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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आइये ऋषि से जानें कुछ प्रश्नों के उत्तर - वेदोत्पत्तिविषयः (8)

प्र. - वेदों की उत्पत्ति में कितने वर्ष हो गये हैं ?

उ. - एक वृन्द छानवे करोड़ आठ लाख बावन हजार नव सौ छहत्तर अर्थात (1960852976) वर्ष वेदों और जगत् की उत्पत्ति में हो गये हैं और यह संवत 77 सतहत्तरवां वर्त्त रहा है |

प्र. - यह कैसे निश्चय हो कि इतने ही वर्ष वेद और जगत् की उत्पत्ति में बीत गये हैं |

उ. - यह जो सृष्टि है, इसमें सातवें (7) वैवस्वत मनु [मनवन्तर] का वर्त्तमान है, इससे पूर्व छः मन्वन्तर हो चुके हैं |
1. स्वायम्भव
2. स्वारोचिष
3. औत्तमि
4. तामस
5. रैवत
6. चाक्षुष
ये छः तो बीत गये हैं और 7 सातवां वैवस्वत [मनवन्तर] वर्त्त रहा है, और सवर्णि आदि 7 सात मन्वन्त्तर आगे भोगेंगे | ये सब मिल के चौदह मन्वन्त्तर होते हैं | और एकहत्तर चतुर्युगियों का नाम मन्वन्त्तर धरा गया है | सो उसकी गणना इस प्रकार से है कि (1728000) सत्रह लाख, अट्ठाईस हजार वर्षों का नाम सतयुग रक्खा है | (1296000) बारह लाख छानवे हजार वर्षों का नाम त्रेता, (864000) आठ लाख चौंसठ हजार वर्षों का नाम द्वापर और (432000) चार लाख बत्तीस हजार वर्षों का नाम कलियुग रक्खा है तथा आर्यों ने एक क्षण और निमेष से लेके एक वर्ष पर्यन्त भी काल की सूक्ष्म और स्थूल संज्ञा बांधी है | और इन चार युगों के (4320000) तितालिस लाख बीस हजार वर्ष होते हैं, जिनका चतुर्युगी नाम है | एकहत्तर (71) चतुर्युगियों के अर्थात् (306720000) तीस करोड़्, सरसठ लाख, बीस हजार वर्षों की एक मन्वन्त्तर संज्ञा की है, और ऐसे ऐसे छः मन्वन्त्तर मिलकर अर्थात् (1840320000) एक अर्ब, चौरासी करोड़, तीन लाख, बीस हजार वर्ष हुए, और सातवें मन्वन्त्तर के भोग में यह (28) अट्ट्हाईसवीं चत्तुर्युगी है | इस चतुर्युगी में कलियुग के (4976) चार हजार, नवसो, छहत्तर वर्षों का तो भोग हो चुका है और बाकी (427024) चार लाख, सताईस हजार चौबीस वर्षों का भोग होने वाला है | जानना चाहिये कि (120532976) बारह करोड़, पांच लाख, बत्तीस हजार, नवसौ, छहत्तर वर्ष तो वैवस्वत मनु के भोग चुके हैं और (186187024) अठारह करोड़, एकसठ लाख सत्तासी हजार, चौबीस वर्ष भोगने के बाकी रहे हैं | इनमें से यह वर्त्तमान वर्ष (77) सतहत्तरवां है, जिसको आर्य लोग विक्रम का (1933) उन्निस सौ तैतीसवां संवत कहते हैं |

जो पूर्व चतुर्युगी लिख आये हैं उन एक हजार चतुर्युगियों की ब्राह्मदिन संज्ञा रक्खी है और उतनी ही चतुर्युगियों की रात्रिसंज्ञा जानना चाहिए | सो सृष्टि की उत्पत्ति करके हजार चतुर्युगी पर्यन्त ईश्वर इसको बना रखता है, इसी का नाम 'ब्राह्मदिन' रक्खा है, और हजार चतुर्युगी पर्यन्त सृष्टि को मिटा के प्रलय अर्थात् कारण में लीन रख‌ता है उसका नाम 'ब्राह्मरात्रि' रक्खा है | अर्थात् सृष्टि के वर्त्तमान होने का नाम दिन और प्रलय होने का नाम रात्रि है | यह जो वर्त्तमान ब्राह्मदिन है इसके (1960852976) एक अर्ब, छानवे करोड़, आठ लाख, बावन हजार, नवसौ, छ्हत्तर वर्ष इस सृष्टि की तथा वेदों की उत्पत्ति में व्यतीत हुए हैं, और (2333227024) दो अर्ब, तेतीस करोड़, बत्तीस लाख, सत्ताईस हजार, चौबीस वर्ष इस सृष्टि को भोग करने के बाकी रहे हैं | इनमें से अन्त का यह चौबीसवाँ वर्ष भोग रहा है | आगे आने वाले भोग के वर्षों में से एक एक घटाते जाना और गत वर्षों में क्रम से एक एक वर्ष मिलाते जाना चाहिये, जैसे आज पर्यन्त घटाते बढ़ाते आए हैं ||
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यह वैवस्वतमनु का वर्त्तमान है, इसके भोग में यह (28) अट्ठाईसवां कलियुग है | कलियुग के प्रथम चरण का भोग हो रहा है तथा वर्ष, ऋतु, अयन, मास, पक्ष, दिन, नक्षत्र, मुहूर्त, लग्न और पल आदि समय में हमने फलाना काम किया था और करते हैं, अर्थात जैसे विक्रम के संवत 1933 फाल्गुण मास, कृष्णपक्ष, षष्ठी, शनीवार के दिन चतुर्थ प्रहर के आरम्भ में यह बात हमने लिखी है, इसी प्रकार से सब व्यवहार आर्य लोग बालक से वृद्ध पर्यन्त करते और जानते चले आए हैं | जैसे बहीखाते में मिती डालते हैं वैसे ही महीना और वर्ष बढ़ाते घटाते चले जाते हैं | इसी प्रकार आर्य्य लोग तिथिपत्र में भी वर्ष, मास और दिन आदि लिखते चले आते हैं | और यही इतिहास आज पर्य्यन्त सब आर्यावर्त्त देश में एकसा वर्त्तमान हो रहा है और सब पुस्तकों में भी इस विषय में एक ही प्रकार का लेख पाया जाता है, किसी प्रकार का इस विषय में विरोध नहीं है | इसीलिये इसको अन्यथा करने में किसी का सामर्थ्य नहीं हो सकता | क्योंकि जो सृष्टि की उत्पत्ति से लेके बराबर मिती वार लिखते न आते तो इस गिनती का हिसाब ठीक ठीक आर्य्य लोगों को भी जानना कठिन होता, अन्य मनुष्यों का तो क्या ही कहना है | और इससे यह भी सिद्ध होता है कि सृष्टि के आरम्भ से लेके आज पर्यन्त आर्य्य लोग ही बड़े बड़े विद्वान् और सभ्य होते चले आये हैं |

..... यह वृतान्त इतिहास का इसलिये है कि पूर्वापर काल का प्रमाण यथावत् सब को विदित रहे और सृष्टि की उत्पत्ति, प्रलय तथा वेदों की उत्पत्ति के वर्षों की गिनती में किसी प्रकार का भ्रम किसी को न हो, सो यह बड़ा उत्तम काम है | इसको सब लोग यथावत् जान लेवें | परन्तु इस उत्तम व्यवहार को लोगों ने टका कमाने के लिये बिगाड़ रक्खा है, यह शोक की बात है | और टके के लोभ ने भी जो इसके पुस्तक व्यवहार को बना रक्खा, नष्ट न होने दिया, यह बड़े हर्ष की बात है |
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इसमें जो अध्यापक विलसन साहेब और अध्यापक मोक्षमूलर साहेब आदि यूरोपखण्डवासी विद्वानों ने बात कही है कि - वेद मनुष्य के रचे हैं किन्तु श्रुति नहीं हैं, उनकी यह बात ठीक नहीं है | और दूसरी यह है- कोई कहता है (2400) चौबीस सौ वर्ष वेदों की उत्पत्ति को हुए, कोई (2900) उनतीस सौ वर्ष, कोई (3000) तीन हजार वर्ष और कोई कहता है (3100)एकतीस सौ वर्ष वेदों को उत्पन्न हुए बीते हैं, उनकी यह भी बात झूठी है | क्योकि उन लोगों ने हम आर्य्य लोगों की नित्यप्रति की दिनचर्य्या का लेख और संकल्प पठनविद्या को भी यथावत् न सुना और न विचारा है, नहीं तो इतने ही विचार से यह भ्रम उनको नहीं होता | इससे यह जानना अवश्य चाहिये कि वेदों की उत्पत्ति परमेश्वर से ही हुई है, और जितने वर्ष अभी ऊपर गिन आये हैं उतने ही वर्ष वेदों और जगत की उत्पत्ति में भी हो चुके हैं | इससे क्या सिद्ध हुआ कि जिन जिन ने अपनी अपनी देष भाषाओं में अन्यथा व्याख्यान वेदों के विषय में किया है, उन उन का भी व्याख्यान मिथ्या है | क्योंकि जैसा प्रथम लिख आये हैं जब पर्यन्त हजार चतुर्युगी व्यतीत न हो चुकेंगी तब पर्यन्त ईश्वरोक्त वेद का पुस्तक, यह जगत् और हम सब मनुष्य लोग भी ईश्वर के अनुग्रह से सदा वर्त्तमान रहेंगे ||

इति वेदोत्पत्तिविचारः||
महर्षि दयानन्द सरस्वती
(ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका
(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
Q/A on CREATION OF VEDAS from MAHRISHI DAYANANDA SARASWATI(8)