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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

तू ही माँ तू ही पिता

तू ही माँ तू ही पिता

ओउम् | अग्निं मन्ये पितरमग्निमापिमग्निं भ्रातरं सदमित्सखायम् |
अग्नेरनीकं बृहतः संपर्य दिवि शुक्रं यजतं सूर्य्यस्य ||

ऋग्वेद 10|7|3||

शब्दार्थ -

मैं अग्निम्.................मैं सर्वाग्रणी, सबकी उन्नति करनेवाले, सबसे पूर्व विद्यमान भगवान को
पित‌रम्.....................पिता
मन्ये.......................मानता हूँ |
आपिम्.....................आप्त, सम्बन्धी, माँ भी
अग्निम्....................अग्नि को मानता हूँ |
भ्रातरम्.....................भाई भी
अग्निम्....................अग्नि को और
सदम् + इत्...............सदा ही
सखायम्....................सखा, मित्र रहनेवाला भी अग्नि = सबको आगे ले जाने वाले भगवान को मानता हूँ | उस
बृहतः.......................महान
अग्नेः.......................अग्नि = परमात्माग्नि का
अनीकम्....................जीवनदायी तेज
सपर्यम्......................पूजा के योग्य है तथा
दिवि.........................मस्तिष्क में वह
सूर्य्य‌स्य.....................आत्मारूप सूर्य्य‌ का
शुक्रम्.......................शोधक बल एवं
यजतम्......................संगत करने योग्य है |

व्याख्या

संसार में बन्धु-बान्धव प्रिय लगते हैं | दिन में सैंकड़ों-हजारों मनुष्य हमारी आँखों के सामने से गुजरते हैं किन्तु हम किसी को बुलाने का प्रयास नहीं करते | यदि कोई बन्धु सामने से निकलने लगे, हम उसे बुलाने का प्रयत्न करते हैं | उससे हमें विशेष आत्मीयता प्रतीत होती है | इसी प्रकार बन्धुओं में भी माता, पिता, भ्राता आदि निकटवर्ती अधिक प्रीतिपात्र होते हैं |

यह सब ठीक, किन्तु एक दिन आता है, माता का संग छूट जाता है | समय आता है, पिता काल के कराल गाल में विलीन हो जाता है | भाई का संग भी सदा साथ नहीं रहता | अभिन्न कहे जाने वाला मित्र भी एक दिन साथ छोड़ जाता है, किन्तु परमात्मा तो किसी अवस्था में नहीं छोड़ता | परमात्मा उनकी पालना करता है जिनके लौकिक माता-पिता नहीं हैं, अतः जिसने संसार की असारता और सम्बन्धों को बन्धन समझा है, वह कहता है - अग्निं मन्ये पितरमग्निमापिमग्निं भ्रातरं सदमित्सखायम् |

भगवान् में एक ऐसा गुण है, जो और किसी में नहीं | भगवान सभी प्राणियों को आगे बढ़ाते हैं, आगे बढ़ने की सामग्री देते हैं, अतः वही सच्चा बन्धु और सखा है | औपनिषद् ऋषि ने इसी वेदमन्त्र को सामने रख कर कहा -

त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धु च सखा त्वमेव |
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव ||

तू ही माता है, पिता भी तू ही है, तू ही भाई, तू ही सखा (सहायक) है | तू ही ज्ञान तथा तू ही धन है | हे देवों के देव ! मेरे लिए सभी कुछ तू ही है |

मनुष्य यदि सारे सम्बन्ध भगवान से स्थापित कर सके, तो उसे फिर कुछ प्राप्त करने को न रहे | भगवान् महान है | उसका तेज=अनीक भी महन् है | वह भर्ग है, पापनाशक है, अताः पूजनीय है | उसके तेज को अन्यत्र मत देखो | अपने शरीर के द्युलोक में - मस्तिष्क में देखो | वह तुम्हारे सभी मलों को विकारों को दूर कर रहा है | वह तुम्हें मिला हुआ है, तुममें संगत है |

अरे जिसे तू जगत् के कोने-कोने में ढूंढता फिर रहा था, वह तेरे अन्दर निकल आया | अब इसे अपना | सारे सम्बन्ध इसी से लगा | वास्तव में सच्चा सम्बन्धी है भी यही |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)