महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) चतुर्थःखण्डः से (1)
सा ब्रह्मेति होवाच, ब्रह्मणो वा एतद्विजयेमही यध्वमिति, ततो हैव विदांचकार ब्रह्मेति ||1||
अर्थ - उस स्त्री ने उत्तर दिया कि वह (यक्ष) ब्रह्म है | ब्रह्म ही की इस विजय में महत्व लाभ करो, (तब इन्द्र को) इस प्रकार ब्रह्म का ज्ञान हुआ |
तस्माद्वा एते देवा अतितराभिवान्यान्देवान् | यदग्निर्वायुरिन्द्रस्ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते ह्येनप्रत्थमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ||2||
अर्थ - इसलिए ये देव अन्य देवों से आगे बढ़ गये (क्योंकि) ये जो अग्नि, वायु और इन्द्र हैं (ते, हि, एनत्, नेदिष्ठं पस्पृशुः) ये ही देव अपने समीप स्थित ब्रह्म को देख सके और वे ही पहले ब्रह्म को जान पाये |
तस्माद् वा इन्द्रोSतितरामिवान्यान्देवान् स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श स ह्येनत्प्रथमो विदांचकार ब्रह्मेति ||3||
अर्थ - (क्योंकि) इन्द्र (एनत्) इस ब्रह्म को (नेदिष्ठम्) अति समीप (पस्पर्श) देखने वाला हुआ (सः हि) और उसी ने (एनत्) इस यक्ष को (प्रथमः विदाञ्चकार) सबसे पहले जाना (तस्मात्, स, अन्यान, देवान्) इसलिए वह अन्य देवों से (अतितराम् इव) श्रेष्ठ हुआ |
व्याख्या
आख्यायिका को समाप्त करते हुए उपनिषद् के उपर्युक्त वाक्यों में प्रकट किया गया है कि अग्नि, वायु और इन्द्र को अन्य देवों (पंचभूतों या इन्द्रियों) से इसलिए तरजीह है कि वे ब्रह्म की समीपता प्राप्त कर चुके हैं और इन तीनों में इन्द्र को बाकी दो से इसलिए श्रेष्ठता हासिल है कि उसने सबसे पहले ब्रह्म को जाना था |
अग्नि की विशेषता - संसार में उष्णता और गति का कारण अग्नि है | इन दो वस्तुओं को यदि जगत् से पृथक रख दिया जावे तो फिर जगत् जगत् नहीं रह सकता | संस्कृत में अग्नि जिन 'अग', 'अगि' धातुओं से बनता है उन के अर्थ गति के हैं | टिन्डल (Tyndial) ने भी अपने ग्रन्थों में अग्नि को गति ही कहा है | उसके शब्द ये हैं -- Heat is made of motion सूर्य अग्नि का पुंज ही है | सूर्य की उपयोगिता जगत् प्रसिद्ध है | शतपथ ब्राह्मण में अग्नि को 'रक्षसाम् अपहन्ता' कृमि (germ) नाशक कहा है | ऋग्वेद की पहली ही ऋचा में अग्नि को यज्ञ का देव, ऋतुओं और रत्नों को पैदा करने वाला कहा गया है |
वायु की विशेषता - वायु के भेदों का नाम ही प्राण, अपान आदि है | मनुष्य जीवन की स्थिति में प्राण की सबसे अधिक उपयोगिता होने के कारण ही मनुष्य को प्राणी कहा जाता है | प्राण शक्ति (Vital Force, Vital Energy) ही से शरीर के समस्त व्यापार पूर्ण हुआ करते हैं |
इन्द्र की विशेषता - इन्द्र की विशेषता अग्नि और वायु से अधिक होने का कारण स्पष्ट है | अग्नि और वायु पंचभूतों के अंग होने से जड़ हैं, इनमें चेतना का अभाव है परन्तु इन्द्र (जीवात्मा) चेत्नापूर्ण वस्तु है | अथर्ववेद में एक मन्त्र आया है : --
अजो ह्यग्नेरजनिष्ट शोकात्सो अपश्यज्जनितारमग्ने |
तेन् देवा देवतामग्र आयन्तेन रोहान् रुरुहुर्मेध्यासः ||
अथर्ववेद 4|14|1||
अर्थात् (हि अग्नेः शोकात् अजः अजनिष्ट) निश्चय (ब्रह्मरूप) अग्नि के तेज से (अजः) जीवात्मा प्रकट हुआ | (स अग्ने जनितारम् अपश्यत्) उसने पहले अपने उत्पादक प्रभु को देखा, (अग्ने तेन देवाः देवताम् आयन्) प्रारम्भ में उसी (प्रभु) की सहायता से देव (अग्नि आदि 5 भूत अथवा चक्षु आदि इन्द्रियाँ) देवत्व को प्राप्त हुए | (तेन मेध्यासः रोहान् रुरुहुः) उससे पवित्र बन कर उच्च स्थानों को प्राप्त होते हैं |
मन्त्र में स्पष्ट रीति से दो बातें वर्णित हैं |
1. उस जीव ने पहले अपने उत्पादक प्रभु को देखा |
2. देव उसी (प्रभु) की सहायता से देवत्व को प्राप्त हुए | मंत्र ने उपनिषद् में आई आख्यायिका के भाव को, जो इस व्याख्या की उपर्युक्त पंक्तियों में खोला गया है, पुष्ट कर दिया और अब वेद के प्रमाण से भी इन्द्र् का जीवात्मा होना पंचभूतों तथा इन्द्रियों का ब्रह्म से शक्ति प्राप्त करके अपने-अपने काम के योग्य होना, प्रमाणित हो गया |
(क्रमशः)