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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'पशु धन की सुरक्षा'(2) - लेखक - आर्य संन्यासी महात्मा गोपाल स्वामी सरस्वती जी

"... हाय ! बड़े शोक की बात है कि जब हिंसक लोग गाय, बकरे आदि पशुओं को मारने के लिए ले जाते हैं, तब वे अनाथ तुम-हमको देखके राजा और प्रजा पर बड़े शोक प्रकाशित करते हैं कि देखो ! हमको बिना अपराध बुरे हाल से मारते हैं और हम रक्षा करने तथा मारने वालों को भी दूध आदि अमृत पदार्थ देने के लिए जीवित रहना चाहते हैं और मारे जाना नहीं चाहते | देखो ! हम पशुओं का सर्वस्व परोपकार के लिए है और हम इस लिए पुकारते हैं कि हमको आप लोग बचावें, हम तुम्हारी भाषा में अपना दुख नहीं समझा सकते और आप लोग हमारी भाषा नहीं जानते, नहीं तो क्या हममें से किसी को कोई मारता तो हम भी आप लोगों के सदृश्य अपने मारने वालों को न्याय-व्यवस्था से फाँसी पर न चढ़वा देते ? हम इस समय अतीव कष्ट में हैं....."

".... क्या ऐसा कोई भी मनुष्य है जिसके गले को काटें वा रक्षा करें, वह दुख और सुख का अनुभव न करे ? जब सबको लाभ और सुख ही में प्रसन्नता है तो बिना अपराध के किसी प्राणी का प्राणवियोग करके अपना पोषण करना यह सत्पुरुषों के सामने निन्दित कर्म क्यों न होवे ? सर्वशक्तिमान जगदीश्वर इस सृष्टि में मनुष्यों की आत्माओं में अपनी दया और न्याय को प्रकाशित करे कि जिससे ये सब दया और न्याययुक्त होकर सर्वदा सर्वोपकारक काम करें और स्वार्थपन से पक्षपातयुक्त होकर कृपापात्र गाय आदि पशुओं का विनाश न करें कि जिससे दुग्ध आदि पदार्थों और खेती आदि क्रियाओं की सिद्धि से युक्त होकर सब मनुष्य आनन्द में रहें |"

महर्षि दयानन्द सरस्वती
(गौकरुणानिधि से)

अब गतांक से आगे -

पूरे विश्व में समस्त उच्च कोटि के विचारक, चिन्तक और वैज्ञानिक, जो भी जहाँ हैं, एक मत से शाकाहार का अनुमोदन करते और मांसाहार को त्याज्य मानते हैं | परन्तु भारत का दुर्भाग्य है कि अल्पसंख्यक‌ तो अल्पसंख्यक‌, हिन्दुओं में भी, आर्यों तथा वैश्णव मत के अनुयाइयों को छोड़कर, शैव और शाक्त मतावलम्बी (अर्थात शिवजी और देवी माता के भक्त) तथा अपने आपको दलितों के मसीहा कहलाने वाले नेता एवं तांत्रिक स्वयं मांसाहार करते और उसकी वकालत भी करते हैं | तांत्रिकों का कोई भी अनुष्ठान बिना पशु बलि के पूरा नहीं होता | शाकाहारी हिन्दू समाज भी जातिवाद के कारण इतना बंटा हुआ है, जैसे कहीं ब्राह्मण समाज है, कहीं वैश्य समाज, कहीं कोई बिरादरी, कहीं कोई बिरादरी कि कभी एकजुट होकर एक स्वर में अपनी सही बात भी नहीं रख पाते |

अतः, हे आर्यो ! यह जिम्मेदारी केवल तुम पर आती है, जो अपने आप को वेद-भक्त और महर्षि दयानन्द का उत्त्तराधिकारी कहते हो, कि समझाओ देशवासियों को और केन्द्र तथा राज्यों में सत्तारूढ़ राजनेताओं एवं शासनाधिकारियों को, जो दयानन्द ने कभी कहा था "कि गौ आदि पशुओं का नाश होने से राजा और प्रजा दोनों का नाश हो जाता है " अतः पशुओं की सुरक्षा में ही राष्ट्र की रक्षा है |

जब भारत आजाद हुआ तो 40 करोड़ आबादी वाले इस देश में दूध देने वाले पशुओं (गाय, भैंस, बकरी, भेड़, उँटनी आदि) की संख्या 16 करोड़ थी | आज जब भारत की जनसंख्या 100 करोड़ से ऊपर है, दूध देने वाले पशुओं की संख्या घटकर केवल 12 करोड़ रह गई है | दुधारू पशुओं की कुछ प्रजातियाँ तो लुप्त प्रायः हो गई हैं | कृत्रिम गर्भाधान की पशुओं के प्रति अपनायी जाने वाली प्रक्रिया जो इतनी असभ्य और अशिष्ट है, उसके कारण, और पशुओं में फैलती संक्रामक बिमारियों के कारण, (जिनकी रोकथाम का कोई समुचित प्रबन्ध नहीं है) पशु दिन-प्रतिदिन मरते जाते हैं | अलावा इसके जो पशु-वध प्रतिदिन लाखों की संख्या में देश में माँस की पूर्ति के लिए होता है, हजारों की संख्या में पशुओं की तस्करी प्रतिदिन पाकिस्तान और बाँगलादेश को हो जाती है | दिन में सौदे, धन के लोभी पशु पालन के करते हैं, और रात्रि में पशु सीमा पार हाँक दिये जाते हैं, जिन्हें प्रातः को पकड़कर वधशाला में ले जाया जाता है |

देश में दूध की बढ़‌ती माँग को भ्रष्ट व्यापारी कृत्रिम दूध (Synthatic Milk) बनाकर पूरा कर रहे हैं| न शुद्ध दूध है, न शुद्ध घी है, और न शुद्ध् मावा देश में उपलब्ध है |

जो देश इस तथ्य के लिए प्रसिद्ध था, कि यहाँ दूध और घी की नदियाँ बहती थीं, वहाँ दूध आज जिस भाव बिक रहा है, वह सबको विदित है | आबादी की दृष्टि से दूध की माँग बढ़ती रही और दूध देने वाले पशु कटते या मरते रहे तो कोई आश्चर्य नहीं, कि अगले 5 - 10 वर्षों में दूध का भाव 100/- प्रति लीटर न हो जाये | केवल औषधि आदि के लिए ही दूध उपलब्ध होगा | न छोटे बच्चों को और न वृद्धों को पीने को दूध होगा, तो क्या होगा देश का ? यज्ञ-हवन का भी कोई लाभ पर्यावरण की शुद्धता के लिए नहीं होगा, यदि आहुति शुद्ध घृत की नहीं होगी | वेद में आया "... घृतेन बोधय" (यजु. 3|1-12|30, ऋग़् 8|44|1) कैसे यज्ञ कुण्ड में और इस पिण्ड में अग्नि का वर्धन होगा, जब घृत के स्थान पर केवल वनस्पति तेल या रिफाइण्ड आयल ही बाजार में उपलब्ध होगा ?

मात्र नारे लगाने से कि "गौ माता की जय" या "गौ माता की रक्षा हो" बात नहीं बनने वाली | गौ संवर्धन (जिसमें घरेलू पशुओं का संवर्धन सन्निहित‌ है) का जो कार्य योगीराज कृष्ण ने द्वापर युग में किया था उसी कार्य को इस युग में कृयान्वयन करने की आवश्यक्ता है | दुधारू पशु सड़कों, राजमार्गों, या खेतों में मार खाते न फिरें, उसके लिए उनके आवास, आराम और आहार की समुचित व्यवस्था होनी चाहिये जिससे उनको आहार में "हरा चारा" (Green fodder) समुचित मात्रा में मिल सके |

(क्रमशः)

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