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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

जितेन्द्रिय गृहस्थ धनियों का धनी

ओउम् | उशिक पावको वसुर्मानुषेधु वरेण्यो होताधायि विक्षु |
दमूना गृहपतिर्दम आँ अग्निर्भुवद्रयिपती रयीणाम ||

ऋग्वेद 1|60|4||

शब्दार्थ -

उशिक्.........................कामनाओंवाला
पावकः.........................पवित्र
वसुः...........................वास देने वाला
मानुषेषु + वरेण्यः.............मनुष्यों में श्रेष्ठ
होता..........................दाता
विक्षु..........................प्रजाओं में
अधायि........................लाया गया है | ऐसा
दमूनाः........................दान्त, जितेन्द्रिय
गृहपतिः.......................गृहस्थ
दमे...........................घर में, अथवा दमन के कारण
रयीणां + रयिपतिः...........सब धनियों का धनी तथा
अग्निः........................नेता, श्रेष्ठ
आ + भुवत्..................सब प्रकार से होता है |

व्याख्या -

इस मन्त्र में श्रेष्ठ पुरुष को ही गृहस्थाश्रम का अधिकार दिया गया है और जितेन्द्रिय गृहस्थ की महिमा का वर्णन किया गया है | गृहस्थ का अधिकारी उशिक् कामनावाला होना चाहिए, क्योंकि अकाम-कामनारहित की कोई क्रिया नहीं हो सकती | संसार में जो कुछ हो रहा है, सब कामना के कारण हो रहा है | जैसे कि मनुजी (2-4) कहते हैं -

अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कर्हिचित् | यद्यद्धि कुरुते किंचित्तत्तत्कामस्य चेष्टितम् ||

निष्काम की कहीं कोई क्रिया दिखाई नहीं देती; जहाँ कहीं भी कोई क्रिया है, सब कामना से है |

गार्हस्थ्याभिलाषी को पवित्र होना चाहिए | अपवित्र, दुराचारी को इस आश्रम का अधिकार नहीं | मनुजी ने कहा है - अधार्यो दुर्बलेन्द्रियैः - दुर्बलैन्द्रियवालों को गृहस्थाश्रम करने का अधिकार नहीं और अविप्लुतब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममाविशेत् अखण्डित ब्रह्मचर्य्यवाला गृहस्थाश्रम में प्रविष्ठ हो | वह दाता और वसु भी होना चाहिए -

यस्मात् त्रयोप्याश्रमिणो दानेनान्नेन चान्वहम् |
गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही || - मनु. 3-78

चूँकि तीनों ही आश्रमियों - ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी - को गृहस्थ ही दान और अन्न के द्वारा प्रतिदिन पालता है, इसलिये गृहस्थाश्रमी श्रेष्ठ है | वेद ने इसको इन शब्दों में कहा है - वसुर्मानुषेधु वरेण्यो होताधायि विक्षु = बसानेवाला, मनुष्यों में श्रेष्ठ दाता प्रजाओं में लाया गया है | गृहस्थ‌ = गृहपति को दान्त = जितेन्द्रिय होना चाहिए | कइयों का भ्रम है कि गृहस्थ होने से उन्हें ब्रह्मचर्यभंग का आदेशपट्ट मिल गया है | अतिप्रसक्ति से मनुष्य हीनवीर्य्य और दुर्बलेन्द्रिय हो जाता है | दुर्बलेन्द्रिय से गार्हस्थ्य‌ का निर्वाह नहीं हो सकता | मनुजी (3-79) में लिखते हैं -

स संधार्यः प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छता | सुखं चेहेच्छता नित्यं योSधार्यो दुर्बलेन्द्रियैः ||

अक्षय सुख और संसारसुख के अभिलाषी को गृहस्थाश्रम प्रयत्न से धारण करना चाहिए, क्योंकि दुर्बलेन्द्रिय मनुष्य इसको धारण नहीं कर सकते | गृहस्थाश्रम एक छोटा सा संसार है | इस संसार को पालने के लिए बड़ी शक्ति चाहिए | शक्ति ब्रह्मचर्य्य और इन्द्रियदमन से प्राप्त होती है, अतः मनुजी (3-45,50) कहते हैं

ऋतुकालाभिगामी स्यात्स्वदारनिरतः सदा | ब्रह्मचार्येण भवति यत्र तत्राश्रमे वसन् ||

गृहस्थ यदि ऋतुकालाभिगामी हो और पत्नि के अतिरिक्त किसी से रत न हो, जिस-किस स्थान में रहता हुआ ऐसा गृहस्थ ब्रह्मचारी ही होता है | ऐसा जितेन्द्रिय गृहस्थ सचमुच - भुवद्रयिपती रयीणाम् - धनियों का भी धनी होता है | ब्रह्मचर्य-धन के समान कोई धन नहीं है | अन्तिम वाक्य से ऐसी ध्वनि निकलती प्रतीत होती है कि दरिद्र को विवाह का अधिकार नहीं है, वह इस व्ययसाध्य आश्रम का अधिकारी कैसे हो सकता है ? विवाह के समय वधू को वर कहता है - ममेयमस्तु पोष्या तेरा पालन मैं करूँगा | दरिद्र का ऐसा कहना विडम्बना ही है |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)