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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) तृतीय खण्डः से (5)

पूर्व अंक से आगे -

फिर एक दूसरे स्थान पर अविद्या के हटाने (हान) का उपाय बतलाते हुए योग दर्शन में लिखा है :-

विवेकख्यातिर विपल्लवा हानोपायः || (योग दर्शन 2|26

अर्थात विच्छेदरहित विवेक-ख्याति (अविद्या के हान का हटाने का) उपाय है | भाव इसका यह है कि प्रकृति और पुरुष के वास्तविक भेद को अनुभव करने रूप विवेक की ख्याति उपाय है, जिस उपाय के निरन्तर चिरकाल-पर्यन्त अभ्यास करने से पुरुष (आत्मा) को अपने स्वरूप का साक्षात्कार होने लगता है | यही साक्षात्कार करने वाली बुद्धि 'समाधि-प्रज्ञा' कहलाती है | इस समाधि-प्रज्ञा से मिथ्या जान दग्ध-बीज होकर समस्त क्लेशादि का नाश हो जाता है विवेक ख्याति दृढ़ और अटल हो जाती है |

"तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा" || (योगदर्शन 2|27

अर्थात उस (समाधि-प्रज्ञा-प्राप्त योगी) की, सात प्रकार की प्रान्त भूमि वाली प्रज्ञा हो जाती है | सूत्र का भाव यह है कि इस प्रकार के विवेकी योगी की प्रज्ञा (बुद्धि) सात प्रकार की प्रान्त भूमि (जिन अवस्थाओं को प्रांत-परला सिरा कह्ते हैं) वाली हो जाती है | वे 7 प्रकार ये हैं -

(1) जिज्ञासा का अन्त - अर्थात सब कुछ जो ज्ञातव्य था, जान लिया | अब जानने की इच्छा समाप्त हुई |

(2) जिहासा अन्त - अविद्या आदि पाँचों क्लेश छोड़ दिए | अब कुछ छोड़ना बाकी नहीं रहा |

(3) प्रेप्सा का अन्त - हान को पा लिया | अब कुछ पा लेना शेष न रहने से प्रेप्सा = प्राप्त करने की इच्छा पूरी हो गई |

(4) चीकीर्षां का अन्त - हान का उपाय कर लिया गया, अब कुछ करना भी बाकी नहीं रहा |

नोट ‍ इन चारों को प्रज्ञा (बुद्धि) की विमुक्ति (छुटकारा) कहते हैं |

(5) बुद्धि स‌त्व की कृतकृत्यता - अर्थात मेरा बुद्धिसत्व कृतार्थ हो गया अब इसका अन्त आ गया |

(6) बुद्धि रूप में परिणत (रूप बदले हुए) गुण भी अपने कारण (प्रकृति) में लय हो गए - जैसे पहाड़ से लुड़कता हुआ कच्चा पत्थर या मिट्टी का ढेला कहीं ठिकाना न पाने से, टूटते टूटते रेत बन जाता है, इसी प्रकार सत्वादि तीनो गुण बुद्धि-सत्व सहित लय को प्राप्त हो जाते हैं |

(7) आत्मा का अपने स्वरूप में भासना - अर्थात प्रकृति के गुणों से पृथक् स्वरूप मात्र में अवस्थित, सत् चित् आत्मा, केवली पुरुष (जीवात्मा) परमात्मा का साक्षात करेगा, अब कुछ बाकी नहीं रहा, सब कुछ प्राप्त हो गया |

नोट - इन अन्तिम तीन भूमियों को चित्त की विमुक्ति कहते हैं | फिर एक जगह योग दर्शन में आता है -

तज्जयात्प्रज्ञा SSलोकः || (योगदर्शन 3|5)

उस (संयम=धारणा, ध्यान और समाधि की एकत्रित शक्ति) के जय (सिद्ध=पूरा होने) से प्रज्ञा (बुद्धि) का आलोक (नैर्मल्य) हो जाता है | बुद्धि के निर्मल होने का अभिप्राय‌ यह है कि उसके द्वारा दूरस्थ वा दीर्घकालान्तरित विषयों का भी सम्यक् ज्ञान हो जाता है |

फिर लिखा है कि -

सत्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यम् || (योगदर्शन 3|54)

अर्थात सत्व (बुद्धि) और पुरुष (जीवात्मा) की शुद्धि समान एक जैसी हो जाने पर, कैवल्य (मोक्ष) होता है | महर्षि व्यास ने इस सूत्र पर भाष्य करते हुए लिखा है कि सत्व (बुद्धि) में जब अविद्या निवृत हुई तो रागादि दोष दूर हुए | इनके दूर होने से (सकाम) कर्म छूटे, कर्म के छूटने से जन्म छूटा, जन्म के छूटने से दुःख छूटा, दुख छूटने से मोक्ष हुआ |

(क्रमशः)