Dharma, Karma, Akarma
As an individual how do I determine what is my dharma and accordingly act in karma. Once I know dharma and indulge in satkarma, how do I make my karma akarma ie not binding on myself?
I am asking this because I do not find satisfaction in anything that I have done till now.
इत्यादि
इत्यादि अनेक मन्त्रों के प्रमाणों और ऋषि मुनियों की साक्षियों से यह धर्म का उपदेश किया है कि सब मनुष्यों को इसी धर्म के काम करना उचित है | इससे विदित हुआ कि सब मनुष्यों के लिये धर्म और अधर्म एक ही हैं, दो नहीं | जो कोई इसमें भेद करे तो उसको अज्ञानी और मिथ्यावादी ही समझना चाहिये |"
It seems the below mentioned statement needs revision.
"इससे विदित हुआ कि सब मनुष्यों के लिये धर्म और अधर्म एक ही हैं, दो नहीं | जो कोई इसमें भेद करे तो उसको अज्ञानी और मिथ्यावादी ही समझना चाहिये|"
Kindly explain.
Best Regards,
Rajesh
इसका अर्थ
इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म अलग अलग मनुष्यों के लिये अलग अलग नहीं है, इसी प्रकार जो एक व्यक्ति के लिये अधर्म है वही दूसरे के लिये भी अधर्म है | अर्थात दुनिया में मानव धर्म एक ही है जो अन्तर है वह मत मतान्तरों का है न कि धर्म का | अतः सभी मत मतान्तरों की समान बातों को ले लिया जाय तो वह वास्तविक धर्म होगा | इसमे यदि त्रुटि लगे तो कृपया बताईएगा |
धन्यवाद
आनन्द
बहुत ही
बहुत ही अच्छी तरह् से समझाया आनन्द जी, भाई वाह |
Namastey Rohit ji, We await
Namastey Rohit ji,
We await your comments after the expalanations by Ananad ji.
Namaste Anandji,
Namaste Anandji, Adityaji
Sorry for delay in reply. I need to go through the references quoted by Shri Anandji. At this point of time it does not make sense to me since I have not gone through the original literature and translations by scholars.
Is there a way by which I can get notifications to my email on replies I get to my questions?
Some more questions that came to my mind as I went through the answer were clarifications on this:
1) What is the order of various parts of body… Senses, mind (imagination portion), knowledge, wisdom, common sense, soul?
2) What is avidya, asmita, rag, dvesh, nivesh, asakti?
3) What is sanatan dharm and who is arya? Where do we find the word sanatan dharm being used for first time in history?
4) What is arya samaj doing to promote development of vedic science?
Namestey Rohit ji,
Namestey Rohit ji,
Unfortunately there isn't a direct way to be notified about postings to a discussion thread. Its a good feature to have, we would try to implement it in a future version of the website.
Dhanyavad,
Anupam.
Namaste Anupam ji, Please
Namaste Anupam ji,
Please let me know by when we can have this feature. Besides this, please propagate that all arya members across the country should get registered in site and should visit the site with higher frequency and the site should send notifications about developments/ events taking place in arya samaj on regular basis.
Dhanyavad,
Rohit
Namaste Rohit ji I would
Namaste Rohit ji
I would take up your second question first.
"अविद्या के लक्षण ये हैं -
अनित्य अर्थात कार्य्य जो शरीर आदि स्थूल पदार्थ तथा लोकलोकान्तर में नित्यबुद्धि ; तथा जो नित्य अर्थात् ईश्वर, जीव, जगत् का कारण,क्रिया क्रियावान्, गुण गुणी और धर्म धर्मी हैं, इन नित्य पदार्थों का परस्पर सम्बन्ध है, इनमें अनित्य बुद्धि का होना, यह अविद्या का प्रथम भाग है |
तथा (अशुचि) मलमूत्र आदि के समुदाय दुर्गन्धरूप मल से परिपूर्ण शरीर में पवित्रबुद्धि का करना, तथा तलाब, बावरी, कुण्ड, नदी आदि में तीर्थ और पाप छुड़ाने की बुद्धि करना और उनका चरणामृत पीना ; एकादशी आदि मिथ्या व्रतों में भूख प्यास आदि दुखों का सहना ; स्पर्श इन्द्रिय के भोग में अत्यन्त प्रीति करना इत्यादि अशुद्ध पदार्थों को शुद्ध मानना और सत्यविद्या, सत्यभाषण, धर्म, सत्संग, परमेश्वर की उपासना, जितेन्द्रियता, सर्वोपकार करना, सब से प्रेमभाव से वर्त्तना आदि आदि शुद्ध व्यवहार और पदार्थों में अपवित्र बुद्धि करना, यह अविद्या का दूसरा भाग है |
इसी प्रकार अनात्मा में आत्मबुद्धि अर्थात् विषयतृष्णा, काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष आदि दुःखरूप व्यवहारों में सुख मिलने की आशा करना, जितेन्द्रियता निष्काम, शम, सन्तोष, विवेक, प्रसन्नता, प्रेम, मित्रता आदि सुखरूप व्यवहारों में दुःखबुद्धि करना, यह अविद्या का तीसरा भाग है |
इसी प्रकार अनात्मा में आत्मबुद्धि अर्थात् जड़ में चेतनभावना और चेतन में जड़भावना करना, अविद्या का चतुर्थ भाग है | यह चार प्रकार की अविद्या संसार के अज्ञानी जीवों को बन्धन का हेतु होके उनको सदा नचाती रहती है | परन्तु विद्या अर्थात् पूर्वोक्त अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्मा में अनित्य, अपवित्रता, दुःख और अनात्मबुद्धि का होना, तथा नित्य, शुचि, सुख और आत्मा में नित्य, पवित्रता, सुख और आत्मबुद्धि करना यह चार प्रकार की विद्या है | जब विद्या से अविद्या की निवृति होती है तब बंधन से छूट के जीव मुक्ति को प्राप्त होता है
2. अस्मिता - दूसरा क्लेश अस्मिता कहाता है अर्थात् जीव और बुद्धि को मिले समान देखना ; अभिमान और अहङ्कार से अपने को बड़ा समझना इत्यादि व्यवहार को अस्मिता जानना | जब सम्यक् विज्ञान से अभिमान आदि के नाश होने से इसकी निवृति हो जाती है, तब गुणों के ग्रहण में रुचि होती है |
3. राग - तीसरा राग , अर्थात् जो जो सुख संसार में साक्षात् भोगने में आते हैं, उनके संस्कार की स्मृति से जो तृष्णा के लोभसागर में बहना है इसका नाम राग है | जब ऐसा ज्ञान मनुष्य को होता है कि सब संयोग, वियोग, सयोगवियोगान्त हैं अर्थात् वियोग के अन्त में संयोग और संयोग के अन्त में वियोग तथा वृद्धि के अन्त में क्षय और क्षय के अन्त में वृद्धि होती है , तब इसकी निवृति हो जाती है |
4. द्वेष - चौथा द्वेष कहाता है अर्थात् जिस अर्थ का पूर्व अनुभव किया गया हो उस पर और उसके साधनों पर सदा क्रोधबुद्धि होना | | इसकी निवृति भी राग की निवृति से ही होती है |
5. अभिनिवेश - पांचवां (अभिनिवेश) क्लेश है, जो सब प्राणियों को नित्य आशा होती है कि हम सदैव शरीर के साथ बने रहें अर्थात् कभी मरें नहीं, सो पूर्व जन्म के अनुभव से होती है | और इससे पूर्व जन्म भी सिद्ध होता है | क्योंकि छोटे मोटे कृमि चींटी आदि जीवों को भी मरण का भय बराबर बना रहता है | इसी से इस क्लेश को अभिनिवेश कहते हैं | जो कि विद्वान, मूर्ख तथा क्षुद्रजन्तुओं में भी बराबर दीख पड़ता है | इस क्लेश की निवृति उस समय होगी जब जीव, परमेश्वर और प्रकृति अर्थात् जगत् के कारण को नित्य और कार्यद्रव्य के संयोग वियोग को अनित्य जान लेगा |
आगे आपने आसक्ती को भी लिया है, तो यह राग के अन्तर्गत ही आ जाती है
Now lets take question No 1 and I shall start with 'Soul'. Maharshi Dayanand writes in Satyartha Prakash, (Sammulas - 9) as follows
"देखो ! आप चेतनस्वरूप हैं इसी से ज्ञानस्वरूप और मन के साक्षी हैं क्योंकि जब मन शांत, चञ्चल, आनन्दित वा विशादयुक्त होता है उसको यथावत् देखते हैं वैसे ही इन्द्रियां प्राण आदि का ज्ञाता, पूर्वदृष्ट का स्मरणकर्त्ता और एक काल में अनेक पदार्थों का वेत्ता, धारणाकर्षणकर्त्ता और सबसे पृथक हैं | जो पृथक न होते तो स्वतन्त्र कर्त्ता इनके प्रेरक अधिष्ठाता कभी नहीं हो सकते |"
Thus Soul is the commander of the body which can control mind ,intellect, Prana's simultaneously and is the observer of all the functions through these components. To understand the funcion of senses, mind & intellect i/c common sense, wisdom our shastras have given a very easy to understand method
शरीर को (समझने के लिए) पंच कोषों से बना हुआ माना गया है यह पाँच कोष हैं, जिनसे जीव सब प्रकार के कर्म, उपासना और ज्ञानादि व्यवहारों को करता है -
1. अन्नमय कोष - जो त्वचा से लेकर अस्थिपर्यन्त का समुदाय पृथिवीमय है |
2. प्राणमय कोष - जिसमें प्राण, अपान, समान, उदान व व्यान यह प्राण के पाँच भाग कार्यरत् हैं
3. मनोमय कोष - जिसमें मन के साथ अहँकार , वाक्, पाद, पाणि, पायु, और उपस्थ पाँच कर्म इन्द्रियाँ हैं
4. विज्ञानमय कोष - जिसमें बुद्धि, चित्त, श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका ये पाँच ज्ञान इन्द्रियां जिनसे जीव ज्ञानादि व्यवहार करता है |
5. अनन्दमय कोष - जिसमें प्रीति, प्रसन्नता, न्यून आनन्द, अधिकानन्द, आनन्द और आधार कारण रूप प्रकृति है
इसी पर और प्रकाश आप http://www.aryasamaj.org/newsite/node/433 ; http://www.aryasamaj.org/newsite/node/439 पर भी पा सकते हैं
The rest of the questions we can take afterwards, because I think it has all ready become quite lengthy.
Dhanyawad
Anand
Namaste Anand ji, Thanks for
Namaste Anand ji,
Thanks for reply which is illuminating.
Dhanyawad,
Rohit

Namaste Rohit ji, You have
Namaste Rohit ji, You have put a great question. I hope some Vidvaan in the group may also throw light on this. I would advise you to go through the following points/quotes from Mahrishi Dayanand's RIGVED-BHASHIA-BHUMIKA to derive the answer yourself.
This is from Chapter Eleven dealing with DHARMA AS EXPLAINED IN VEDAS. For more details you can refer to RIGVED BHASHIA BHUMIKA
" धर्म का ज्ञान तीन प्रकार से होता है - एक तो धर्मात्मा विद्वानों की शिक्षा, दूसरा अत्मा की शुद्धि तथा सत्य को जानने की इच्छा, और तीसरा परमेश्वर की कही वेदविद्या को जानने से ही मनुष्यों को सत्य असत्य का यथावत् बोध होता है, अन्यथा नहीं |"
"देखो परमेश्वर हम सब के लिये धर्म का उपदेश करता है कि, हे मनुष्य लोगो ! जो पक्षपात से रहित न्याय सत्याचरण से युक्त धर्म है, तुम लोग उसी को ग्रहण करो, उससे विपरीत कभी मत चलो, किन्तु उसी की प्राप्ति के लिये विरोध को छोड़कर परस्पर सम्मति में रहो, जिससे तुम्हारा उत्तम सुख सब दिन बढ़ता जाय और किसी प्रकार का दुख न हो , तुम लोग विरुद्धवाद को छोड़कर परस्पर आपस में प्रीति के साथ पढ़ना पढ़ाना, प्रश्न उत्तर सहित संवाद करो, जिससे तुम्हारी सत्यविद्या नित्य बढ़ती रहे , तुम लोग अपने यथार्थ ज्ञान को नित्य बढ़ाते रहो, जिससे तुम्हारा मन प्रकाशयुक्त होकर पुरुषार्थ को नित्य बढ़ावे..."
"..यह बात निश्चय करके जान लो कि मैं सत्य के साथ तुम्हारा और तुम्हारे साथ सत्य का संयोग करता हूँ | इसलिये कि तुम लोग इसी को धर्म मान के सदा करते रहो और इससे भिन्न को धर्म कभी मत मानो |"
"सत्य को उत्तम इसलिये कहते हैं कि सत्य जो ब्रह्म है, उससे सब लोगों का प्रकाश और वायु आदि पदार्थों का रक्षण होता है | सत्य से ही सब व्यवहारों में प्रतिष्ठा और परब्रह्म को प्राप्त होके मुक्ति का सुख भी मिलता है, तथा सत्पुरुषों में सत्याचरण ही सत्पुरुषपन है |.. पूर्वोक्त तप से ही विद्वान लोग परमेश्वर देव को प्राप्त होके, सब काम क्रोध आदि शत्रुओं को जीत के, पापों से छूट के , धर्म में ही स्थिर रह सकते हैं, इससे तप को भी श्रेष्ठ कहते हैं |.. दम से मनुष्य पापों से अलग होके और ब्रह्मचर्य आश्रम का सेवन करके विद्या को प्राप्त होता है , इसलिये धर्म का दम भी श्रेष्ठ लक्षण है |.. शम का लक्षण यह है कि जिससे मनुष्य लोग कल्याण का ही आचरण करते हैं, इससे यह भी धर्म का लक्षण है |..दान से ही यज्ञ, अर्थात दाता के आश्रय से सब प्राणियों का जीवन होता है, और दान से ही शत्रुओं को जीत कर अपना मित्र कर लेते हैं, इससे दान भी धर्म का लक्षण है | .. जिससे मनुष्यों का जन्म और प्रजा में वृद्धि होती है और जो परम्परा से ज्ञानियों की सेवा से ऋण अर्थात बदले का पूरा करना होता है , इससे प्रजनन भी धर्म का हेतु है क्योंकि जो मनुष्यों की उत्पत्ति भी नही हो तो धर्म को ही कौन करे |.."
".. प्रातः, सन्ध्या काल में वायु तथा वृष्टि जल को दुर्गन्ध से छुड़ा के सुगन्धित करने से सब मनुष्यों को स्वर्ग अर्थात सुख की प्राप्ति होती है, इसलिये अग्निहोत्र को भी धर्म का लक्षण कहते हैं |... इससे विद्या और अध्वर्यु आदि यज्ञ को भी धर्म का लक्षण कहते हैं | मन के शुद्ध होने से ही विद्वान लोग प्रजापति अर्थात परमेश्वर को जान के नित्य सुख को प्राप्त हो सकते हैं | पवित्र मन से सत्य ज्ञान होता है, और उसमें जो विज्ञान आदि ऋषि अर्थात गुण है , उनसे परमेश्वर और जीव लोग भी अपनी अपनी सब प्रजा को उत्पन्न करते हैं अर्थात परमेश्वर के विद्या आदि गुणों से मनुष्य की प्रजा उत्पन्न होती है | इससे मन को जो पवित्र और विद्यायुक्त करना है , ये भी धर्म के उत्तम लक्षण और साधन हैं | इससे मन के पवित्र होने से सब धर्मकार्य सिद्ध होते हैं | ये सब धर्म के ही लक्षण हैं | इनमें से कुछ तो पूर्व कह दिये और कुछ आगे भी कहेंगे |
"अग्ने व्रतपते व्रतं चरष्यामि तच्छकेयं तन्में राध्यताम| इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि ||6|| य.अ. 1| म. 5||इस मन्त्र का अभिप्राय यह है कि सब मनुष्य लोग ईश्वर के सहाय की इच्छा करें क्योंकि उसके सहाय के बिना धर्म का पूर्ण ज्ञान और उसका अनुष्ठान पूरा कभी नहीं हो सकता |..."
"जिसके आचरण करने से संसार में उत्तम सुख और निःश्रेयस अर्थात मोक्षसुख की प्राप्ति होती है, उसी का नाम धर्म है | यह भी वेदों की व्याख्या है |
इत्यादि अनेक मन्त्रों के प्रमाणों और ऋषि मुनियों की साक्षियों से यह धर्म का उपदेश किया है कि सब मनुष्यों को इसी धर्म के काम करना उचित है | इससे विदित हुआ कि सब मनुष्यों के लिये धर्म और अधर्म एक ही हैं, दो नहीं | जो कोई इसमें भेद करे तो उसको अज्ञानी और मिथ्यावादी ही समझना चाहिये |"
Further regarding the second part of your question, I would take you to chapter 20 . This deals with the subject of "MUKTI" because when you do 'NISHKAM KARMA' you achieve MUKTI.
"इसी प्रकार परमेश्वर की उपासना करके, अविद्या आदि क्लेश तथा अधर्म्माचरक़्ण आदि दुष्ट गुणों को निवारण करके, शुद्ध विज्ञान और धर्मादि शुभ गुणों के आचरण से आत्मा की उन्नति करके, जीव मुक्ति को प्राप्त हो जाता है | अब इस विषय में योगशास्त्र का प्रमाण लिखते हैं | पूर्व लिखी हुई चित्त की पांच वृतियों को यथावत् रोकने और मोक्ष के साधन में सब दिन प्रवृत रहने से, नीचे लिखे हुए पांच क्लेश नष्ट हो जाते हैं | वे क्लेश ये हैं ..
एक अविद्या, दूसरा अस्मिता, तीसरा राग, चौथा द्वेष और पांचवां निवेश ||
.........
अर्थात जब अविद्यादि क्लेश दूर होके विद्यादि शुभ गुण प्राप्त होते हैं, तब जीव सब बन्धनों और दुखों से छूट के मुक्ति को प्राप्त हो जाता है |
.........
अब मुक्ति विषय में गोतमाचार्य्य के कहे हुए न्यायशास्त्र के प्रमाण लिखते हैं -
जब मिथ्याज्ञान अर्थात अविद्या नष्ट हो जाती है , तब जीव के सब दोष नष्ट हो जाते हैं | उसके पीछे (प्रवृति) अर्थात अधर्म, अन्याय, विषयासक्ति आदि की वासना सब दूर हो जाती है | उसके नाश होने से (जन्म) अर्थात फिर जन्म नहीं होता | उसके न होने से सब दुखों का अत्यन्त अभाव हो जाता है | दुखों के अभाव से पूर्वोक्त परमानन्द मोक्ष में अर्थात सब दिन के लिये परमात्मा के साथ आननद ही आनन्द भोगने को बाकी रह जाता है | इसी का नाम मोक्ष है |"
I am sure if you follow the above, you will find the path to your WISDOM.
With Best Wishes
Anand