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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आइये ऋषि से जानें कुछ प्रश्नों के उत्तर - वेदोत्पत्तिविषयः (7)

प्र. - चार मुख के ब्रह्मा जी ने वेदों को रचा, ऐसे इतिहास को हम लोग सुनते हैं |
उ. - ऐसा मत कहो, क्योंकि इतिहास को शब्दप्रमाण के भीतर गिना है | (आप्तो.) अर्थात सत्यवादी विद्वानों का जो उपदेश है उसको शब्दप्रमाण में गिनते हैं, ऐसा न्यायदर्शन में गोतमाचार्य ने लिखा है, तथा शब्दप्रमाण से जो युक्त है वही इतिहास मानने योग्य है, अन्य नहीं | इस सूत्र [यह यहां नहीं दिया है] के भाष्य में वात्स्यायन मुनि ने आप्त का लक्षण कहा है कि - जो साक्षात सब विद्याओं का जाननेवाला कपट आदि दोषों से रहित धर्मात्मा है, कि जो सदा सत्यवादी, सत्यमानी और सत्यकारी है, जिसको पूर्ण विद्या से आत्मा में जिस प्रकार का ज्ञान है उसके कहने की इच्छा की प्रेरणा से सब मनुष्यों पर कृपादृष्टि से सब सुख होने के लिये सत्य उपदेश का करने वाला है, और जो पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त सब पदार्थों को यथावत् साक्षात् करना और उसी के अनुसार वर्त्तना है इसी का नाम आप्ति है, इस आप्ति से जो युक्त हो उसको 'आप्त' कहते हैं | उसी के उपदेश का प्रमाण होता है, इससे विपरीत मनुष्य का नहीं, क्योंकि सत्य वृतान्त का ही नाम इतिहास है, अनृत का नहीं | सत्यप्रमाणयुक्त जो इतिहास है वही सब मनुष्यों को ग्रहण करने योग्य है, इसके विपरीत इतिहास का ग्रहण करना किसी को योग्य नहीं, क्योंकि प्रमादी पुरुष के मिथ्या कहने का इतिहास में ग्रहण ही नहीं होता | इसी प्रकार व्यासजी ने चारों वेदों की संहिताओं का संग्रह किया है , इत्यादि इतिहासों को भी मिथ्या ही जानना चाहिये | जो आजकल के बने ब्रह्मवैवर्तादि पुराण और ब्रह्मयामल आदि तन्त्र ग्रन्थ हैं इनमें कहे इतिहासों को प्रमाण करना किसी मनुष्य को योग्य नहीं, क्योंकि इनमें असम्भव और अप्रमाण कपोलकल्पित मिथ्या इतिहास बहुत लिख रक्खे हैं | और जो सत्यग्रन्थ शतपथ ब्राह्मणादि हैं उनके इतिहासों का कभी त्याग नहीं करना चाहिये |

प्र. - जो सूक्त और मन्त्रों के ऋषि लिखे जाते हैं, उन्होंने ही वेद रचे हों, ऐसा क्यों न माना जाय ?
उ. - ऐसा मत कहो, क्योंकि ब्रह्मादि ने भी वेदों को पढ़ा है | सो श्वेताश्वतर आदि उपनिषदों में यह वचन है कि - 'जिसने ब्रह्मा को उत्पन्न किया और ब्रह्मादि को सृष्टि की आदि में अग्नि आदि के द्वारा वेदों का उपदेश किया है उसी परमेश्वर के शरण को हम लोग प्राप्त होते हैं |' इसी प्रकार ऋषियों ने भी वेदों को पढ़ा है | क्योंकि जब मरीच्यादि ऋषि और व्यासादि मुनियों का जन्म भी नहीं हुआ था उस समय में भी ब्रह्मादि के समीप वेदों का वर्त्तमान था | इस में मनु के श्लोकों की भी साक्षी है कि - 'पूर्वोक्त अग्नि वायु रवि और अङ्गिरा से ब्रह्माजी ने वेदों को पढ़ा था|' जब ब्रह्माजी ने वेदों को पढ़ा था तो व्यासादि और हम लोगों की तो कथा क्या ही कहनी है |

प्र. - वेद और श्रुति यह दो नाम ऋग्वेदादि संहिताओं के क्यों हुए हैं ?
उ. - अर्थभेद से | क्योकि एक (विद) धातु ज्ञानार्थ है, दूसरा (विद) सत्तार्थ है, तीसरे (विद्लृ) का लाभ अर्थ है, चौथे (विद) का अर्थ विचार है | इन चार धातुओं से करण और अधिकरणकारक में 'धञ्' प्रत्यय करने से 'वेद' शब्द सिद्ध होता है | तथा (श्रु) धातु श्रवण अर्थ में है , इससे करणकारक में 'क्तिन्' प्रत्यय के होने से श्रुति शब्द सिद्ध होता है | जिनके पढ़ने से यथार्थ विद्या का विज्ञान होता है , जिनको पढ़ के विद्वान होते हैं, जिनसे सब सुखों का लाभ होता है और जिनसे ठीक ठीक सत्यासत्य का विचार मनुष्यों को होता है, इससे ऋक्संहितादि का 'वेद' नाम है | वैसे ही सृष्टि के आरम्भ से आज पर्यन्त और और ब्रह्मादि से लेके हम लोग पर्यन्त जिससे सब सत्यविद्याओं को सुनते आते हैं इससे वेदों का 'श्रुति' नाम पड़ा है | क्योंकि किसी देहधारी ने वेदों के बनाने वाले को साक्षात कभी नहीं देखा, इस कारण से जाना गया कि वेद निराकार ईश्वर से ही उत्पन्न हुए हैं, और उनको सुनते सुनाते ही आज पर्यन्त सब लोग चले आते हैं | तथा अग्नि वायु आदित्य और अङ्गिरा इन चार मनुष्यों को, जैसे वादित्र को कोई बजावे वा काष्ठ की पुतली की चेष्ठा करावे, इसी प्रकार ईश्वर ने उनको निमित्तमात्र किया था, क्योंकि उनके ज्ञान से वेदों की उत्पत्ति नहीं हुई | किन्तु इससे यह जानना कि वेदों में जितने शब्द अर्थ और सम्बन्ध हैं वे सब ईश्वर ने अपने ही ज्ञान से उनके द्वारा प्रकट किये हैं |
महर्षि दयानन्द सरस्वती
(ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका
(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
Q/A on CREATION OF VEDAS from MAHRISHI DAYANANDA SARASWATI(7)