वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (7)

वायविन्द्रश्च चेतथः सुतानां वाजिनीवसू | तावा यातमुप द्रवत् ||5||
ऋग्वेद 1|2|5||
पदार्थ - हे ज्ञानस्वरूप ईश्वर‌ ! आपके धारण किये हुए प्राताकाल के तुल्य प्रकाशमान पूर्वोक्त सूर्य्यलोक और वायु आपके उत्पन्न किये पदार्थों का धारण और प्रकाश करके उनको जीवों के दृष्टिगोचर करते हैं, इसी कारण वे शीघ्रता से उन पदार्थों के समीप होते रहते हैं ||5||
भावर्थ - इस मन्त्र में परमेश्वर की सत्ता के अवलम्ब से उक्त इन्द्र और वायु अपने अपने कार्य्य करने को समर्थ होते हैं, यह वर्णन किया है ||5||

वायविन्द्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्कृतम् |
मक्ष्वि त्था धिया नरा ||6||
ऋग्वेद 1|2|6||

पदार्थ - हे सबके अन्तर्यामी ईश्वर ! जैसे आपके धारण किये हुए संसार के सब पदार्थों को प्राप्त करानेवाले अन्तरिक्ष में स्थित सूर्य्य का प्रकाश और पवन हैं, वैसे ये ‍--'इन्द्रिय.' इस व्याकरण के सूत्र करके इन्द्र शब्द से जीव का, और 'प्राणो.' इस प्रमाण से वायु शब्द करके प्राण का ग्रहण होता है -- शीघ्र गमन से, धारण पालन वृद्धि और क्षय हेतु से सोम आदि सब ओषधियों के रस को उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार शरीर में रहने वाले जीव और प्राणवायु उस शरीर में सब धातुओं के रस को उत्पन्न करके धारण पालन वृद्धि और क्षय हेतु से सब अङ्गों को शीघ्र प्राप्त होकर धारण करने वाली बुद्धि और कर्मों से कर्मों के फलों को प्राप्त होते हैं ||6||
भावार्थ - ब्रह्माण्डस्थ सूर्य्य और वायु सब संसारी पदार्थों को बाहर से तथा जीव और प्राण शरीर के भीतर के अंग आदि को सब प्रकार प्रकाश और पुष्ट करने वाले हैं, परन्तु ईश्वर के आधार की अपेक्षा सब स्थानों में रहती है ||6||

मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम् | धियं घृताचीं साधन्ता ||7||
ऋग्वेद 1|2|7||
भावार्थ - इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है | जैसे समुद्र आदि जल-स्थलों से सूर्य्य के आकर्षण से वायु द्वारा जल आकाश में उड़कर वर्षा होने से सबकी वृद्धि और रक्षा होती है, वैसे प्राण और अपान आदि ही से शरीर की रक्षा और वृद्धि होती है | इसलिए मनुष्यों को प्राण अपान आदि वायु के निमित्त से व्यवहार विद्या की सिद्धी करके सबके साथ उपकार करना उचित है ||7||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (7)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Sarswati's RIGVED Bhashya)

उपरोक्त

उपरोक्त ऋग्वेद मन्त्र 1|2|7 में शरीर के भीतर 'जीव्' तथा'प्राण' की तुलना ब्रह्माण्ड्स्थ सूर्य तथा वायु से कर वेद ने जीव को वह राह स्पष्ट कर दी है कि जिससे वह प्राणों को अपनी आकर्षण शक्ति द्वारा चला कर अपने शरीर की रक्षा व वृद्धि करता है अथवा कर‌ सकता है अथवा यूँ कहें कि करनी चाहिये | कैसी अद्भुत व महत्वपूर्ण शिक्षा ! वेद का यह मन्त्र देता है |

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