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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) चतुर्थःखण्डः से (2)

तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युतदा 3

इतोन्न्यमीमिषदा 3 इत्यधिदैवतम् ||4||

अर्थ -

(तस्य एषः आदेशः ) उस ब्रह्म का आदेश है | (यत्) जो (एतत्) यह (विद्युतः) बिजली का (व्यद्यु तत*आ इति) चमकना और छिपना है | (इत्) और (न्यमीमिषद्+आ) आँख का खुलना और बन्द हो जाना है | (इति) इस प्रकार (अधिदैवतम्) देवताविषयक ब्रह्म का उपाख्यान है |

जगत् की एक एक रचना जबाने-हाल से प्रभु की सत्ता का सन्देश दे रही है | एक उर्दू कवि ने क्या अच्छा लिखा है :-

हवा नहीं है ये, नेचर की सर्द आहें हैं |
सितारे कब हैं ये, हसरत भरी निगाहें हैं ||

उपनिषद् के इस वाक्य में विद्युत की चमक और आँखों की दमक को प्रभु आदेश बताया गया है | अहा ! कितना सुन्दर आदेश है । विद्युत की चमक के उपलक्षण से जगत् की समस्त ज्योतियों को प्रकट कर रही है | दूसरी और आँखों में भी ज्योति निहित है | आदेश का भाव स्पष्ट हो गया कि नेत्रों की ज्योति के माध्यम से ज्योति को ग्रहण करके अपने को प्रकाशमय बनाओ, मनुष्य के जीवनोद्देश्य की चरम सीमा भी तो यही है कि तुम तम के अन्धकार से निकल कर सच्य की ज्योति में प्रवेश करो** एक दूसरी उपनिषद् में यही भाव, कैसी सुन्दर प्रार्थना में, वर्णन किया गया है -

असतो मा सद् गमय‌
तमसो मा ज्योतिर्गमय |
मृत्योर्मा अमृतं गमेयति ||
(बृहदारण्यकोपनिषद्)

अथाध्यात्मं यदेतद् गच्छतीव च मनोSनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णं संकल्पः ||5||

अर्थ :-

(अथ) अब (अध्यात्मम) अध्यात्म (कहते हैं) (यत्) जो (एतत्) इस ब्रह्म के प्रति (मनः) मन (गच्छति इव‌) चलता हुआ सा है , (च) और (अनेन) इस (मन) से उठें (संकल्प) संकल्प से (अभीक्ष्णम्) बार-बार (एतत्) इस ब्रह्म का (उपस्मरति) स्मरण करता है |

व्याख्या

यदि कोई नियम से निरन्तर सात या आठ घंटे 'तज्जपस्तदर्थभावनम्' की मर्यादा से प्रणव (ओउम्) का जप करे, तो यह निश्चय है कि, मन ठहर जाता है और उसकी वही हालत जागृतावस्था में हो जाती है, जो सुषुप्ति में हुआ करती है | इसी प्राप्त अवस्था को मन का निर्विषय होना कहा जाता है | मन निर्विषय होकर असाक्षात् रीति से आत्मा की अन्तर्मुखी वृत्ति के जागृत कर देने का कारण बन जाता है परन्तु साक्षात कारण नहीं बन सकता | इसीलिये इस उपनिषद्-वाक्य में मन को ब्रह्म की और (गच्छति, इव) चलता हुआ सा कहा गया है | यदि कोई चाहता है कि आत्मा की अन्तर्मुखी वृत्ति को जागृत करके प्र्त्यगात्मदर्शी बने, तो उसको उपर्युक्त भाँति प्रणव का जप करना चाहिए | इसी का नाम अध्यात्म है |

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** सत्व को श्वेत और तम को काले रंग से उपमा देकर श्वेत को अच्छा और काले रंग को बुरा समझा जाता है | क्यों ऐसा समझा जाता है, इसका एक कारण है और महत्वपूर्ण कारण है और वह यह है कि, विज्ञानवेत्ता बतलाते हैं कि सूर्य की किरणें जिनमें सभी रंग होते हैं, सभी वस्तुओं पर पड़ा करती हैं | प्रत्येक वस्तु अपनी सत्ता की दृष्टि से रंग शून्य होती है, सूर्य की किरणों से उनमें रंग आया करते हैं और वे रंगीन दिखलाई दिया करती हैं | गुलाब सब रंगों को अपने में जज्ब करके केवल लाल रंग प्रतिक्षेप (लौटा) कर देता है | इसलिये वह लाल दिखलाई देता और लाल रंग वाला ही कहा जाता है | इसी नियम के अनुकूल हरा रंग लौटाने से कोई वस्तु हरी कही जाती इत्यादि परन्तु जो वस्तु कुछ नहीं लौटाती है, सारे रंगों को अपने भीतर ही लिया करती है वह काली कही जाती है और जो सब कुछ लौटा कर अपने पास कुछ नहीं रखती उसे सफेद कहा करते हैं | अब काले और सफेद रंग का अन्तर स्पष्ट हो गया जो सर्वस्व न्योछावर कर देवे वह सफेद और जो सब कुछ अपने भीतर ही रख लेवे, वह काला कहा जाता है | सत्व को श्वेत कहे जाने का कारण‌ यही है कि उससे मनुष्य की वृत्ति सर्वस्व-त्याग की हो जाया करती है परन्तु तम की अवस्था इसके सर्वथा विपरीत है | जो सब कुछ अपने पास ही रखने का इच्छुक हो उसी को तमोगुण कहा करते हैं |

(क्रमशः)

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