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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

मन्त्रानुसार आचरण‌

ओउम
नकिर्देवा मिनीमसि नकिरा योपयामसि मन्त्रश्रुत्यं चरामसि|
पक्षेभिरपिकक्षेभिरत्राभि सं रभामहे ||
ऋग्वेद 10.134.7

शब्दार्थ:
हे देवा: दिव्यगुणसम्पन्न महात्माओ
नकि: न तो हम
मिनीमसि हिंसा करते हैं, घातपात करते हैं
न कि: न् ही
आ+योपयामसि फूट डालते हैं
मन्त्र श्रुत्यम मन्त्र के श्रवणानुसार
चरामसि आचरण करते हैं
कक्षेभि: तिनकों के समान तुच्छ
पक्षेभि साथियों के साथ
अपि भी
सम् एक होकर
अत्र इस जगत में
अभिरभामहे वेगपूर्वक कार्य करते हैं

हे दिव्यगुणसम्पन्न महात्माओ ! न तो हम हिंसा करते हैं, घातपात करते हैं और न ही फूट डालते हैं, वरन् मन्त्र के श्रवणानुसार आचरण करते हैं, चलते हैं| तिनकों के समान तुच्छ साथियों के साथ भी एक होकर, एकमत होकर, मिलकर् इस जगत में वेगपूर्वक कार्य करते हैं ||

(स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती)

[O virtuous Holy men ! Neither we kill , nor we destroy nor we divide, instead we follow Mantra's Noble Thoughts and act according to them. We work with the weakest fragments in full unison as one and move in the universe with tremendous speed. ]

मन्त्रश्र

मन्त्रश्रुत्यञ्चरामसि |

श्री आनन्दजी,
आपने ऋग्वेद १०‍|१३४|७ मन्त्र अनुसार आचरण करने की प्रेरणा का मन्त्र उद्घृत किया है
और आज 25.5.2011 को मैनें भी थोड़े से अन्तर से सामवेद का १७६ मन्त्र का
"मन्त्रानुकूल जीवन" विषय पर पं. देव नारायण भारद्वाज रचित काव्यानुवाद
प्रस्तुत किया है आशा है आपको आपके उपरोक्त ऋग्वेद के मन्त्र का ही गीत
अवश्य पसन्द आयेगा | दोनों मन्त्रों के अर्थ में कोई अधिक अन्तर नहीं है |

राजेन्द्र आर्य‌