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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'प्रेम पुजारी'

लोग कहते हैं क्या भगवान, भगवान लगा रक्खी है ? क्या भगवान, भगवान करने से कुछ मिलेगा ? मैं उनसे पूछता हूँ, क्या मैं मैं करने से सब कुछ मिल जाएगा ? आप दुनिया का सब सामान जोड़ लेंगे तो क्या उसका भोग भी लगा सकोगे ? भोग लगा भी लोगे तो कब तक ? जिसको 'मैं' 'मैं' कहते हो, वह ही रोगी हो जाएगा, निर्बल हो जाएगा तो क्या करोगे, सारा सामान कैसे सम्भाल पाओगे ? फिर एक दिन वह छूट जाएगा तो क्या कुछ साथ ले जा सकोगे ? नहीं !, तो फिर क्यों मारे मारे फिर रहे हो ?

स्पष्ट है इस सृष्टि में विद्यमान किसी भी वस्तु को हम प्रयोग तो कर सकते हैं पर उस पर अपना अधिकार नहीं रख सकते | एक न एक दिन हमें उसको छोड़ना ही होगा | जब सृष्टि हमारी नहीं केवल हमारे प्रयोग के लिये है, तो इसे 'मैं' 'मेरी' कह कर क्यों अपने को अन्धेरे में रखते हैं | क्यों जोड़ते हैं अपार धन जिसे आप ले जा ही नहीं सकते | जब आप भगवान भगवान करते हैं तो यह मानते हैं कि सृष्टि का हर कण आनन्द से भरा है | आप उस आनन्द को प्राप्त करते हैं हर वस्तु में, हर कार्य में, हर स्थिती में, हर परिस्थिती में | यह सब प्राप्त‌ करते हुए भी किसी भार को अपने ऊपर नहीं लादते | मेरा मेरा कह कर अपना बोझ नहीं बढ़ाते | अपने को बिलकुल हल्का फुल्का, निर्मल, कोमल बनाए रखते हैं | कितना अन्तर है दोनों स्थितियों में | एक में मैं मैं, मेरा मेरा कर बोझ को सिर पर लादना है, तो दूसरे में बिना बोझ लादे जीवन का आनन्द लेना है |

जब तक हम मैं मैं करते हैं तब तक दुनिया की बहुत सारी बेकार की बातें अत्ति महत्त्वपूर्ण बनी रहती हैं | जैसे किसी को हीरो बना देना, फिर उसी की चापलूसी करना, फिर उसी के कसीदे गाना | यह सब नष्ट प्रायः वस्तुओं पर अपनी शक्ति का व्यय करना है |

जब हम जीवन को मन की वृतियों के क्षुद्र छिद्र में से झाँकते हैं तो हमें दुनिया एक अतीव ही क्षुद्र क्षेत्र दिखाई देता है | जीवन का आनन्द फिर हम कैसे पा सकते हैं ?

जीवन को यदि हम‌ प्रभु की दी हुई मूरत के रूप में मानें, तो यह एक अद्भुत, अतीव सुखदायी अनुभव होना चाहिये | पर क्या ऐसा अनुभव हम कर पाते हैं ? प्रभु ने जीवन दिया जिससे हम प्रभु के समान किसी के पिता, किसी की माता, किसी के भाई, मित्र, सखा, कभी न्यायकारी, दयालू , दानी, कर्मठ, विद्वान, ज्ञानी, योगी, तपस्वी, ऐश्वर्यशाली जैसे अद्भुत गुणों के स्वामी बन आनन्द उठाएँ, परन्तु हमारे सुख के स्त्रोत तो अन्य ही बन गये | केवल अच्छा खाना-पीना, सुन्दर रूप-रंग, शब्द, स्पर्ष, रस तक ही सिमट कर रह गये | प्राकृतिक विषयों को भोगना ही हमारा लक्ष्य रहा | आत्मिक आनन्द, प्रभु का आनन्द, दिव्य गुणों के आनन्द से तो हम वँचित ही रहे | कैसे और क्यों हुआ यह सब ? संसार में एक प्रेमी से प्यार हो जाता है और जीवन आनन्द से भर जाता है | प्रेमी के सौन्दर्य, योवन, प्यार के आकर्षण में मनुष्य सुद्ध-बुद्ध खो बैठता है | तो जीवन के चरम लक्ष्य के रूप में सृष्टि के आनन्द स्त्रोत, परम ऐश्वर्यवान प्रभु को को पा लेना ही क्या वास्तविक ध्येय नहीं होगा ?‌

"आनन्द स्त्रोत बह रहा, पर तू उदास है | अचरज है जल में रह के भी मछली को प्यास है ||"

जीवन की गाड़ी की पटरी अब बदलनी है | वृतियों का घेरा अब तोड़ना होगा | विशाल प्रकाश युक्त आनन्द स्त्रोत को पाना होगा | तब हम चलेंगे उसी की तरह उजालों में, अन्धेरों से दूर, बहुत दूर, किसी के मित्र बन, किसी के सखा, किसी के पिता, माता, साथी, किसी के प्रेमी बन और बन जाएँगे उस परम ज्योतिर्मय के 'प्रेम पुजारी' |

प्रभु ही जीवन का अन्तिम लक्ष्य है, जब तक वहाँ न पहुँचेंगे जीवन‌ अधूरा का अधूरा ही रहेगा |

A stands for Viraat, Agni

A stands for Viraat, Agni and Vishwa, etc. .
U stands forHiranyagarbha, Vaayu and Tajjas, etc.
M stands for I'shwara, A'ditya and Prajnaa, etc.