर्थ है | एक लड़का अपने उस्ताद के करीब हो जाता है अर्थात जो भी उसने पढ़ाया है उसे अपने दिल में रख लेता है | मेज उसके ज्यादा नजदीक है लेकिन मेज में इल्म को ग्रहण करने की योग्यता नहीं है | कुर्सी भी नजदीक है लेकिन उसमें भी ग्रहण करने की योग्यता नहीं है | लेकिन मेज व कुर्सी से दूर जो बच्चे हैं उनमें ग्रहण करने की योग्यता है | उस्ताद जो कह रहा है वे उसे समझते हैं, जिनमें समझने की काबलियत नहीं है वह अलग चीज है | तो जिन बच्चों ने उस्ताद के पढ़ाये हुए को अधिक से अधिक ग्रहण किया है वे उस अपेक्षा से उतने ही उस्ताद के निकट हैं | इसलिए आर्यसमाजी लोग कहते हैं कि परमात्मा के गुणों को जिसने ज्यादा से ज्यादा ले लिया है वह ईश्वर के अधिक नजदीक है और इसी के माने उपासना है इस उपासना के सम्बन्ध में तफसील है किन्तु यह मैंने मुख्तसर आपको अभी बताया है | यह आर्य तरीका है |

(क्रमशः)

THIS IS REALY NICE ARTICAL.

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