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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'ईश्वर पूजा का वैदिक स्वरूप'(3) लेखक - शास्त्रार्थ महारथी स्व.पं.रामचन्द्र देहलवी जी

गतांक से आगे -

तो आप यदि कृष्णचन्द्र जी की मूर्ति रखते हैं तो दो बनवाइए | एक मुझे दीजिए और एक आप रखिए | देखिए मैं उस मूर्ति को झाड़-पोंछकर साफ रखूँगा और उनके जीवन से कुछ सीखूँगा जिनकी वह मूर्ति है |

रामचन्द्र जी हैं | उनकी मूर्ति घर में रखने का क्या लाभ ! रामचन्द्र जी के चरित्र से वह मोटी पुस्तक रामायण भरी पड़ी हुई है | रामचन्द्र जी ने अपने पिता की आज्ञा मानी | आज्ञा मानकर वन चले गए | तो मैं अपने बच्चों को सिखाऊँगा कि वे अपने माँ-बाप की आज्ञा मानें | मेरे पिता जी तो मर गये | इसलिये मैं अपने बच्चों को ही सिखाउँगा | उन्हें यह बताऊँगा कि रामचन्द्र जी के पीछे चलने का क्या अर्थ है | पीछे चलने का यही अर्थ है कि उनके गुणों को धारण करो |

कृष्ण चन्द्र जी के लिए भी यही बात है | कितने बड़े विद्वान थे | कैसे बड़े नीतिमान् और बलवान् थे | तीनों गुण उनमें थे | हमको भी अपने अन्दर ये चीजें धारण करनी चाहिएं | उन्होंने छोटे छोटे मांगलिक राजाओं को मिलाकर महाभारत बना दिया था | आज भारत के टुकड़े होते चले जा रहे हैं | आप न होने दीजिए इन टुकड़ों को, उनके चरित्र को सीखिए | पीछे चलने का अर्थ नहीं है कि आप नाचने लगें | किसी को राधा बना लें और आप उसके साथ नाचें यह कृष्ण का चरित्र नहीं था | यह बात कही जाती है तो लोग नाराज हो जाते हैं | क्या यह नाराज होने की बात है ? कृष्ण जी क्या नचनिए थे ? हर्गिज नहीं | वह आप्त पुरुष थे | योगी थे | लोगों ने सोचा समझा नहीं | उसी का दुष्परिणाम आज देख लीजिए | क्या नाच की कोई कमी है ? आज तो हमारी सरकार के बड़े बड़े नेता नाच के हामी हैं | हमारे नैहरू सहब भी नाचते हैं | लोग कहा करते है नचनियों का राज्य हो रहा है | लोग कहते हैं हमें सुनना पड़ता है | प्रत्येक सांस्कृतिक समारोह में नाच होता है | नाच ही सब जगह प्रधान है | यह नाच नहीं नाश है जो हो ही रहा है |

राज्य नाच से कायम नहीं रहते | मैं कहता हूँ, बुद्धिमान सारे कहते हैं और इतिहास इसकी पुष्टि करता है | राज्य बलवान् और नीतिमान् पुरुष किया करते हैं | तो कृष्ण जी के चरित्र के अनुसार अपना चरित्र बनाइए |

चित्र के बारे में एक बात यह विशेष कहनी है कि किसी के भी चित्र में उनके सारे चरित्र नहीं आते | क्या जो चित्र कृष्ण जी का घर में लगा है उसमें कृष्ण जी के सारे चरित्र चित्रित हैं या क्या किए जा सकते हैं ? क्या स्वामी दयानन्द जी का सारा चरित्र एक चित्र में आ जाता है ? नहीं न ! कोई भी चित्र ऐसा नहीं है जिसमें चित्रित व्यक्ति का सारा चरित्र आ जाय | तो चित्र से व्यक्ति को याद करके उसके चरित्र जानने की उत्कण्ठा होती है और फिर चरित्र जानकर अपने को वैसा बनाने की कोशिश करें | तो कृष्णचन्द्र जी के जीवन से शिक्षा लेकर भारत की उन्नति करें | रामचन्द्र जी के चरित्र को भी ध्यान में रखें | आज भाई-भाई आपस में छोटी-छोटी बातों के लिए लड़ते-फिरते हैं किन्तु राम ने अपने छोटे भाई भरत के लिए सारे अयोध्या के राज्य पर ठोकर लगा दी | तो आप राम की तरह से भाई के लिए त्याग करना सीखें | अगर राम के चरित्र का हम पर इतना भी प्रभाव न पड़ा तो रामायण के पाठ का क्या लाभ ?

इन सभी बातों से अंदाजा लगाइए कि मैं कहाँ तक आपके साथ हूँ | जितनी बात बुद्धिपूर्वक होगी मैं आपके साथ-साथ वहाँ तक मानूँगा | आगे मैं नहीं मानूँगा | तो राम और कृष्ण की सच्ची सेवा यह है कि आप उनके चारित्रिक गुणों को जानकर अपने गुण भी वैसे ही बनायें | यदि आप उनके ऊपर जलेबी रखने लगें, लड्डू रखने लगें या उन पर पानी डालने लगें तो यह उनकी पूजा नहीं है, न यह उनकी सेवा है गुणों को धारण करना ही उनकी सेवा है |

मैं आपको अपने जन्म स्थान (नीमच छावनी) की बात सुनाता हूँ | वहाँ जब लोग मन्दिरों में जाते हैं तो मन्दिर में घुसने से पहले वहाँ पर लटका हुआ घण्टा जोर से बजाते हैं और घण्टा बजाकर बोलते हैं, 'भेज छप्पन की चौथाई' अर्थात् 14 करोड़ भेज | मैंने उनसे पूछा, "14 करोड़ क्यों नहीं माँगते ? चप्पन करोड़ की चोथाई क्यों कहते हो ?" बोले - "अजी घण्टी तो यों बजाते हैं कि महादेव जी नशे में रहते हैं जरा जाग जायँ, नशा कम हो जाय और वे हमारी बात सुन लें | छप्पन करोड़ की चौथाई यों कहते हैं कि वे भोले हैं उन्हें याद कुछ रहता नहीं है | छप्पन करोड़ ही याद रहेगा चौथाई याद नहीं रहेगी तो छ्प्पन करोड़ ही दे देंगे |"

देखा आपने इन भक्तों को ? अपने भगवान को भी धोखा दे रहे हैं |

एक शख्स है जिसका कोई रिश्तेदार है और वह गुजर गया है | डाक्टर की दवाई जो उनके लिए लाई गईं थी वह भी रखी हुई हैं | आप जानते हैं लोग यथाशक्ति अपने मरीज को बचाने की सारी कोशिशें करते हैं | डाक्टर के यहाँ से लाई हुई दवा में से खुराक बाकी थी | वह रखी रही | मरीज गुजर गया | मुहल्ले में सूचना भिजवा दी गई कि हमारे अमुक रिश्तेदार गुजर गए हैं | शमशान भूमि में उन्हें उठाने के लिए लोग इकट्ठा हो गए | जब उनको अर्थी पर रखा गया तो ये दवा ले आए और दवा लाकर उनके मुँह में डालने लगे | तमाम लोग चिल्ला उठे कि, 'बेवकूफ तेरी अकल मारी गई है | अब ये मर गए, मुर्दा हैं अब दवाई पिलाने का क्या लाभ ?' बोला 'मैं लाया तो इन्हीं के लिए था |' लोगों ने कहा, 'लाया तो इन्हीं के लिए था लेकिन अब तो मर गए | जिन्दा तो हैं नहीं तू इन्हें अब क्या दवाई पिलाता है ? अब क्या ये दवाई पी लेंगे ?' फिर वह बोला, 'यदि ये नहीं पीते तो आप पी लें |' 'हम कोई बिमार हैं जो दवाई पीवें ?' इन सब बातों को मान लो कोई आर्य पुरुष सुन ले और यह कह दे कि जो दो-चार घण्टे पहले जिन्दा था और अब मर गया है उसे दवाई पिलाने वाले को तो आप बेवकूफ बता रहे हैं जो कभी जिन्दा थे ही नहीं, प्रारम्भ से ही मन्दिर में पत्थर के रखे हैं उन्हें जो लोग खिलाते-पिलाते हैं, लड्डू-पेड़े चढ़ाते हैं वे कितने बड़े बेवकूफ होंगे | इसको Rule of three से समझदार लगा लें | अक्ल व हिसाब वाले ही सोचें और विचारें | भगवान् की उपासना क्या लड्डू और जलेबी चढ़ाने से होती है ? नहीं | बिलकुल नहीं, यह उपासना का तरीका नहीं है |

मूर्ति के रखने में कोई हर्ज नहीं | मैंने पहले भी कहा था कि आप दो मूर्तियाँ बनवाएँ एक स्वयं रखें और एक मुझे दें | कह दीजिए लोगों को कि एक मूर्ति रामचन्द्र ले गया |
लोग मुझसे पूछेंगे कि क्या करते हैं आप कृष्ण की मूर्ति का ? मैं उत्तर दूँगा कि मूर्ति देखकर मैं उनका चरित्र याद करता हूँ कि उन्होंने कितना बड़ा काम किया, कितने बड़े विद्वान और नीतिमान् पुरुष थे जो सारी सभा में वे ही प्रधान चुने गए | इसलिए हमको भी ऐसा ही बनना चाहिए | मै यह नहीं सीखूँगा कि उनके ऊपर लड्डू-जलेबी चढ़ाने लगूँ कि चिड़ियाएँ आएँ और उन्हें खा जाएँ, सारी मूर्ति को खराब कर जाएँ | जिन लोगों ने यह तरीका इख्तियार कर रखा है कितना गलत काम किया है इसका कोई अन्दाजा हो सकता है ? यह सरासर लोग भूल किए जा रहे हैं | ईश्वर की ऐसे पूजा नहीं होती |

एक साहब ने मुझसे पूछ लिया कि, 'पण्डित जी आप अपने वालिद साहब की तस्वीर को क्या समझते हैं ?' मैंने कहा, 'इतना इसमें और जोड़ दीजिए कि जिसको मैंने ही खीचा हो |' मैंने उत्तर दिया, क्योंकि तस्वीर मैंने बनाई है इसलिए मैं तसवीर का बाप हूँ | जो चीज मुझसे उत्पन्न हुई है वह मेरे बच्चे की जगह तो है ही |' उत्तर को सुन कर कहने लगे कि, 'हाँ, उत्तर तो ठीक हो गया |'

सच्ची उपासना क्या है यह अब मैं आपकी सेवा में वर्णन करूँगा | जरा ध्यान से सुनिए : -

(क्रमशः)