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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आइये ऋषि से जानें कुछ प्रश्नों के उत्तर - वेदनित्यत्व‌विषयः (1)

अब वेदों के नित्यत्व का विचार किया जाता है | सो वेद ईश्वर से उत्पन्न हुए हैं इससे वे स्वतः नित्यस्वरूप ही हैं, क्योंकि ईश्वर का सब सामर्थ्य नित्य ही है |

प्र. - इस विषय में कितने ही पुरुष ऐसी शङ्का करते है कि वेदों में शब्द, छन्द, पद और वाक्यों के योग होने से नित्य नहीं हो सकते | जैसे बिना बनाने से घड़ा नहीं बनता, इसी प्रकार वेदों को भी किसी ने बनाया होगा | क्योंकि बनाने के पहिले नहीं थे और प्रलय में भी न रहेंगे, इससे वेदों को नित्य मानना ठीक नहीं है |

उ. - ऐसा आपको कहना उचित नहीं, क्योंकि शब्द दो प्रकार का होता है - एक नित्य और दूसरा कार्य | इनमें से जो शब्द, अर्थ और सम्बन्ध परमेश्वर के ज्ञान में है वे सब नित्य ही होते हैं, और जो हम लोगों की कल्पना से उत्पन्न होते हैं वे कार्य्य होते हैं | क्योंकि जिसका ज्ञान और क्रिया स्वभाव से सिद्ध और अनादि है उसका सब सामर्थ्य भी नित्य ही होता है | इससे वेद भी उसकी विद्यास्वरूप होने से नित्य ही हैं, क्योंकि ईश्वर की विद्या अनित्य‌ कभी नहीं हो सकती |

प्र. - शब्द जो उच्चारण किये के पश्चात नष्ट हो जाता है और उच्चारण के पूर्व सुना नहीं जाता है, जैसे उच्चारण क्रिया अनित्य है, वैसे ही शब्द भी अनित्य हो सकता है | फिर शब्दों को नित्य क्यों मानते हो ?

उ. - शब्द तो आकाश की नाई सर्वत्र एकरस भर रहे हैं, परन्तु जब उच्चारणक्रिया नहीं होती, तब प्रसिद्ध सुनने में नहीं आते | जब प्राण और वाणी की क्रिया से उच्चारण किये जाते हैं, तब शब्द प्रसिद्ध होते हैं | जैसे 'गौः' इसके उच्चारण में जब पर्यन्त उच्चारण क्रिया गकार में रहती है तब पर्यन्त औकार में नहीं, जब औकार में है तब गकार और विसर्जनीय में नहीं रहती | इसी प्रकार वाणी की क्रिया की उत्पत्ति और नाश होता है, शब्दों का नहीं | किन्तु आकाश में शब्द की प्राप्ति होने से शब्द तो अखण्ड एकरस सर्वत्र भर रहे हैं, परन्तु जब पर्यन्त वायु और वाक् इन्द्रिय‌ की क्रिया नहीं होती, तब पर्यन्त शब्दों का उच्चारण और श्रवण भी नहीं होता | इससे यह सिद्ध हुआ कि शब्द आकाश की नाई नित्य ही हैं | जब व्याकरण शास्त्र के मत से सब शब्द नित्य होते हैं तो वेदों के शब्दों की कथा तो क्या ही कहनी है, क्योंकि वेदों के शब्द तो सब प्रकार से नित्य ही बने रहते हैं |

इसी प्रकार जैमनि मुनि ने भी शब्द को नित्य‌ माना है ..| शब्द नित्य ही हैं, अर्थात नाशरहित हें, क्योंकि उच्चारणक्रिया से जो शब्द का श्रवण होता है सो अर्थ के जानने ही के लिये है, इससे शब्द अनित्य नहीं हो सकता | जो शब्द का उच्चारण किया जाता है, उसकी ही प्रत्यभिक्षा होती है कि क्षोत्र द्वारा ज्ञान के बीच में वही शब्द स्थिर रहता है, फिर उसी शब्द से अर्थ की प्रतीति होती है | जो श्ब्द अनित्य होता तो अर्थ का ज्ञान कौन कराता,क्योंकि वह शब्द ही नहीं रहा, फिर अर्थ को कौन जनावे | और जैसे अनेक देशों में अनेक पुरुष एक काल में ही एक गो शब्द का उच्चारण करते हैं, इसी प्रकार उसी शब्द का उच्चारण बारंबार भी होता है, इस कारण से भी शब्द नित्य है | जो शब्द अनित्य होता तो यह अवस्था कभी नहीं बन सकती | सो जैमनी मुनि ने इस प्रकार के अनेक हेतुओं से पूर्वमिमांसा शास्त्र में शब्द को नित्य सिद्ध किया है |

(क्रमशः)

महर्षि दयानन्द सरस्वती
(महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत् ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षेप में उद्दृत्)
From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's RIGVED-ADI-BHASHYA-BHUMIKA