Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

ध्यानियों को महान प्रकाश मिलता है

ओउम् | उच्छन्नुषसः सुदिना अरिप्रा उरु ज्योतिर्विविदुर्दीध्यानाः |
गव्यं चिदूर्वमुशिजो वि वब्रुस्तेषामनु प्रदिवः सस्त्रुरापः ||

ऋग्वेद 7|90|4||

शब्दार्थ -

उच्छन्नुषसः................प्रकाश का विस्तार करनेवाले
सुदिनाः.....................उत्तम दिनोंवाले
अरिप्राः.....................निर्दोष
दीध्यानाः...................निरन्तर ध्यान करनेवाले मनुष्य
उरु.........................विशाल
ज्योतिः.....................प्रकाश को
विविदुः.....................प्राप्त करते हैं |
उशिजः.....................कमनीय कामनाओंवाले
गव्यम्.....................इन्द्रिय-सम्बन्धी
उर्वम्......................विशाल बल को
चित्त्.......................भी
वि+वव्रुः....................विशेषरूप से वरण करते हैं
तेषाम्......................उनके
प्रदिवः+अनु................ज्ञान प्रकाश के अनुकूल
आपः.......................जल
सस्त्रुः.......................बहने लगते हैं |

व्याख्या -

सब विषयों का आकार होते हुए भी वेद मुख्यतया ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन करता है | ऋषि दयानन्द ने ऋग्वेदभाष्यभूमिका में लिखा है -

सर्वेषां वेदानां मुख्यं तात्पर्य ब्रह्मण्येवास्ति | क्वचित्साक्षात्क्वचिच्च परम्परया, न कस्मिश्चिदपि मन्त्रे ईश्वरार्थत्यागो अस्ति |

अर्थात् - सभी वेदों का मुख्य तात्पर्य ब्रह्म में ही है, कहीं साक्षात्, कहीं परम्परा से, किसी भी मन्त्र में ईश्वर का त्याग नहीं है | भाव यह है कि कोई मन्त्र यदि ऐसा प्रतीत हो जिसमें परमात्मा के अतिरिक्त का वर्णन हो, वहाँ भी परमात्मा का अधिष्ठाता-रूप से या सृष्टा आदि के रूप में वर्णन समझना चाहिए | वैसे वेद ब्रह्मविद्या का ही मुख्य-रूप से वर्णन करता है | जीव, प्रकृति, ब्रह्म के स्वरूप का ज्ञान कराके प्रकृतिपाश से छुड़ाकर ब्रह्मसाक्षात् कराना ब्रह्मविद्या का काम है | ज्ञान का प्रधान साधन ध्यान है, उस ध्यान का वर्णन इस मन्त्र में है |

उरु ज्योतिर्विविदुर्दीध्यानाः = निरन्तर ध्यान करनेवाले विशाल प्रकाश को प्राप्त करते हैं | ध्यान का एक सामान्य अर्थ है विचार करना | प्रत्येक पदार्थ के गुण-दोषों का विवेचन विचार है | अमुक पदार्थ उपादेय = ग्रहण करने योग्य और अमुक हेय = त्यागने योग्य है, इस प्रकार के विवेक को विचार कहते हैं | इस प्रकार से हेय-उपादेय का विवेक करके हेय को त्यागकर उपादेय को ग्रहण करके आत्मसात करने का नाम ध्यान है अर्थात् ऐसी अवस्था जिसमें ध्येय वस्तु पर चिरकाल तक अटूट विचारधारा निर्बाध रूप से बनी रहे, उसको ध्यान कहते हैं | इस ध्यान का फल विशाल प्रकाश बतलाया है | अनुभवी जन इसका समर्थन करते है | ध्यानियों की थोड़ी-सी पहचान बताई है - वे सुदिन होते हैं | उनकी दिनचर्या बड़ी सधी हुई, नियमित होती है | वे अरिप्र होते हैं | साधारणतया दस प्रकार के पाप होते हैं | जैसा कि वात्स्यायन मुनिजी ने न्यायभाष्य में लिखा है -

शरीरेण प्रवर्त्तमानः हिंसास्तेयप्रतिषिद्धमैथुनान्याचरति, वाचाSनृतपरुषसूचनासंबद्धानि, मनसा परद्रोहं परद्रव्याभीप्सां नास्तिक्यं चेति, सेयं प्रवृत्तिरधर्म्माय | न्यायभाष्य 1|1|2

शरीर से प्रवृत होता हुआ मनुष्य हिंसा, चोरी और निषिद्ध मैथुन करता है, वाणी से मिथ्या, कठोर वचन, चुगली और असम्बद्ध प्रलाप करता है, मन से दूसरों से द्रोह, दूसरों के धन हरण करने की इच्छा और नास्तिक्ता | यह प्रवृति अधर्म्म का तथा पाप का हेतु होती है |

ध्यानीजन इन पापों से रहित होते हैं | इस बात को अगले मन्त्र के पूर्वार्द्ध में बहुत स्पष्ट करके कहा है -

तेन सत्येन मनसा दीध्याना: स्वेन युक्तासः क्रतुना वहन्ति | ऋ. 7|90|5

वे सच्चे मन से ध्यान करते हुए, अपने सच्चे ज्ञानकर्म्म से युक्त हुए निर्वाह करते हैं अर्थात् उनके ज्ञान, कर्म्म तथा मन में कोई खोट नहीं होता |

ध्यान का साधन भी बतला दिया कि वह मन से किया जाता है | उनके शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक व्यवहार में किसी प्रकार का असत्य नहीं होता, अतः उनके निष्पाप होने में सन्देह किसे हो सकता है ?

स्वेन युक्तासः क्रतुना वहन्ति में एक और भी संकेत है कि उनका कर्म्म अर्थात् आहार-व्यवहार युक्तियुक्त होता है | ध्यानी कर्म्महीन नहीं होते, वरन् वे स्वेन युक्तासः क्रतुना वहन्ति = अपने कर्म्म से युक्त हुए निर्वाह करते हैं | उन्हें ज्ञात है कि नहि कश्चित् क्षणम‌पि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् कोई भी एक क्षण कर्म्म किये बिना नहीं रह सकता, अतः वे अपने कर्त्तव्य कर्म्म से सदा युक्त रहते हैं | ध्यानियों के अरिप्र होने का हेतु भी इस मन्त्र में बता दिया गया है, यतः उरु ज्योतिर्विविदुर्दीध्यानाः = ध्यान करते हुए वे विशाल प्रकाश को प्राप्त करते हैं | रिप्र = दोष = पाप अन्धकार में होता है | प्रकाश मे अन्धे या असावधान को ठोकर लग सकती है, नेत्रवाले तथा सावधान को ठोकर लगना सम्भव नहीं | ध्यानियों का ध्यानानुष्ठान उनकी सावधानता की सूचना देता है, अतः, प्रकाश प्राप्त कर वे पाप से निरवकाश हो जाते हैं | परिच्छिन्न जीव का स्वभाव है गति करना, इस नैसर्गिक नियम को जानकर वे ध्यानी भी गति करने में विवश हैं, अतः वे ध्यान से प्राप्त ज्योति के प्रसार के लिए यत्न करते हैं | ज्ञान-ज्योति प्रसार करने से उनका ज्ञानालोक उत्तरोतर बढ़ता है, और इस प्रकार उनके रिप्रों का संहार होता है | योग के द्वारा वे अपनी इन्द्रियशक्ति बढ़ा लेते हैं | उनके तप के प्रभाव से अध्यात्म जल की शान्त धाराएँ बहने लगती हैं, और वे उनके रहे-सहे दोषों को भी बहा ले जाती है | ऋग्वेद (10|9|8) में इस अध्यात्म जल की महिमा ऐसी ही कही है -

इदमापः प्र वहत यत्किं च दुरितं मयि | यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम् ||

हे जलो ! यह बहा ले जाओ, जो कुछ मुझमे दुरित=दुरवस्था=दुर्गति=बुराई है, अथवा जो मैंने किसी से द्रोह किया है, या गाली दी है, अथवा झूठ बोला है |

नदी-नालेवाले जल में यह बल कहाँ ? वह तो अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति शरीर की शुद्धि कर सकता है | आओ, इस जल में जी भरकर नहाओ |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)